Thursday, May 27, 2021

कच्चा मन पक्का प्यार भाग प्रथम

जी पी एम स्कूल का एक आम दिन, जिसमे बच्चे कुछ पानी की टंकियों पर बात कर रहे है, कुछ क्लास में बैठे एक दूसरे को मुह चिढ़ाते जा रहे है, कुछ क्लास मे मेज पर बैठे अपने प्रवचन से दोस्तों में अपने सर्वोपरि होने का भ्रम जगाने की कोशिश में ज्ञान पेल रहे है, कुछ पढ़ भी रहे है ।

वही एक बच्चा स्कूल के दूसरे मंजिल की सीढ़ियों पर एकांत में बैठ कर अपनी ही दुनिया मे खोया है । तभी उसका साथी ढूंढते हुए पहुंचता है।

" क्या कर रहा है यहाँ सीढ़ियों पे, जानता है आज रश्मि ने ट्रीट देने को अड्डे पर बुलाया है, चलेगा क्या "सुमित सीढ़ियों पर बैठते हुए बोला, रंजन अब भी फर्श पर गिरे पानी को टकटकी लगाकर देख रहा था,
" अबे एक्सपायर हो गया क्या " सुमित बैग मारते हुए बोला
रंजन ने चौक कर सुमित को देखा, वो अभी बैग लगने गिरते गिरते बचा था, संभलते हुए उसे चिढ़ाने के अंदाज में बोला" आ गया बृंदा मैम से पिटकर " 

मुह बनाते हुए सुमित ने बैग खोलते हुए  कहा " ला साले फिजिक्स की कॉपी दे, खुद तो आइंस्टीन पैदा हो गया, कभी कोई सवाल गलत ही नहीं होता, और हम घर पर भी पिटे और स्कूल में भी "
रंजन ने मुस्कुराते हुए कॉपी थमाई और बोला " ओ या आई ऍम अ कॉम्पलैन बॉय , हा हा हा"
सुमित ने फिर रंजन को गौर से देखते हुए कहा " क्या , अभी किसके ख्यालों में था "
रंजन हिचकिचाया " क्या यार कुछ नहीं "
" अबे बोल दे ...' सुमित ने पैन की नोक बन्दूक की तरह रंजन के सिर पर तान दी , पर तभी कुछ सोच कर मुस्कुराने लगा।
" हाँ यार बस रजनी मैम के बारे में सोच रहा था " रजन ने सुमित का पैन हटाते हुए कहा
" मैं अब भी कह रहा हूँ वो सिर्फ तुझे बाकि मैम की तरह बस पसंद करती है और कुछ नहीं, तू मुफ्त में सेंटी हुआ जा रहा है " सुमित ने कॉपी पर लिखते लिखते बोला
रंजन फिर किसी दुनियां में जा चूका था। 

रंजन को कुछ वक्त पहले क्लास में जब उसकी कॉपी देखकर उसके गाल पर प्यार से रजनी ने जो हाथ फिराया था वो अभी भी चलता महसूस हो रहा था। ये सब उसके शरीर मे गुदगुदी दौड़ाने के लिए काफी था ।इसलिए ही वो मुस्कुरा रहा था।
" अबे वो रजनी मैंम तुझे बच्चा समझ के प्यार करती हैं तू मरा जा रहा है और वो अंजलि फिर तेरे लिए पराठे लाई थी वो कुछ नहीं " सुमित ने गले में हाथ डालते हुए कहा
रंजन ने चौंक कर खड़े होते हुए कहा " तूने उसे बताया तो नहीं मैं यहाँ हूँ "
" मैं तेरा सच्चा यार हूँ , बस यार पराठे खा कर इतना बोल दिया की तुझे पराठे अच्छे लगे " सुमित ने शरारती मुस्कुराहट से कहा 
" अबे साले खा खा  कर ढोल हो गया है फिर भी ..." पेट पर घूंसा मारते हुए रंजन ने सुमित को गिरा दिया।
" आह उई मां आह आह .." सुमित पेट पकड़ कर लेट गया।
रंजन गंभीर होते हुए सुमित के पेट को सहला कर पूछने लगा " सॉरी सॉरी यार ज्यादा तेज लग गया क्या "
" अबे इतने टेस्टी पराठों के लिए मैं इससे ज्यादा दर्द झेल सकता हूँ" सुमित ने सीढ़ियों पर लेटे मुस्कुराते हुए कहा

" साले अगर अगली बार तूने मेरा नाम लेकर पराठे खाये तो तुझे लूज मोशन की दस बारह गोली खिला दूंगा " रंजन ने सुमित के पैरों पर लात मारी और चलते चलते बोला " आ जा रोहिणी मैम क्लास में लेट आने वालों के साथ क्या करती है याद है या नहीं "

इसे सुनकर सुमित भी पीछे पीछे चला गया


रंजन, एक 14 साल का पढ़ाई में होनहार, पर दिखने में ठीक ठाक लड़का था । 

पर उसके चेहरे पर उसकी हमेशा रहने वाली मुस्कुराहट उसे सभी से अलग करती थी।

अभी उसकी जिंदगी घर से स्कूल और घर से ट्यूशन तक ही सीमित थी। पर रंजन भी था तो एक लड़का ही और वो भी इस खतरनाक उम्र में जिसमे सामान्यतः सभी अपना पहला प्यार पाए न पाएं पर पहले आकर्षण से कोमल मन को उलट पुलट होने से नही बचा पाते।

 ऐसा ही रंजन के साथ हो रहा था और इन दिनों रंजन पहले प्यार की उलझनो में जवान हो रहा था और ये प्यार था या आकर्षण ये उसे भी नही पता और उस पर एक और मुसीबत पहला प्यार आया भी तो किस पर, उसकी मैथ की टीचर रजनी पर।

रंजन के घर मे कोई ज्यादा सदस्य तो थे नही, उसकी बड़ी बहन चांदनी उर्फ चैरी, एम बी ए कर के दिल्ली में नौकरी कर रही थी I प्रोफ़ेसर माँ सुमन और बिजनेसमैन पिता अशोक के बीच अब रंजन ही केंद्र बिंदु था Iइसलिए रंजन को अपनी किसी मांग को 24 घंटे से ज्यादा इंतजार कभी नही करना पड़ता था पर साथ भी रंजन की हर मांग पूरी होने की और वजहे भी थी जैसे उसका सामान्य से ज्यादा संवेदनशील होना, हर काम को बहुत जल्दी सीख जाना, और फिजूलखर्ची नही करना उसके माँ और पिता दोनों को ही उसकी हर मांग को जायज मानने के काफी था ।रंजन को उसका भविष्य बनाने को लेकर चिंता की जरूरत कभी उसके पिता के जैसा बिजनेसमैन बनने की आकांक्षा के कारण महसूस ही नही हुई।

 सुमित मध्यमवर्गीय परिवार  का इकलौता बेटा था और रंजन का इकलौता दोस्त भी । सुमित के शौक थे पसंद का खाना और शतरंज खेलना । उसके भविष्य को लेकर बहुत सपने थे पर रोज बदलते रहते थे । वो डीलडौल में मोटा होने के कारण क्लास में मजाक का पात्र जरूर बन जाता था पर रंजन का साथ उसे सब भुला देता था ।

उनके ही क्लास की एक लड़की बड़ी सुंदर मासूम और हंसमुख अंजलि थी जो रंजन से बेइंतिहा प्यार करती थी।

उसका हर दिन रंजन का फोटो देखकर शुरू होता था ।फिर सारा दिन रंजन के आगे पीछे घूमने के बाद शाम को उसके साथ बाइक पर ट्यूशन जाने के बाद भी रात को फ़ोन पर भी उसकी बातें होती थी। 

अंजलि के प्यार के बारे में रंजन को छोड़कर सभी जानते थे पर रंजन को लगता था कि रजनी मैम ही उसका पहला और आखिरी प्यार है । रजनी सुमित की पड़ोसी भी थी इसलिए अक्सर सुमित उनके साथ उनकी स्कूटी पर आता दिखाई दे जाता था तो उसकी किस्मत से रंजन को जलन होने लगती थी कि कैसे ये रजनी मैम के साथ बैठा है और मैं तो केवल स्कूल में ही उन्हें देख सकता हूँ और ये तो उनके साथ घर तक जाता है ।

