नए पात्र
नलिनी- 24 बर्षीय
नेहा - 17 बर्षीय (नलिनी की छोटी बहन)
रिम्मी-30 बर्षीय (नलिनी की नौकरानी)
पुराने पात्र -
सूरज - 21 वर्षीय
निशा- 17 वर्षीय (सूरज की बहन)
निर्मला देवी - 45 वर्षीय (निशा की माँ)
अमर : 18 साल ( निर्मला की दुकान पर नौकर)
.................................................
सूरज स्कूटी पर बैठे बैठे हवा को महसूस कर रहा था उसे लग रहा था जैसे किसी पिंजरे से निकला पंछी धीरे धीरे उड़ने के लिए पंखों से हवा भांप रहा हो । वो बीती जिंदगी में से निशा को छोड़कर सब जैसे भूल ही जाना चाहता था।उसे लग रहा था कि ये आजादी भी किसी ऐसे के कारण मिली जिसे वो ठीक से जानता भी नही।ऐसे ही सोचते सोचते रास्ता कट गया और स्कूटी एक पुराने मगर काफी बड़े घर के अहाते में जाकर रुकी।
सूरज उतर कर बड़े गौर से घर को देख रहा था ।
तभी नलिनी की आवाज आई " चलो आ जाओ सूरज आज से तुम्हारा भी यही घर है"
सूरज कुछ कह ना सका बस नलिनी के चेहरे को गौर से देखने लगा। नलिनी का रंग निशा जितना गोरा तो नही था पर नैन नक्श बहुत सुंदर थे, डील डॉल में वो निशा से कुछ मोटी थी पर उससे उसकी सुंदरता में चार चांद ही लगते थे । सूरज उसके अपनेपन को महसूस तो कर रहा था पर उसे बयान करने को शब्द नही मिल रहे थे।
नलिनी ने कहा " ऐसे क्या देख रहे हो"
सूरज ने सपाट प्रश्न किया" आप इतने सारे एहसान क्यों कर रही है मुझ पर"
नलिनी ने अपनी प्यारी मुस्कान के साथ कहा " मैं क्यों कर रही हूँ ये घर मे चलकर बताती हूँ पर इसे एहसान कहकर भाई बहन के रिश्ते की बेज्जती मत करो"
सूरज को अपने ऐसे पूछने की गलती का एहसास हुआ तो सूरज ने नलिनी के पैर छूने चाहे तो नलिनी ने उसे बीच मे रोककर गले से लगा लिया ।ये गले लगने का उसका एहसास उसे जाना पहचाना लग रहा था पर क्यों ये उसकी समझ से बाहर था इसलिए वो घर की तरफ देखने लगा ।
दिवारो पर पीली रंग की छटा कुछ मद्धम हो चुकी थी पर घर के आलीशान कहने में किसी को गुरेज नही होता। घर के सामने एक छोटा लॉन था जहां कुर्सियां और मेज पड़ी थी । सूरज नलिनी के पीछे पीछे चला जा रहा था फिर नलिनी ने जाली का दरवाजा बाहर की तरफ खींचा और सूरज को अंदर आने का इशारा किया अंदर घुसते ही सामने के सोफे पर नजर पड़ी जिस पर बैठी नेहा मुस्कुरा रही थी । मुस्कुराहट देखकर सूरज को चेहरा जाना पहचाना से लग रहा था पर याद कुछ नही आ रहा था।
अभी दो कदम सूरज ने और बढ़ाये ही थे कि कोई उसके पीठ पर लद गया पर ये हरकत उसकी अच्छी तरह जानी पहचानी थी तो तुरंत ही उसके मुंह से बिना देखे निकल गया"निशा मान जा "