मैम का पड़ोसी है क्या करता मन मसोस कर रह जाता था इधर अंजलि को हर हाल में बस रंजन का साथ चाहिए होता था और रंजन के घर से बस कुछ दूर ही रहती थी इसलिए उसी के साथ बस में आती जाती थी रंजन की तरह ही अमीर घर की शहजादी थी और उसके पिता विदेश में रहते थे वो अपनी माँ उर्मिला और एक छोटे भाई सुमित के साथ रहती थी ।अंजलि के परिवार को यहाँ रहते कुछ साल ही हुए थे पर अंजलि की माँ और रंजन की माँ में अच्छी दोस्ती हो गई थी क्योंकि लगभग रोज ही उनकी मुलाकात रंजन के बस स्टैंड पर हो जाती थी ।

अक्सर रंजन अपनी बाइक पर अंजलि की माँ को मार्किट ले जाना, उसके घर के कामों में हाथ बटाना भी आम बात थी, इसलिए दोनों परिवार काफी घुलमिल चुके थे । अंजलि की माँ से भी अंजलि का रंजन के लिए प्यार कोई छुपा नही था ।

इसलिए एक बार अंजलि की माँ ने इस बारे में रंजन की माँ से बात की 

अंजलि की माँ ने कहा" रंजन इतना प्यारा है कि उसे प्यार करे बिना कोई रह ही नही सकता"

रंजन की माँ ने अंजलि की बात के भाव से अनजान होने के कारण कहा" वो तो है, पर आज ये सब तुम्हे कहने की जरूरत क्यों पड़ गई"

अंजलि की माँ ने मुस्कुराते हुए बात को आगे बढ़ाया" हम्म आज कुछ खास हुआ इसलिए कहना पड़ा"

रंजन की माँ ने आश्चर्य से पूछा" ऐसा क्या हो गया"

अंजलि की माँ ने सपाट लहजे में कहा" अंजलि रंजन को बहुत प्यार करती है"

रंजन की माँ ने सामान्य होते हुए कहा" तो इसमें कौन सी नई बात है, अभी खुद ही तो तुमने कहा कि रंजन इतना प्यारा है कि कोई भी उसे प्यार करने लगेगा"

अंजलि की माँ ने अपनी बात का मतलब न समझते देख रंजन की माँ के हाथ पर हाथ रखकर बोली" सुमन वो प्यार नही वो बाला प्यार "

रंजन की माँ ने समझने की कोशिश करते हुए कहा"वो वाला, कौन सा वाला"

अंजलि ने खुलकर कहा" गर्लफ्रैंड बॉयफ्रेंड वाला"

अब रंजन की माँ ने चौकते हुए कहा" क्या सच मे, तुम्हे कैसे पता चला"

अंजलि की माँ ने गहरी सांस लेते हुए कहा" मैंने देखा कि सुबह सुबह वो फ़ोटो को छू कर सिर से लगा रही थी"

रंजन की माँ ने असमंजस में कहा" मतलब "

अंजलि की माँ ने समझाया" वो मैं अंजलि के पापा के फ़ोटो को देखकर उठती हूँ और फ़ोटो छूकर सिर से लगाती हूँ, उसने मुझे ऐसा करते देखा होगा, इसलिए आज सुबह मैंने देखा कि वो अपनी किताबो के बीच से रखे फ़ोटो को छूकर सिर से लगा रही थी, पहले मुझे लगा भगवान का फोटो देख रही है पर जब उसके जाने के बाद मैं किसी काम से उसके कमरे में गई तो उत्सुकताबश मैंने किताबो के बीच टटोल कर देखा, तो रंजन का फोटो था, इसलिए ही मैंने आज ये बात तुमसे कही"

अब रंजन की माँ थोड़ा गंभीर होकर सोचने लगी। अंजलि की माँ ने देखा तो उसे लगा उसने बता कर कुछ गलत कर दिया तो बोली" सॉरी अगर तुम्हे मेरी बात बुरी लगी हो तो माफ कर दो, पर मुझे शक तो उसकी बातों से पहले ही था क्योंकि उसकी दिन भर की बातों में कई बार रंजन के बारे में ही बातें रहती थी, वो अपने भाई तक को पढ़ाई के बारे में रंजन की बड़ाई करते हुए ही बताती थी और तो और अगर कभी मजाक में भी रंजन की किसी बात को बुरा कहा तो ऐसे चिढ़ जाती है जैसे उसे ही बुरा कह दिया हो।"

ये सब सुनकर रंजन की माँ का चेहरा धीरे धीरे सामान्य हो चला था और मुस्कुराते हुए कहा" तो तुम ये क्यों नही कहती कि हमारी बेटी बडी हो गई है अब उसके हाथ पीले हो जाने चाहिए, हा हा हा"

अंजलि की माँ को मजाक समझ नही आया, तो थोड़ा गंभीर हो गई तो रंजन की माँ ने उस बात को समझते हुए अंजलि की माँ का हाथ दवाते हुए कहा" तुम क्या सोचने लगी मैं मजाक कर रही थी"

अंजलि की माँ को अभी भी लग रहा था कि रंजन की माँ को बात बुरी लगी है पर वो हंसी में छुपा रही है। उसके इस भाव को पढ़कर रंजन की माँ ने आगे समझाते हुए गंभीरता से कहा" तुम्हें क्या लगा मुझे बुरा लगा इस बात का, ऐसा नही है अगर मेरा रंजन लाखो में एक है तो अंजलि भी किसी से कम नही है, मुझे इस बात के कारण कोई दिक्कत नही पर मैं इसलिए सोच में पड़ गई थी कि अभी हमारे दोनों बच्चे छोटे है और मैं उनके भविष्य के बारे में सोचने लगी और साथ ही ये भी की ये केवल उसका आकर्षण हुआ तो सब बिगड़ भी सकता है"

अंजलि की माँ के चेहरे पर कई भाव आते चले गए और बात को सुनकर खुद ही सोच में पड़ गई।

रंजन की माँ ने अंजलि की मां की हालत देखकर माहौल हल्का करने को कहा" चल कुछ भी हो, तू वादा कर घर मे या बच्चों से अभी इस बारे में कुछ नही कहेगी, वक़्त आने पर मैं खुद ही बात करूंगी, और हाँ ये मेरा वादा रहा अगर दोनों बच्चों को भविष्य में भी ऐसे ही प्यार बना रहा तो मैं खुद तेरी लड़की का हाथ मांगने तेरे घर आऊंगी "

इतना सुनते ही अंजलि की माँ की मुस्कुराहट वापस लौट आई। और उसने रंजन की माँ को गले से लगा लिया।

गले लगाए लगाए अंजलि की माँ ने कहा" मैं तो इसी वजह से डर रही थी, की अगर तुमने अंजलि रंजन के प्यार को स्वीकार नही किया तो..."

रंजन की माँ ने कहा" तो क्या, अंजलि तुझसे ज्यादा मुझे प्यारी है, आज सुन ले मैंने रंजन और अंजलि के प्यार में कभी कोई अंतर नही किया, और आगे भी कभी होने नही दूंगी समझी"

अंजलि की माँ के आंसू छलक आये जिन्हें वो पोंछ कर मुस्कुराने लगी।

इसके बाद ना तो दोनों में से किसी ने इस बारे में बच्चों से कुछ कहा और ना ही बात के बारे में किसी को घर मे बताया।

मगर रंजन था कि हमेशा अपनी रजनी मैम के सपनो में खोया रहता था और इसी उधेड़बुन में जिंदगी बीतने लगी ।

एक दिन गर्मियों की सुबह थी और दीवार से टिका रंजन स्कूल की बस का इन्तजार कर रहा था, रंजन की माँ को आज घर मे ही काम निकल आया तो वो साथ नही थी तो रंजन बात करने के लिये अंजलि का बेसब्री से इंतजार करने लगा तभी अंजलि बड़ी उदास होकर आई ।रंजन ने देखा और छेड़ने के अंदाज में बोला "क्या हुआ अंजू आज इतना सन्नाटा क्यों है"

अंजलि ने चुप्पी तोड़ने नाम ही नही लिया और रंजन के पास से हटकर खड़ी हो गई ।

रंजन को लगा आज ये इतनी नाराज किस बात पर है जो मुझसे बात नही कर रही पर उसने कुछ पूछने को कदम बढ़ाए तब तक बस आ गई और दोनों उसमे बैठ गए । अंजलि वैसे ही चुप्पी साधे रही स्कूल पहुच कर भी ऐसे ही दिन जा रहा था फिर सुमित ने भी उससे पूछने की कोशिश की पर उसने कुछ बताया नही और इसी तरह स्कूल से घर जाने के बाद जब अंजलि उससे बिना बोले घर चली गई तो उसे अचरज हुआ कि पहले तो कभी इतना चुप इसको नही देखा आज बात क्या है 

रंजन घर पहुंचा फ्रिज से निकाल कर खाना गर्म कर खाया और लेट गया तब तक रंजन की माँ भी आ गई 

और रंजन से पूछा " खाना खा लिया "

रंजन ने कहा "हा"

रंजन की माँ ने कॉफ़ी बनाई और एक कप रंजन को देती हुई बोली क्या हुआ "आज मेरा बेटा किस सोच में डूबा है"

रंजन बोला"कुछ नही माँ आज अंजलि सुबह से उदास थी कुछ बताया नही ऐसा तो वो तब भी नही करती जब वो खुद बीमार हो , कुछ बात तो जरूर है"

रंजन की माँ मुस्कुराते हुए "अरे बेटू को दोस्त की इतनी फिक्र , चल तू कॉफ़ी पी मैं फोन करके अंजलि के घर पता करती हूं"

रंजन की माँ फ़ोन पर कुछ देर बात करती है फिर वो खुद भी परेशान हो जाती है ।फिर कुछ सोचते हुए रंजन से कहती है " तू परेशान मत हो अभी मैंने अंजलि को बुलाया है उससे कुछ बात पता कर बताती हु"

थोड़ी देर में अंजलि आ जाती है और माँ के साथ किचिन में चुपचाप खड़ी होकर कुछ काम मे हाथ बटाने लगती तभी रंजन की माँ उसके सिर पर हाथ फेर कर बड़े प्यार से पूछती है " आज मेरी अंजू इतनी चुप है कि उसके होने का तो पता ही नही चल रहा "

इतना कहने की देर थी कि जैसे अंजू का दिल का गुबार आंसुओ के साथ बहने लगा और उसे रंजन की माँ ने गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगी।

अंजू तो आज जैसे भरी पड़ी थी सिसकियों के साथ रोते रोते उसने रंजन की माँ को और कस के पकड़ लिया और उनका पूरा कंधा आंसुओ से भीगा दिया ।कुछ देर बाद जब आंसू कम हुए तब रंजन की माँ उसे रसोई से बाहर लेकर डाइनिंग टेबल के पास कुर्सी पर बिठा कर उसे पानी दिया और फिर उसके आंसू पोछ कर उससे फिर से बड़े प्यार से पूछा "अंजू कुछ बताओ भी तो अब कितना रोओगी देखो अब तुम नही चुपी तो मैं भी रोने लगूंगी "

इतना सुनते ही एक नजर रंजन की माँ पर डाल अपने आंसू पोंछकर बोली " कल हमारे घर दादी आई थी जब मैं स्कूल से घर पहुंची तो मम्मी से बोली अब बहुत हुआ इसकी पढ़ाई बंद कराकर इसके हाथ पीले करो इसे क्या कलेट्टर बनाओगी इस पर मम्मी ने कहा अभी ये छोटी है 

इंटर तो पढ़ लेने देते है फिर सोचेंगे तो दादी बोली जैसी मा वैसी बेटी इसके छोटे छोटे कपड़ें नही दिख रहे पूरी घोड़ी हो गई है तुझे शहर में क्या भेजा बेशर्म हो गए है  राम राम राम इस पर मम्मी बोली ये तो स्कूल ड्रेस है सभी लडकिया पहनती है इस पर दादी ने कहा देख मैं तो जा रही हूँ पर आने दे मेरे बेटे को फिर सबसे पहले इस लड़की की शादी ही कराउंगी तभी चैन से बैठूंगी इतना कहकर दादी चाचा के साथ चली गई पर मुझे डर लग रहा है कि मेरी पढ़ाई का क्या होगा "

रंजन की माँ ने अंजलि के हाथ को हाथ मे लेकर बोली "अरे बेटा इतनी सी बात मैं और तेरी मम्मी तेरे लिए इस पूरी दुनिया से लड़ जाएंगे तेरी दादी क्या चीज है तू बस पढ़ाई पर ध्यान दे"

इतना कहने भर से अंजलि के चेहरे पर मुस्कान पूरे दिन में पहली बार लौटी ये देखकर रंजन के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई जो उन दोनों की बातों को अपने कमरे के दरवाजे की ओट से सुन रहा था और अपने कमरे से डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ते हुए बोला "मम्मी किसी के शादी में गए कई साल गुजर गए तो मम्मी लड्डू खाने कब चलना है "

इतना कहना था कि अंजलि उठी और रंजन आगे आगे अपने कमरे की तरफ बापस भागने लगा अंजलि पीछे पीछे बोल रही थी "रुक आज तेरा मुह ही लड्डू जैसा लाल कर देती हूं"

इतना कहते कहते रंजन बेड तक पहुंचकर पलटा तब तक अंजलि डोर मैट में उलझकर रंजन के साथ बेड पर गिर गई । अंजलि अभी भी किसी ख्वाब की तरह एक टक रंजन की आंखों में देख रही थी और रंजन भी आज पहली बार उसे इतने नजदीक से देख रहा था अंजलि के शरीर की खुशबू रंजन की सांसो में घुल कर उसे मदहोश कर रही थी पहली बार उसे उस छुअन का एहसास अजीब अजीब अहसास करा रहा था रंजन ने अंजलि के गुलाबी चेहरे को कई बार देखा था पर आज कुछ अलग था लग रहा था मानो गुलाबी गुलाब पर आंखे नाक और होंठ लगा दिए गए हो अंजलि का मासूम चेहरा रंजन को किसी और दुनिया मे ले गया ,रंजन और अंजलि के दिलों का एहसास एक हो चुका था पर तभी उसे माँ की आवाज बाहर से आई "क्या हुआ रंजन अंजलि गिर गई क्या " 

रंजन ने अंजलि को कंधे से पकड़ कर उठाया तो अंजलि की तंद्रा टूटी और वो दोनों हाथ से अपने चेहरे को शर्म से ढक कर वही बेड पर बैठ गई ।रंजन ने माँ को जवाब दिया " नही माँ बस गिरते गिरते बच गई"

माँ ने कहा " ठीक है तुम लोग बात करो मैं नहाकर आती हूँ "

रंजन ने अंजलि के हाथो को पकड़ कर हटाया तो अंजलि के शर्म से सेब जैसे लाल गाल दिखे तो रंजन की मुस्कुराहट और बढ़ गई अब एक नजर अंजलि ने रंजन को देखकर अपनी आंखें झुका दी ।

रंजन बोला"आज तुझे क्या हुआ ये दुल्हन की तरह शर्मा क्यों रही है बाहर तो अपनी शादी की धड़ल्ले से बातें कर रही थी"

इतना कहना था कि शर्म का गुलाबी रंग एक झटके में उतर गयाऔर अंजलि के आंसू एक बार फिर बहने लगे रंजन को पछतावा होने लगा कि अभी तो जैसे तैसे चुप हुई इसे फिर रुला दिया तो बोला" सॉरी सॉरी मुझे माफ़ कर दे मेरे कहने का वो मतलब नही था प्लीज् अब रो मत "

अंजलि फिर रोये जा रही थी तो रंजन ने उसके पैरों के पास बैठ कर उसके हाथों को हाथो में ले लिया और बोला " देख बड़ी मुश्किल से तेरे चेहरे की हंसी लौटी थी मुझे माफ़ कर दे अब दोबारा ऐसा नही करूंगा "

अंजलि रोते रोते बोली" तो ऐसी बात करता क्यों है "