नेहा और नलिनी जो ये देख कर हंस रहे थे सूरज की बात से चौक गए कि उसने बिना पीछे देखे कैसे पहचान लिया।
तब तक सूरज ने लटकी हुई लड़की की बाह पकड़ कर अपने सामने लाया तो निशा खिल खिला रही थी ।अब सूरज की आश्चर्य की सीमा नही रही थी तो बोला"तू यहाँ कैसे पहुंची , इन लोगो को तू कैसे जानती है पर सबसे पहले ये बता तेरी तबियत कैसी है"
निशा ने कहा" इतने सारे सवाल भैया थोड़ा सांस तो लेने दो...मेरी तबियत ठीक है और ये मेरी कॉलेज की दोस्त है नेहा और ये इनकी बड़ी बहन नलिनी"
अभी निशा कुछ और बोलने जा ही रही थी कि नलिनी ने मेज पर स्कूटी की चाबी रखते हुए कहा" निशा अपने भैया का बातों से ही पेट भर दोगी या कुछ खाना भी खाने को दोगी, मुझे तो बड़ी भूख लग रही है ।
निशा ने हंसते हुए कहा" मैंने कब मना किया है"
फिर नलिनी ने सूरज से कहा" माना तुम्हारे पास सवाल बहुत है पर मुझे बहुत भूख लगी है पहले कुछ खा लो फिर सब जवाब ले लेना "
नलिनी ने आवाज लगाई "रिम्मी खाना टेबल पर लगा दो"
रिम्मी की आवाज शायद रसोई से आई "जी दीदी सब लगा दिया बस रोटी सेक कर लाती हूँ।
हम सब डाइनिंग टेबल के चारो ओर बैठ गए । सूरज के एक तरफ निशा और दूसरी तरफ नलिनी आकर बैठ गई ठीक सामने नेहा थी, नेहा बार बार सूरज से नजरे मिला कर बचा लेती थी ऐसा वो क्यों कर रही थी ये सूरज की समझ से बाहर था तो वो खाना खाने पर ध्यान देने लगा
तभी एक औरत आई जिसे देखने से ही पता चल रहा था कि उसे सजने सवरने का कितना शौक है, होटों पर लाल लिपिस्टिक आँखों मे काजल और माथे पर छोटी सी बिंदिया, उसे आकर्षक बना रहे थे । तभी उसने हाथ मे लिया बर्तन रख दिया और बोली" लो दीदी रोटी भी ले आई, और कुछ चाहिए था क्या"
इस पर नलिनी ने उसे देख कर कहा" नही और कुछ चाहिए होगा तो बता देंगे, पहले मेरी बात सुन रिम्मी, देख ये सूरज है, आज से ये इसी घर का सदस्य है और यही रहेगा, तो जाकर बैठक के पास वाला कमरा साफ कर दे, और चादर भी बदल देना "
इस बात को सुनकर उसके चेहरे पर बहुत सारे भाव आकर चले गए और बोली " जी दीदी, मैं कमरा साफ करने जाती हूँ"ये कहकर वो चली गई।
और सूरज सिर नीचे करके चुपचाप खाना खाने लगा
पर तभी निशा बोली "भैया आप इतने चुपचाप खाना क्यों खा रहे है"
सूरज के दिल का दर्द बाहर आ गया उसने कहा " मुझे लगा कि अब तुझे कभी देख नही पाऊंगा क्योंकि मुझे तो बुआ ने जेल भेज ही दिया था"
निशा की आंखे छलक गई और बोली" आपने ये कैसे सोच लिया मैं आपके बिना रह सकती हूँ"
सूरज ने बात को टालते हुए कहा" ठीक है अब रोने मत लग जाना चल बाकी बातें बाद में कहना पहले खाना खा ले " और रोटी का टुकड़ा दाल में भिगाकर निशा को खिलाने लगा ।