रंजन ने दोनों कान पकड़े हुए कहा" अब बस ले कान पकड़ कर माफी मांग रहा हूँ अब तो माफ कर दे"

अंजलि ने अपने आंसू पोछते हुए कहा" ठीक है इस बार माफ कर दिया पर दोबारा बोला तो समझ लेना"

रंजन मुस्कुराते हुए बोला " ये हुई न बात पर अब मुझे बस एक दुख है एक शादी की दावत का नुकसान हो गया" और खिलखिलाने लगा ।

इतना सुनकर रंजन के सीने पर मारते हुए रंजन के गले लग गई रंजन भी उसके सिर पर हाथ फेरने लगा ।

रंजन और अंजलि दोनों ही बस ऐसे ही गले लगे थे दोनों की आंखे बंद हो चुकी थी सांसे दोनों जैसे एक साथ ले रहे थे जैसे एक जिस्म हो चुके हो और उनका अलग होने को दिल ही नही कर रहा था तभी बाहर से माँ की आवाज आई "रंजन अंजलि चली गई क्या"

रंजन के बोलने से पहले अंजलि ने रंजन से अलग होते हुए कहा "नही आंटी अभी यही हूँ "

ये कहते कहते एक बार फिर रंजन को देखकर अंजलि मुस्कुराई और रसोई की तरफ चली गई और रंजन उसके जाने के बाद अपने बेड में लेट कर अंजलि के मासूम चेहरे और उसकी प्यारी मुस्कुराहट के बारे में सोचने लगा ।

ऐसे ही लेटे लेटे उसकी नींद लग गई और फिर हड़बड़ाकर तब टूटी जब उसके माँ के चीखने की आवाज आई ...





नेकी का नेग भाग-1

कुंवर लाल सिंह, वैसे तो अपनी गली के सबसे धनिकों में से एक थे क्योंकि उनके मुताबिक "बीबी बच्चे का झमेला मात्र काँटों की गद्दी है जिस पर बैठ इंसान चाहे तो भी मुस्कुरा नही सकता बस दिखावा ही कर सकता है "| यही वजह थी कुंवर साहब ने अभी 44 सावन देखने के बाद भी गृहस्थ जीवन की लालसा नहीं की अब तो आलम ये था की बाल रंग लेने के बाद खुद को अक्सर लड़का समझने लगते थे | ऐसा नही की लोगों ने उन पर शादी के लिए दवाव नही डाला पर उन्होंने हिम्मत से अपनी पैरवी की और आखिर लोग मान गए ।

 फिर भी वक़्त जब गुजरता है तो वह कुछ देते हुए बहुत कुछ साथ ले जाता है । दिन में कुँवर साहब को अपने और शरणागतों के काम से फुरसत नही मिलती थी और रात में आधी रात तक अपने शौक से , अर्थात चित्रकारी । यह शौक शुरुआत से नही था पर अकेलेपन ने बहुत कुछ सिखा दिया था जिसमे से ये एक चित्रकारी थी । अब घर मे जब अकेले पुरुष हो तो सिर्फ एक ही चीज परेशान करती है वो है चूल्हा-चौका ।तो उनकी माता जी का निधन हुआ तभी उन्होंने सोच लिया था जीभ का चटोरापन तो है नही तो कभी थोड़ा कुछ बना कर जीवन जी ही लेंगे और वैसा ही अभी तक स्वयं को ढाल लिया था । 

माँ बाप के गुजरे अभी 2 साल बमुश्किल हुए थे पर घर का गुजारा करना मुश्किल होने लगा क्योंकि कभी काम धाम तो कुछ कभी किया नही जो पूंजी बाप दादा ने छोड़ी वो कुछ हद तक खत्म होने को आ गई थी।किसी ने सही कहा है अगर खाली बैठकर राजा भी खाए तो किसी दिन उसके हाथ भी खाली हो ही जाते है ।

परेशानी बड़ी थी सो कुंवर साहब ने इसके लिए कोई जुगत ढूंढने लगे पर चुपचाप क्योंकि भई किसी को पता चल जाता तो कुंवर साहब की बस इज्जत ही बची थी वो भी चली जाती ।

एक दिन कुंवर साहब अकेले बैठे बैठे ऊंघ रहे थे कि किसी ने बाहर से आवाज लगाई कुंवर साहब क्या घर मे है।

कुंवर साहब बोले "आते है भाई बैठक में बैठिये तब तक "

थोड़ी देर में कुंवर साहब बाहर आये तो सामने बैठे व्यक्ति ने कहा" साहब इस समय आपको परेशान किया इसके लिए माफी चाहता हु "

कुँवर साहब मुस्कुराते बोले " अरे परेशानी कैसी बताइये कैसे आना हुआ"

व्यक्ति ने बिनती के लहजे में कहा" बस साहब कुछ नही मेरे घर की पिछली दीवार ढह गई सो अब खुले में रहने को मजबूर हु अगर आप .."

कुंवर साहब कुछ समझते हुए बोले" इन दिनों मैं भी कुछ मुश्किल दौर से गुजर रहा हु पैसो की थोड़ी किल्लत है वरना आपकी जरूर मदद करता"

व्यक्ति गर्दन हिलाते बोला " अरे नही बात पैसो की नही है बात ये है कि मेरा समान खुले में पड़ा है बारिश के दिन आने वाले है और अभी तो मैं घर ठीक कराने लायक पैसे नही जोड़ पाया हूं इसलिए आया था ..कुछ तीन चार महीनों के लिए शरण मिल जाती तो बड़ा उपकार होता"

कुंवर साहब ने दिल मे सोचा अब तो हम खुद ही इतने बुरे दौर से गुजर रहे है अगर इन लोगो को पता चला तो रही सही इज्जत दाव पर है।

कुंवर साहब का आदतन अब मदद करने का जी भी कर रहा था पर घर के हालात खुल जाने का डर भी था तो सोचा कि कुछ महीने की तो बात है और नौकरो के कमरे तो कब से हम देख भी नही पाए कि कितने कबूतरों ने घर बना लिया ये सोचकर कुछ दिल मे ठान लिया और मुस्कुराते हुए व्यक्ति से बोले "देखो भाई अगर तुमने हमारे बाबा साहब (पिता जी) से ये कहा होता तो अब तक तुमको धक्के देकर भगा दिया होता मगर हमारा दिल किसी की परेशानी में .."

व्यक्ति कुंवर साहब के घुटनो पर दोनों हाथ रखते बोला "माई बाप है आप हमारे आपके मोम जैसे दिल की वजह से ही तो इतने फरियादियो का मेला लगा रहता है आप के दर से कोई खाली आज तक नही गया "

कुंवर साहब ऐसी बातें सुनकर इतने फूल कर कुप्पा हो गए की बोले " तुम बहुत अच्छे इंसान लगते हो इसलिए तुम उन आम के पेड़ के नीचे वाले कमरों में रहने लगो "

व्यक्ति बोला "आपकी बहुत बहुत मेहरबानी"

कुंवर साहब बोले"कौन कौन है तुम्हारे घर मे "

व्यक्ति बोला " मेरी बीबी तो बीमारी में गुजर गई और आप की दया से मेरे दो बच्चे एक विधवा बहन और माँ है "

कुंवर साहब ने कहा " कब से रहने आओगे "

व्यक्ति बोला "आपकी इज़ाज़त हो तो कल शाम तक सारा सामान ले आऊंगा"

कुंवर साहब बोले" ठीक है चाबी ले लेना आकर"

इतना सुनकर खुशी खुशी व्यक्ति चला गया ।

उसे जाते देख किसी की मदद करने का संतोष कुंवर साहब के चेहरे पर था पर सोच रहे थे इन लोगो को घर से दूर कैसे रखूं की इन्हें मेरे हालात पता न चले कुछ सोचना होगा ।

कुंवर साहब के दिमाग मे पूरे दिन अपनी शान खोने के डर की उहापोह में लगे रहे


सूरज पर ग्रहण भाग प्रथम

सूरज कहने को तो बड़ा शांत लड़का था पर आज किसी अपने को इस हालत में देख कर खुद को  चीखने से रोक नहीं पाया | दरअसल उसकी बहन निशा सीढ़ी से गिरकर बेहोश हो चुकी थी |
और  वो हाथो में उसे उठा कर दरवाजे की तरफ दौड़ा जा रहा था की तभी पीछे से उसकी बुआ की गरजती हुई आवाज आई "क्या कर दिया तूने निशा को "
उसने चलते चलते कहा " ये गिर कर बेहोश हो गई "
इतना सुनते ही मानो निर्मला देवी का गुस्सा तो आसमान छूने लगा और तेज क़दमों से आकर सूरज की पीठ पर दो बजनदार घूसे लगाये |

निर्मला देवी ने चीखते हुए कहा " क्यों रे जब तक हम दोनों को भी नहीं खायेगा चेन से नहीं बैठेगा जैसे लाला जी को खा गया, जरूर तूने ही धक्का दिया होगा देखो तो कितना खून निकल रहा है, पड़ गई तेरे कलेजे को ठंडक , तू उसी सड़क पर मर क्यों नहीं गया जहाँ से तुझे लाला जी तुझे उठा के लाये थे ",
अब कोई भी आवाज सूरज के कानों तक नहीं पहुँच रही थी उसे बस निशा की उस चोट की फिक्र थी जो उसके सर में लगी थी उसने बहुत कोशिश की निशा की बेहोशी टूटी नहीं तो फिर वह निशा को उठा कर बाहर रिक्शे की तरफ बढ़ने लगा इस पर बुआ ने उसकी शर्ट पकड़ कर कहा "तुझ जैसे मनहूस की तो परछाई भी अब निशा पर नहीं .."
इतना ही निर्मला कह पाई कि सूरज की लाल आँखे और रोइ सी आवाज ने उन्हें चुप हो जाने पर मजबूर कर दिया, सूरज बोला"बुआ जी बस मुझे अस्पताल जाने दो फिर जो चाहे कह लेना |"
और इतना सुनने पर निर्मला ने सूरज की शर्ट को छोड़ दिया |

 
आज अस्पताल में सूरज का दूसरा दिन था, निशा सो रही थी और निर्मला निशा के सर पर  हाथ फेर रही थी और सूरज डॉक्टर को रिपोर्ट दिखा रहा था | चैक अप होने और सारी रिपोर्ट् देखने के बाद डॉक्टर ने सूरज की तरफ देखकर कहा," तुम्हारी बहन बड़ी किस्मत बाली है कोई बड़ा फ़ैक्चर नहीं हुआ , सारी रिपोर्ट नार्मल है, अब हम इसे नार्मल वार्ड में शिफ्ट कर रहे हैं कल इसे डिस्चार्ज करा लेना |
डॉक्टर के जाने के बाद पास खड़ी नर्स मेनन ने दवाइयाँ निकालते हुए कहा " सच में इस लड़की की किस्मत बहुत अच्छी है वरना इतना फिक्र करने वाला भाई कहाँ मिलता है, अब तो जाकर थोड़ी देर सो लो सूरज वर्ना ये ठीक हो जायेगी और तुम बीमार हो जाओगे " इतना कह कर मुस्कुराने लगी |
अगले दिन निशा को घर लाया गया और सूरज ने जैसे ही निशा को बिस्तर पर लेटाया, निशा बोली" सॉरी भैया मेरी गलती थी और डाँट आपको लगी "
" अरे नहीं पगली कोई बात नहीं ये तो तेरे लिए उनका प्यार था "सूरज ने उसके लटके हुए निशा केे पैर बिस्तर पर रखते हुए कहा |
"नहीं भैया मैं हमेशा से मां का व्यवहार देखती आई हूँ उन्होंने जरूर तुम्हे खूब खरी खोटी सुनाई होगी मुझे पता है" इतना कहना था सूरज ने अपने होंटों पर ऊँगली के इशारे से निशा को मुस्कुराते हुए चुप रहने का इशारा किया और बोला"अब बात नहीं बाक़ी बातें कल होंगी सो जाओ"

इतना कहते हुए निशा बोली " मैं सो जाउंगी पर आप बादा करो जबतक मैं सो नही जाती आप यही बैठोगे "

इतना कहकर सूरज की गोद मे सिर रख कर लेट गई सूरज भी प्यार से उसके  सर पर हाथ फिराने लगा और 

धीरे धीरे निशा नींद की आगोश में चली गई।

रात भर की अपने बिस्तर की नींद ने निशा की चेहरे की रौनक लौटा दी थी जिसे देख कर सूरज भी खुशी खुशी काम पर जाने को तैयार था पर अभी लगता है कि सूरज पर लगा ग्रहण हटा नही था । 

पिछले दो दिन से सूरज दुकान पर खुद नही जा पाया था और इसी कारण दुकान पर काम करने वाले लड़के अमर और रंजीत ही दुकान का काम संभाल रहे थे ।

करीब 11 बजे निर्मला देवी जब गल्ले पर आकर बैठी तो पता चला तिजोरी से 2000 का एक नोट कम है निर्मला देवी तो कई दिन से इस बात शक था कि सूरज पैसे की चोरी कर रहा है आज यकीन हो गया । इसी शक की बजह से ही तो निर्मला देवी ने नोटों को गिन कर रखा था । अब तो उन्होंने आब न देखा ताव सूरज को बुला कर दो झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद दिए । सूरज के आंसू निकल आये पर फिर भी निर्मला की तरफ प्रश्नवाचक निगाह डाली तो निर्मला ने गला फाड़ कर चीखना शुरू किया और बोली"हाय हाय ये लड़का तो हमे जब तक सड़क पर नही ले आएगा नही रुकेगा अभी हजारो रुपये का अस्पताल का खर्चा कराया और अब चोरी पर उतर आया  तू ऐसा निकलेगा मैं जानती थी कितनी बार कहा इस नाली के कीड़े को वही सड़ने दो लाला जी नही माने ..हाय हाय खुद तो चले गए इस करमजले को भी साथ  ले जाते " 

इतना सुनकर आस पास के दुकानदार और ग्राहक भी ये सब देख कर माजरा समझने की कोशिश करने लगे तभी एक महिला अंदर आई और बोली "क्या हुआ बहन जी "

निर्मला देवी ने कहा " देखो ना मैंने जरा सा अपनी लड़की के इलाज पर ध्यान देना क्या शुरू किया ये लड़का तो चोरी पर उतर आया"

महिला बोली" ऐसे चोरों को तो पुलिस के हवाले कर देना चाहिए रुकिए अभी बुलाती हु "

निर्मला देवी को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई हो जोर देते हुए निर्मला ने कहा " हाँ बुलाइये वही उगलवाएँगे इसके मुँह से "

इतना सुनते एक आदमी अंदर आया और बोला " क्या हुआ मैडम "

इतना सुनते ही वो महिला आदमी को देखकर मुस्कुराने लगी बोली " देखिए ना हबलदार साहब ये मासूम सा लड़का जो सुबक रहा है कितना डीठ है कि चोरी के बारे में इतना पिट के भी कुछ नही बोल रहा है "

हवलदार बोला" अच्छा , ओये बता कहा गया नोट बरना थाने ले जाकर इतने बेंत मारूंगा की पिछले जन्म का भी याद आ जायेगा"

सूरज जो कोने में खड़ा सुबक रहा था कि कैसे समझाए की चोरी उसने नही की ।

हवलदार ने सूरज की कॉलर को खींचते हुए कहा " चल जब तेरी मर्जी और ठुकाई की है तो मैं भी क्या कर सकता हु अच्छा मैडम इसे ले जा रहा हु इसकी बोलती खुलते ही बताऊंगा"

"अरे रुकिए इसका झाड़ा तो ले लीजिए हवलदार जी" महिला ने सूरज का हाथ पकड़ कर रोकते हुए कहा

हवलदार को बात सही लगी और उसने सूरज का झाड़ा लेते हुए एक 2000 का मुड़ा हुआ नोट निकाल कर निर्मला को दिखाया तो निर्मला चौंक उठी "हॉ यही है यही तो है " और नोट को लेकर तुरंत गल्ले में डाल दिया

"बहुत बहुत शुक्रिया हवलदार जी " निर्मला ने हंसते हुए कहा

हवलदार ने भी हंसते हुए कहा " इस शुक्रिया से क्या होगा देना है तो एक 2 किलो अरहर की दाल दे दीजिए हे हे हे"