नलिनी से ये देखकर न रुका गया तो बोली" जो बहन घर लाई उससे कोई पानी तक नही पूछ रहा और निशा को खाना अपने हाथ से खिलाया जा रहा है"
सूरज ने नलिनी को देखा तो वो मुस्कुरा रही थी तो सूरज ने कहा" दीदी आपने मेरे लिए जो किया है वो एहसान तो मैं जिंदगी में नही चुका पाऊंगा, पर आपके किसी काम आ सका तो मुझे खुशी होगी"
नलिनी बोली "एहसान क्यों कह रहा है अभी तो तुझे समझाया था, और रही बात काम आने की तो तेरा मुझे बहन मान लेना ही काफी है"
इस पर निशा बोली"दीदी मेरे भैया है ही इतने अच्छे की अच्छी किस्मत वालों को ही मिलते है"
इतनी बात निशा बोल तो गई पर उसने नलिनी का चेहरा उतरा हुआ देखा तो उसके गलत बोलने का उसे दुख होने लगा। इसलिए निशा ने बात घुमाने की कोशिश की और बोली" दीदी मेरी और आपकी किस्मत है ही इतनी अच्छी की भैया हम दोनों के साथ खाना खा रहे है"
नलिनी ने अपने दिल के दुख को छुपाने के लिए मुस्कुराने लगी ।इसे देखकर निशा की जान में जान आ गई ।पर तभी निशा का ध्यान नेहा पर गया तो वो तुनकते हुए बोली" आज तुझे क्या हुआ जो इतनी चुप है , कल तो बड़ी खुश हो रही थी सूरज भैया के तेरे घर रहने से, बस इतनी देर ही खुशी थी"
नेहा ने अपनी सोच से चौंकते हुए कहा" मैं कहाँ चुप हूँ, मैं तो तुम लोगों की बातें सुन रही हूँ"
निशा ने कहा" चल ठीक है मान लेती हूँ, ये ही बात है"
नेहा ने बात अपने ऊपर से हटाने के लिए कहा" अब तू भी तो अपने भैया के खाने का ध्यान दे, देख उनके पास रोटी खत्म हो गई है"
निशा ने जल्दी से रोटी थाली में रखते हुए कहा"चलो अब सही है, मैं तो अपनी बातों के चक्कर मे आपके खाने पर ध्यान ही नही दे पाती थी अब हम तीन है तो मुझे कम चिंता करनी होगी"
इसी तरह इधर उधर की बातों में खाना खत्म कर सभी बापस एक कमरे में दरवाजे पर आ गए तभी रिम्मी ने निकलते हुए कहा" दीदी कमरा साफ हो गया और चादर भी बदल दी, अब मैं जाऊँ"
"ठीक है जा, पर जा कहाँ रही है" नलिनी ने पूछा
रिम्मी ने कहा" वो दीदी मेरे तेल की शीशी सुबह हाथ से छूट गई थी वो टूट गई, वही लेने जा रही हूँ, कुछ आपको भी मंगाना था"
"नही, तू जा" नलिनी ने कमरे में घुसते हुए कहा
पर तभी नेहा अभी आती हूं कहकर लौट गई तभी नलिनी दीदी के फ़ोन की घंटी बजी वो उठकर कमरे के बाहर चली गई ।
सूरज ने निशा का हाथ पकड़ कर बैड पर बिठाया और बोला "अब बता ये सब क्या चल रहा है मुझे तो कुछ
समझ मे नही आ रहा"
निशा ने हंसते हुए कहा" मैं इतनी दूर चलकर आपको सब बताने ही तो यहां आई हूं"
सूरज ने जोर देते हुए कहा "चल ठीक है अब तो बोल"
आगे की कहानी निशा की जुबान में..