निर्मला समझ गई आज तो ये हवलदार उसका 300 का चूना लगा कर जाएगा तो बोली" अरे अमर जरा 2 किलो बढ़िया वाली अरहर की दाल तो ले आ "

महिला ने हवलदार से कहा "अरे हवलदार जी इस लड़के को तो रंगे हाथ पकड़ लिया फिर भी छोड़ रहे हो जरा कुछ दिन जेल में डालो वरना फिर से बड़ी चोरी करेगा"

हवलदार ने हामी भरते हुए कहा" सही कहा मैडम आपने ये साले इस उम्र में चोरी सीख गए तो बड़े होकर डाके डालेंगे इसे तो दिन नही महीने भर जेल में डालूंगा"

इतने में अमर दाल ले आया जिसे लेकर हवलदार एक हाथ मे दाल और दूसरे से सूरज का कॉलर पकड़ कर ले गया ।

 ये देखकर निर्मला ने चैन की सांस ली और महिला से बोली "बहनजी आपने तो कमाल कर दिया इतनी जल्दी तो करमचंद जासूस भी नही ढूंढ पाते ही ही ही "

महिला बोली " हा बहन जी मेरा दिमाग बहुत तेज चलता है उसी के लिए तो बादाम आधा किलो दे दीजिए"

महिला पैसे दिए और बादाम लेकर बोली " चलिए आपकी उस चोर लड़के से जान छुटी अब इन लड़को को जरा दबा कर रखियेगा"

निर्मला देवी बोली " हा बहनजी मैं तो उस सूरज के बच्चे को जन्म से ही जानती हूं बड़ा दुस्ट है अच्छा हुआ अब तो मैं गंगा नहाई वो इतने साल लाला जी की बजह से बर्दास्त कर रही थी वार्ना तो कबका धक्के मार के निकाल दिया होता ।

महिला ने कहा " अच्छा ठीक है फिर मैं चलती हु"

इतना कहकर महिला ने अपनी स्कूटी उठाई और आगे बढ़ गई थोड़ी देर बाद थाने के बाहर खड़े सूरज और हवलदार के पास जाकर रुकती है । सूरज अभी भी उस चोरी वाले दुःस्वप्न में खड़ा हवलदार के पास सिर झुकाए खड़ा था । कि तभी महिला की आवाज से चौंक जाता है महिला मुस्कुराकर हवलदार से कहती है "शुक्रिया आपने मेरी बहुत मदद की " इस पर हवलदार कहता है "इसमें शुक्रिया कैसा मैंने तो बस अपना फर्ज निभाकर इस मासूम को उस जालिम से बचाने में आपकी मदद की है और मुझे तो मेरा इनाम भी 2किलो दाल के रूप में मिल चुका हा हा हा"

महिला हंसते हुए कहती है "जी हवलदार जी सही कहा कर भला तो हो भला"

इतना सुनकर हवालदार सूरज को वहाँ छोड़कर थाने में अंदर चला जाता है और सूरज उसे पीछे से देखता रहता है कि शायद वो लौट कर फिर उसे थाने ले जाने आएगा

पर तभी सूरज को देखते हुए महिला बोली "चलो सूरज पीछे बैठो"

सूरज वही जड़वत खड़ा अचम्भे से महिला को देख रहा था।अभी तक जो हुआ वो उसके साधारण मन के परे था

महिला ने सूरज की हालत समझते हुए कहा " देख सूरज मैं तुझे घर चलकर सब बताती हु अभी बस इतना समझ की आज से तू अकेला नही अब तेरी दीदी तेरे साथ है चल अब स्कूटी पर बैठ तुझे तेरा नया घर दिखाती हु "

सूरज कुछ जिज्ञासा से फिर कहना चाहता है" पर दीदी ..."

इतना कहते महिला उसका हाथ थाम कर स्कूटी की तरफ कर देती है और सूरज स्कूटी पर बैठकर बिना कुछ बोले बस अपनी जिंदगी की उठापटक को देखकर मुस्कुराने लगता है मानो उसे अपने भविष्य में कुछ अच्छा होने की आशा की किरण दिख रही हो

                               क्रमशः

                           


Wednesday, May 26, 2021

कौन अपना कौन पराया भाग 1

पात्र 

सिम्मी : नायका

समीर : नायक

अर्पिता : समीर की प्रेमिका और सिम्मी की दोस्त

अमनजोत: सिम्मी की माँ

                         -----------//////----------

बुलेट की आवाज ने पूरी गली दहला दी थी सुन कर सिम्मी ने दुकान के काउंटर से झांकते हुए देखा समीर जा रहा था।नीला कुर्ते से गठा शरीर उभर उभर कर बाहर आ रहा था । सिम्मी ने उसे कई बार अपनी दुकान पर ही देखा था कभी रोजमर्रा के सामान लेते कभी बस सिम्मी की माँ का हालचाल पूछते पर कभी बात करने की हिम्मत नही हुई पर हर बार उसे अगली गली के मुड़ने तक जरूर देखती थी। ऐसा ही उसने आज किया था पर आज उसे मां ने झांकते देख लिया और पूछ बैठी की कौन था पहले तो चौक गई फिर हल्के से बोली समीर आया था। मां के उत्तर से संतुष्टि जाहिर करने के अंदाज पर सिम्मी के जान में जान आई ।

सिम्मी सुलझी हुई 18 साल की लड़की थी जो अभी अभी बचपने से निकलना शुरू कर रही थी पर लड़कों से अच्छी खासी दूरी बना कर रखती थी क्योंकि उसके पिता उसकी माँ को ,जब वो पांच साल की थी तभी छोड़ गए थे ये उसके लिए सदमा था , इस बात के लिए वो हर लड़के हर मर्द को दोषी मानती थी पर ना जाने समीर में क्या बात थी वो स्कूल के दिनों से उसकी हर चीज़ का ध्यान रखने लगी पर समीर तक कोई बात नही पहुचने दी । अब वो स्कूल पूरा कर लेने से समीर से भी दूर हो गई थी जिसका उसे अफसोस अक्सर होने लगा था ।उसकी माँ के पास पैसे ना होने से न तो शादी और न पढ़ाई की बात आगे बढ़ पाई क्योंकि आमदनी का एक मात्र स्रोत थी छोटी सी किराने की दुकान ,जो इस पतली सी गली में इकलौती थी।

समीर सीधा साधा पर बड़ा ही हैंडसम जवान था कि हर लड़की उस पर मरे पर वो था कि अर्पिता की आंखों का दीवाना था दोष उसका भी नही था अर्पिता एक तीखे नाक नक्श की पर थोड़ी गहरे रंग की लड़की थी, बोले तो मानो फूल झड़ते हो आखिर अर्पिता को भी समीर से प्यार हो ही गया था और ये बात सिम्मी को अर्पिता ने ही बताई तो घर आकर वो बहुत रोई वो चाहत हार चुकी थी पर फिर भी कुछ भी मां को जाहिर नही होने दिया और स्कूल की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी तो अब घर पर ही कुछ न कुछ करती रहती थी। मां उसके घर रहने से कुछ आराम में आ गई थी क्योंकि वो अब हर घर का काम सिम्मी भरोसे छोड़ सकती थी।सिम्मी भी बस एक बार समीर को देख कर मन समझा लेती थी पर उदासी का रंग चेहरे पर चिपक कर रह गया था । माँ भी कुछ कुछ समझ गई थी पर क्या करती समीर एक अमीर बाप का लड़का था और वो उसके सामने किस हैसियत लायक थी वो जानती थी तो वो अनजान बने रहना ही ठीक समझती थी पर सिम्मी को समीर को देखने का मौका छीनती नही थी और वो प्यार छिनने का दर्द अपने दिल से लगाये थी तो अपनी इकलौती बेटी के आड़े नही आना चाहती थी पर कठोर बन कर दिखाती थी कोई बिन बाप की लड़की का गलत फायदा न उठा पाए ।समीर को वो काफी वक्त से जानती थी इसलिए अपनी बेटी की पसंद को पसंद करती थी पर दुख ये था कि कुछ किया भी नही जा सकता था।

आज सिम्मी कुछ खुश थी कि उसके जन्मदिन पर पहली बार समीर से कुछ बात हुई ,हुआ ये की समीर चाय की पत्ती लेने आया और माँ नहाने के लिए बाथरूम में थी तो उसे मजबूरन जाना पड़ा।

 सिम्मी को देख कर बोला "कैसी हो "

सिम्मी ने अपने दिल की खलबली को डिब्बे इधर उधर करने में छुपा लिया वार्ना उसका कलेजा मुह को आ रहा था ।

सिम्मी को व्यस्त देख समीर ने थोड़ी ऊंची आवाज में पूछा " कैसी हो "

अब सिम्मी को बोलना पड़ा"ठीक  "

समीर कुछ और पूछ पाता सिम्मी ने सवाल दागा"क्या चाहिए"

समीर बोला"मिलने तो आंटी से आया था पर अब चाय पत्ती दे दो"

सिम्मी का मन हुआ कह दे मुझसे बात कर लो पर मन मे रुक गई बात के साथ बोला "कितनी चाहिये"

समीर अपने फ़ोन में कुछ ढूंढता हुआ बोला" 100 ग्राम का पैकेट दे दो"

समीर ने फ़ोन से नज़र उठाई तो सिम्मी चाय का पैकेट हाथ मे पकड़े उसे ही देख रही थी 

समीर बोला "क्या देख रही हो"

सुनते ही सिम्मी दिवास्वप्न से जागी और बिना पैसे लिए अंदर भाग आई

 समीर को लगा कि रसोई में कुछ रखा होगा इसलिए अंदर भाग गई तो तेज आवाज में बोला "अरे पैसे काउंटर पर रखे है उठा लेना"

इधर सिम्मी की सांस अभी भी रुक नही रही थी जैसे दिल हलक में अटक गया हो ,

सिम्मी की माँ अब तक नहा कर बाहर आते है बोली " कौन था सिम्मी"

सिम्मी की आवाज नही निकली तो पास आकर बोली "क्या हुआ हांफ क्यों रही है "

सिम्मी ने बात बदलते हुए कहा "चूहा पैर... पर चढ़..."

और ये कहते रसोई में चली गई।

सिम्मी का आज तक का सबसे अच्छा जन्मदिन जा रहा था। उसने मा की पसंद का खाना बनाया और माँ ने भी बहुत तारीफ की इससे और खुश होकर वो चहकने लगी तो माँ को लगा उसके चेहरे से अब उदासी का बादल हटने लगा है , ये सोच कर वो भी आज सोचने लगी कि आज वो उससे कठोरता की कोई बात नही करेगी और इसी पर वो सिम्मी के सिर पर हाथ फेरते बोली" क्या गिफ्ट चाहिए तुझे"

सिम्मी उनकी ओर देख कर चौकते हुए बोली" तुम्हे याद था"

माँ बोली" जब मैंने पैदा किया है तो भूल कैसे जाती"

सिम्मी और चहक के बोली" तो मेरा गिफ्ट"

मा बोली " खुद ही पसंद कर खरीद लेना मेरी पसंद मेरी तरह खराब होगी" ना चाहते हुए आदतन बात एक ताने की तरह निकल गई।

सिम्मी समझ तो गई पर कुछ बोली नही और चुपचाप खाने लगी।

जब सूरज की तपिश कम हुई तो माँ ने आवाज लगाई "सिम्मी जल्दी आओ रिक्शा आ गया है बाजार चलना है "

सिम्मी हड़बड़ी में रिक्शे में बैठ गई तो माँ ने पुराने ढर्रे में बोला" ताला ठीक से लगाया"

सिम्मी को याद आया उसने ताला लगाया ही नही अगर मा को पता चला तो खैर नही तो रिक्शे से जल्दी से उतरी और बापस आ कर बैठ गई ।

मा बोली" ठीक से लगा था"

सिम्मी बोली" हॉ " और मा से उसकी गलती छुपी रही इसके लिए मुस्कुराने लगी, सोचने लगी वार्ना रास्ते भर के लिये एक टॉपिक मिल जाता।

आखिर उबड़ खाबड़ रोड से होता हुआ रिक्शा स्वर्ण चौक में रुक गया। मा ने बटुए से नोट निकाल कर रिक्शेवाले को दिया और आगे बढ़ गई ।

अब तक सिम्मी ये सोच ही रही थी कि माँ क्या ख़रीदवायेगी मा की आवाज आई" खड़ी क्या है, चल सामने वाली दुकान से झुमकी पसंद कर ले"

सिम्मी ने आव न देखा ताव जल्दी में एक लड़की से टकरा गई , उसने उसका गिरा हुआ बैग उठाते हुए माफी मांगने के लिए चेहरा देखा तो काला चश्मा लगाए अर्पिता सामने थी एक पल में कई विचार मानो कौंध गए कि ये इसे क्या हुआ जो छड़ी के सहारे की नौबत आ गई ।

सिम्मी कुछ पूछ पाती इससे पहले ही मा ने सिम्मी को डांटते हुए कहा "देखकर क्यों नही चलती ये नही देख सकती पर तू तो देख सकती है"

तो सिम्मी ने छड़ी अर्पिता को थमाते हुए कहा" अर्पिता ये कैसे और कब, ये क्या हो गया"

अर्पिता आवाज पहचानती हुए खुशी से बोली " सिममो तू तो स्कूल के बाद गायब ही हो गई तो मैने बाकी सब देखना भी बंद कर दिया " कह कर उससे लिपट गई और रोड पर भीड़ में खड़े होने के बाद भी वो दोनों सब कुछ भूल गए तो माँ ने याद दिलाया "अरे पगलियों ये भरत मिलाप रोड पर ही करोगी चलो सामने किनारे चलो वहाँ बात करना "कह कर वो भी मुस्कुराने लगी पर तभी पीछे से समीर की आवाज ने सभी को चौका दिया " अप्पू तू यहाँ क्या कर रही है तुझे तो अंदर रेस्तरां में बैठा कर .." अरे आंटी आप यहाँ "

माँ ने इस पर सिम्मी से फिर वही बात दोहराते हुए कहा " तुम और तुम्हारी अप्पू दोनो अजीब हो सब बातें सड़क पर ही कर डालोगे क्या"

"सॉरी  आंटी चलिए अंदर" कह कर समीर आंटी और अर्पिता का हाथ पकड़ कर अंदर रेस्तरां में ले जाने लगा इधर सिम्मी ने आते हुए आंसू थाम कर चलते चलते कनखियों को पोंछ कर पीछे पीछे चलने लगी साथ ही बहुत सारी बातें एक साथ दिमाग मे कौंधने लगी , मेरी इकलौती दोस्त का नसीब भी मेरी तरह खराब है, ये क्या हुआ, समीर कैसे इसे संभाल पायेगा ,इन लोगों ने अभी तक शादी की या नही, ...

ये सोचते सोचते रेस्टोरेंट में दाखिल हुए तो कोने एक सीट समीर की बुक थी तो वही दो सीट मंगवा ली अब 

समीर ने आंटी आप लोग आ रहे हो तो बताया नही वरना किसी और कम भीड़ वाले रेस्तरां में सीट बुक कर लेता ।

माँ ने बात को बदलते हुए कहा "अर्पिता तुम्हे अपने पति की बात माननी चाहिए अगर आज कुछ गलत .. कितनी भीड़ शहर में "

अर्पिता ने कुछ कहने को मुंह खोलने का सोच पर तभी समीर ने उसके हाथ को दबा दिया और खुद कहने लगा "आंटी अभी हमने शादी नही की क्योंकि अर्पिता खुद को इस हालत के साथ जीना सीखने के लिए वक़्त .."