मेंने बताना शुरू किया" कल जब मैं हॉस्पिटल में लेटी थी और आप घर पर खाना लाने गये थे, तो माँ किसी सोच में डूबी हुई थी तभी किसी का फ़ोन आया तो वो मेरे पास से उठकर बाहर चली गई। तभी मेरे पास नलिनी दीदी आई और हाल चाल लेने लगी, अपना हाल बताने के बाद मैंने नेहा के बारे में पूछा" नेहा क्यों नही आई"
तो दीदी ने कहा" वो वाशरूम गई है अभी आ जायेगी"
और करीब पंद्रह मिनट बाद नेहा आ गई मेरी उससे बात होने लगी, थोड़ी देर बाद ही माँ भी बापस आ गई । नलिनी दीदी के परिचय माँ से कराने के बाद नलिनी दीदी मॉ से बातों में लग गई पर मैंने देखा कि नेहा उन्हें देखकर बहुत चौंक गई है और मम्मी की तरफ देख तक नही रही है मम्मी उससे नेहा से उसके बारे में पूंछ रही है पर वो मम्मी की बात का जवाब नही दे रही है तो मैंने उसके हाथ को हिलाकर उनसे बात करने को कहा तो वो हाँ हूँ में माँ की बातों का जवाब देने लगी, मुझे समझ नही आया कि ये नेहा तो इतनी मुँह फट है फिर इतनी गुपचुप क्यों है मैंने उससे कुछ पूछना चाहा तो उसने टाल दिया फिर जाते समय मुझसे कान में पूछा "आंटी घर कब जाती है"
इस सवाल से मैं चौंक गई और उसे धीरे से कहा वैसे तो मम्मी सूरज भैया के आने के बाद चली जाती है पर आज मै खुद घर जा रही हूँ तो वो मेरे साथ ही घर जाएंगी"
इस पर नेहा ने कहा "ठीक है जब घर पहुंच जाए तो फ़ोन करना मुझे बहुत जरूरी बात करनी है पर ध्यान रखना जब तू अकेली हो तभी बात करना अपने सूरज भैया को भी अभी कुछ मत कहना"
इतना कहकर नलिनी दीदी और नेहा चले आये फिर जब हम घर पहुंचे तो नेहा को फ़ोन करने की बात भूल गई इसलिए रात को मैं आपके सुलाने पर सो गई ।
पर थोड़ी देर बाद जब फ़ोन की आवाज से मैं उठी तो देखा नेहा का कॉल आ रहा था।
मैंने उठाया कहा" हम्म क्या हुआ इतनी रात को मुझे क्यों परेशान कर रही है"
मेरे सो जाने की बात नेहा को मेरे बोलने से समझ में आई तो नेहा ने भड़कना शुरू कर दिया।
और नेहा बोली" मुझे इतनी सीरियस बात करनी है और महारानी पैर फैलाकर सो रही है, तुझे कॉल करने को कहा था और तू भूल गई, वैसे तो दिन में दस बार कहती कि सूरज भैया से बढ़कर मुझे दुनिया मे कोई प्यारा नही, और अब जब.."
इस पर मैंने चौकते हुए बात को काटते हुए कहा" क्या हुआ, सूरज भैया की कौन सी बात है, और तुझे कैसे पता, तूने कब कहा कि सूरज भैया के बारे में कोई बात है, वरना तो मैं उसी समय मम्मी को बाहर भेज कर भी तुझसे बात पूंछ कर ही रहती"
नेहा ने कहा" तभी तो तुझे उस समय नही कहा कि तेरे सूरज भैया की बात है, सुनते ही मुझे पता था तुझसे सब्र नही होगा, और आंटी को कुछ शक हो सकता था"
मैंने उसकी बात का मतलब न समझ पाने की खीझ में उसे बीच मे टोकते हुए कहा" मॉ को किस बात का शक हो जाता"
नेहा ने गुस्से में कहा" एक तो फ़ोन नही किया और ऊपर से मुझे बात भी पूरी नही करने दे रही है, एक और बार बीच मे बोली तो अभी फ़ोन रख दूंगी फिर बात सोचने में रात गुजार देना"
मैंने कहा" सॉरी यार, वो मैं इतनी टेंशन में हूँ, तू अभी नही समझ सकती"
नेहा ने कहा" मैं समझ सकती हूँ पर पहले प्रॉब्लम तो सुन"
मैंने कहा" ठीक है अब बीच मे नही बोलूंगी"
नेहा ने कहा" मैं जब सुबह तेरे पास आई थी तब मैं वाशरूम की तरफ मुड़ गई, मेरे बाशरूम के पास वाले वाशरूम में कोई महिला फ़ोन पर बात कर रही थी।
महिला बोली "मैंने जो पता करने को कहा था उसका क्या हुआ"
वहाँ शांति होने के कारण उधर की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी। उधर से किसी आदमी की आवाज थी।
आदमी ने जवाब दिया" हाँ आंटी , मैंने सब पता किया है , वो सूरज इस बार एक सरकारी नौकरी की परीक्षा में बैठ रहा है और परीक्षा दो महीने बाद 3 तारीख को है, इसके लिए मेरे घर के चौथी गली में किसी रोशन लाल मास्टर जी से पढ़ने भी जाता है, हफ्ते में दो तीन दिन रात को सात बजे के आस पास ही पहुंचता है, और नौ बजे के आस पास लौट जाता है और तो और कल जब मै आपके पास आ रहा था कल मैंने मास्टर जी को सूरज से बात करते देखा तो मैं उनकी बातें छुपकर सुनने लगा मास्टर कह रहे थे सूरज इस तरह तुम तैयारी कैसे कर पाओगे तुम्हारा सरकारी नौकरी का सपना कैसे पूरा होगा तो सूरज ने कहा कि निशा के लिए वो अपने सपने को भी छोड़ सकता है इसलिए उसकी बहन जब तक घर नही पहुंचेगी वो पढ़ नही पायेगा पर उसके बाद वो रात को और ज्यादा मेहनत से पढ़ेगा,इतना सुनकर मास्टरजी चले गए "
महिला ने गुस्से में कहा"लाला जी के कारण इसने हाईस्कूल तो पास कर लिया था पर मैंने इसे लाला जी के बाद दुकान में इतना उलझा दिया कि कुछ और याद ही न रहे पर मुझे पहले ही शक था ये कमीना मानेगा नही इसने छुपकर इंटर पास कर लिया मुझे पता भी नही चलने दिया फिर मैंने जब इसे पढ़ते हुए पकड़ा तो इसकी किताबो में आग लगा दी मैंने सोचा मान जाएगा, लगता है ये फिर नही माना, उस दिन मैंने इसकी खाल उधेड़ दी थी पर इसकी मोटी चमड़ी फिर भूल गया होगा, चलो कोई बात नही अब इसके सपने को हमेशा के लिए ही खत्म करने का इलाज मिल गया है, अब देखती हूं कैसे लाट साहब बनता है "
आदमी ने उत्सुकता से कहा"कैसा इलाज आंटी"
महिला ने कहा" तू बस बैसा कर जैसा मैं कहूँ, फिर देख मैं उसका क्या हाल करती हूँ"
आदमी ने कहा" आंटी मैं बैसा ही करूँगा आप कहिए"
महिला ने कहा" ठीक है, कल जब सूरज दुकान पर आए तो दो हज़ार का नोट उसके कपड़ो में कही छुपा देना, फिर बाकी काम मुझ पर छोड़ दे, मैं उसे चोरी के इल्जाम में सलाखों में डलवा खाल उधड़वा दूंगी, और फिर ये किसी सरकारी नौकरी का सपना सपने में भी नही देख पायेगा,हा हा हा"
आदमी बोला" हा हा हा, ये कमाल का आइडिया तो सिर्फ आपके ही दिमाग मे आ सकता है, एक दिक्कत है"
महिला ने कहा"वो क्या"
आदमी ने कहा" आपने किसी पुलिसवाले से पहले से बात की है, सिर्फ दो हज़ार की बात है, कही वो उसे ऐसे ही छोड़ गए तो "
महिला ने कहा" उसकी चिंता छोड़, तुझे याद नही वो एक हवलदार जो हर हफ्ते कल के दिन कुछ न कुछ सामान लेने अपनी दुकान पर आता है उसे ही कुछ ले दे के समझा दूंगी "
आदमी ने कहा" आंटी एक और दिक्कत है"
महिला ने खीझते हुए कहा" अब क्या है"
आदमी बोला" मेरे पास दो हजार रुपये ही नही तो मैं रखूंगा कैसे"
महिला ने कहा" अमर तू गधे का गधा ही रहा, पैसे की चिंता मत कर शाम को जब मैं यहाँ से निकलूंगी तभी तू आ जाना मैं दे दूंगी, ठीक है अब मैं फ़ोन रखती हूं"
नेहा ने आगे बताया कि महिला के निकलने से पहले ही नेहा वाशरूम से निकल आई पर उसे समझ नही आया ये निशा के भाई सूरज की बात हो रही है या किसी और की पर जब उसने मम्मी की आवाज सुनी तो वो चौंक गई थी और उसका शक पक्का हो गया।
नेहा आगे बोली" निशा तेरे यहाँ दुकान पर कोई अमर काम करता है क्या"
मेरी तरफ से कोई जवाब न सुनते देख नेहा ने फिर से हैलो कहा और निशा को आवाज लगाई।
पर फिर उसे मेरे सुबकने का एहसास हुआ तो बोली" निशा देख मैं जानती हूं तू अपने सूरज भैया को बहुत प्यार करती है, पर इस समस्या का हल भी तो ढूंढना जरूरी है, तू इस तरह रोती रही तो आंटी अपनी मंशा में सफल हो जाएंगी"
मैं आप के साथ हुए सभी बातों के लिए रो रही थी पर मेरा गुस्से से पहले ही बुरा हाल था मैं बोली" सूरज भैया को कोई हाथ तो लगाकर दिखाए मैं उसके हाथ काट दूंगी, ये माँ अपनेआप को मुफ्त में भैया का दुश्मन बनाये बैठी जबकि भैया ने इस घर का कभी बुरा नही चाहा,भैया ने माँ के इतने जुल्म सहे पर मुझसे इस बारे में कुछ नही कहा वरना.."
आगे की कहानी सूरज की जुबान में..
बुआ की नफरत को सुनकर पुराने घाव फिर ताजा हो गए और मेरी आँखें आंसू का सैलाब ले आई थी और उसे देख निशा भी अपने आंसू संभाल नही पा रही थी। हम दोनों भाई बहन ऐसे ही थे उसका दर्द मुझसे सहन नही होता था और मेरे दर्द में वो कराह जाती थी। बचपन से ही वो मेरे साथ खेलती कूदती खाती पीती यहां तक की बचपन मे सोती भी मेरे पास आकर ही थी।
अभी निशा मुझे आगे कुछ कह पाती नलिनी दीदी कमरे में आ गई और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा" क्या हुआ तुम रो क्यों रहे हो"
मैंने कहा" दीदी अपनी बदनसीबी की दास्तान पर आंसू बहा रहा हूँ"
नलिनी दीदी ने कहा" इतने बड़े हो गए बच्चों की तरह रोते हुए अच्छे नही लगते, हर बात में भगवान हमारी भलाई को छुपा देते है इसलिए तुमको उसकी पहचान नही होती, तुम बदनसीब नही हो ये मान लो , वैसे भी अगर ये सब नही होता तो मेरा सपना कैसे पूरा होता"
मेरे आंसू ये सुनकर थम गए पर मैं चौंक गया, दीदी ने ऐसा क्यों कहा, दीदी ने मेरी जिज्ञासा शांत करने को कहा"देख मेरा बचपन से सपना था कि मेरा भी कोई भाई हो, मैं राखी के दिन सबके भाई देखकर कसक कर रह जाती थी पर अब मेरा भी एक भाई है"
इतना बोलते बोलते नलिनी दीदी के आंखों में नमी आ गई और मुझे गले से लगा लिया। मैं भी गले लग कर एक अपनापन महसूस हो रहा था,पर ऐसा क्यों था मुझे नही पता। मैं भी उनके इस प्यार को देखकर सोच में पड़ गया कि आज ही तो मैं मिला हूँ फिर दीदी की बातों से लग रहा है जैसे वो मुझे बहुत पहले से जानती हो। मैं पूछना चाहता था कि तभी निशा भी मुझसे पीछे से चिपक गई और बोली "नई बहन के मिलने के बाद पुरानी को भूल मत जाना"
मुझे हंसी आ गई पलट कर निशा को भी एक हाथ से गले लगाते हुए कहा" मैं भूलना भी चाहूंगा तो तू है ना मुझे याद दिलाने के लिए"
ये कहकर हम तीनों ही मुस्कुराने लगे।
मुझे अपना सवाल याद आया तो नलिनी दीदी से पूछा" आप को मेरे बारे में निशा ने बताया था या "
नलिनी दीदी ने कुछ ऐसा कहा कि निशा को भी अभी तक नही पता था इसलिए बात पूरी होते होते आंखे आश्चर्य से बड़ी होती गई।
क्रमशः
No comments:
Post a Comment