समीर अपनी बात पूरी कर पाता उससे पहले ही अर्पिता बोली" क्यों री सिममो तेरा पहला बर्थ डे है जो मुह में दही जमाये बैठी है " 

समीर और माँ दोनो का ही ध्यान सिममी की ओर गया जो एक टक अर्पिता की चश्मे की तरफ बड़े उदास मन से देख रही थी ।

सिम्मी के चेहरे की उदासी को बिना देखे भी अर्पिता बड़ी आसानी से देख पा रही थी । आखिर बचपन की सहेली इतने दिन बाद मिली थी ।

सिम्मी कुछ कहती तब तक अर्पिता बोली" मुझे पता है तू मुझसे नाराज है पर मैं क्या करूँ पर इस काले चश्मे ने तेरे पास आने नही दिया कि तू इसी तरह आंसू बहायेगी और मैं अंधी उन्हें पोंछ भी नही पाउंगी"

सिम्मी ने इस बात पर खुद आंसू पी लेना ही उचित समझा और रुंधे गले से बोली "ये सब कैसे "

"तू मुझे छोड़ कर घर बैठ गई इसलिए मैंने सोचा जब तू नही दिखी और दुनिया देखकर क्या करूंगी" अर्पिता ने अपने चिरपरिचित मीठे अंदाज में कहा क्योंकि आज उसकी सहेली का जन्मदिन था जिस पर वो सिम्मी को और नही रुलाना चाहती थी।

सिम्मी ने कुछ और नही पूछा तो शांति तोड़ने का काम समीर ने किया और बोला "आंटी आपने सिम्मी को गिफ्ट दे दिया क्या "

सिम्मी की माँ ने कहा " वही दिलवाने तो जा रही थी तब तक तुम लोग मिल गए "

अर्पिता बोली " समीर मेरी तरफ से सिम्मी को कोई गिफ्ट दिला दो न प्लीज "

समीर बोला" ठीक है चलो उठो"

अर्पिता बोली" जैसे तैसे तो आंटी के पास बैठने का मौका मिला वो भी तुम छीनना चाहते हो तुम और सिम्मी चले जाओ"

सिम्मी ने मां की तरफ देखा तो माँ असमंजस में थी क्या कहती तभी अर्पिता ने फिर बोला" आंटी आप क्या गिफ्ट दिला रही थी सिममो को "

मां ने असमंजस की स्थिति से बाहर निकलते कहा "बेटा बस छोटे से झुमके दिलाने का सोचा था"

समीर का हाथ पकड़ कर अर्पिता ने झुकने का इशारा किया तो समीर भी कान अर्पिता के मुँह के पास ले आया।

और अर्पिता ने कुछ कहा तो समीर ने हाँ कह दिया।

और सिम्मी के तरफ देख कर समीर ने कहा" सिम्मी चले क्या "

सिम्मी ने फिर माँ का चेहरा देखा तो माँ ने कहा "ले ये पर्स ले जा "

सिम्मी समीर के साथ चली गई और ज्वेलर्स की दुकान में घुस गई और झुमके देखने लगी ।

इधर अर्पिता ने कहा "आंटी आप बड़ी मुश्किल से तो मिले हो यहाँ मेरे पास आकर बैठिये न "

सिम्मी की माँ ने अपने हाथ अर्पिता के पास रखे तो अर्पिता ने अपना सिर सिम्मी की माँ के कंधे पर रख लिया ।

सिम्मी की माँ भी अर्पिता के हाथ को हाथ मे लेकर सहलाने लगी ।

तभी अर्पिता ने कहा " आंटी मैं आपको माँ कह सकती हूं"

ये सुनकर सिम्मी की माँ की आंखों में आंसू भर आये और फिर बोली "क्यों नही बेटा जैसी सिम्मी वैसे ही तू है मेरे लिए "

अर्पिता बोली " सिममो ने मुझे कितनी बार आपके बारे में बताया पर कभी आपसे मिल न सकी आज आपसे मिलके लगा मुझे मेरी माँ मिल गई"

इतना कहते ही बिलख पड़ी और सिम्मी की माँ को कस कर चिपका लिया । इस पर सिम्मी की माँ भी रोते हुए उसके काले चश्मे को उतार कर आंसू पोछने लगती है ।

फिर सिम्मी की माँ प्यार से अर्पिता के गाल पर थपकी देते हुए कहती है"तू मुझसे मिलने नही आई और अपनी गलती पर मुझे रुला रही है"

इस पर अर्पिता ने खुद को संभाला और बोली " माँ आज तुमसे मिलकर मेरे दिल का बोझ हल्का हो गया "

सिम्मी की माँ बोली " ऐसा क्यों कह रही है "

अर्पिता ने बात बदलते हुए कहा" अच्छा बहुत हुआ रोना रुलाना एक बात बताइये सिम्मी के लिए कोई लड़का देखा "

सिम्मी की माँ इस सवाल से चौंक गई फिर अचरज से अर्पिता को देखकर बोली "तू क्यों पूछ रही है"

अर्पिता बोली" प्लीज बताइये ना, आपने मुझे अपनी बेटी कहा अब एक बेटी से दूसरी की बात छुपाना क्या सही है"

सिम्मी की माँ ने सामान्य होते हुए कहा" अरे कहा कोई लड़का ढूंढ पाई हूँ एक तो आज कल अच्छे लड़के मिलते कहा है और फिर हमारी गरीबी के कारण कुछ बात आगे नही बढ़ पाती"

अर्पिता मुस्कुराते हुए बोली" मेरी नज़र में एक लड़का है कहो तो बात चलाऊं"

सिम्मी की माँ की आंखे झपकना भूल गई फिर आश्चर्य से बोली " हा क्यों नही पर दान दहेज हम ज्यादा नही दे पाएंगे"

अर्पिता खिलखिलाते हुए बोली "आप लड़के को जानते हो और मैं उसके घरवालों को उसके घरवालों को बस लड़की चाहिए सुंदर घरेलू और संस्कारी "

सिम्मी की माँ ने कहा" अच्छा कौन है वो "

अर्पिता तपाक से बोली"समीर"

अब ये सुन कर तो सिम्मी की मां की बोलती बंद हो गई

अर्पिता ने फिर कहा " मैं जानती हूं कि सिममो समीर दोनों एक दूसरे से प्यार करते है  पर मेरी वजह से चुप है"

सिम्मी की माँ उसकी बातों को  बड़े ध्यान से सुन रही थी

अर्पिता आगे कहती है " मैं शुरू में यही समझी थी कि सिम्मी सिर्फ समीर को दोस्त के दोस्त की तरह ही समझती है पर कुछ दिन पहले जब मैं उसकी एक और दोस्त रंजना से मिली तो उसने बताया सिर्फ इस शक की वजह से की मैं समीर से प्यार करती हूं वो बीच मे से हट गई और मुझे कुछ बताने का मौका भी नही दिया "

बात तो अब सिम्मी की माँ को भी समझ मे आने लगी क्योंकि वो भी जानती थी सिम्मी समीर से प्यार करती है 

और सिम्मी ने खुद बताया था कि अर्पिता और समीर प्यार करते है और शादी करने वाले है।

सिम्मी की माँ ने आगे पूछा "तुम्हे समीर का कैसे पता चला कि वो तुमसे नही सिम्मी से प्यार करता है "

अर्पिता ने गहरी सांस लेकर बताया "जब मुझे सिम्मी के प्यार वाली बात समीर को बताई तो पहले तो वो मुकर गया पर जब मैंने कसम देकर उससे पूंछा तो बोला की हा उसे भी लगा था कि सिम्मी मुझे प्यार करती पर मैं तब तक तुम्हरे प्यार के लिए हां कह चुका था और अब तो मैं सिर्फ तुम्हारा हूं "

अर्पिता ने आगे कहा " मा मैं नही चाहती कि समीर मुझ अंधी के साथ भटके प्लीज मेरी इस काम मे मदद करो तो मैं..... " इतना कहते उसका गला भर गया और फिर सिम्मी मा का हाथ पकड़ कर रोने लगी।

सिम्मी की माँ को कुछ भी समझ नही आ रहा था कि वो क्या कहे और पर फिर भी वो अर्पिता के सिर पर हाथ फेर रही थी ।

तभी समीर और सिम्मी अंदर दाखिल हुए तब तक अर्पिता का रोना भी बंद हो गया था पर सिम्मी देखकर पहचान गई और बोली "अप्पू तुझे शर्म नही आती मेरे जन्मदिन पर तु रोये जा रही है इसलिए कुछ पूछ नही रही थी तेरी बात मान कर तेरा गिफ्ट खुद ले आई और तू है कि टसुए बहाए जा रही है "

अर्पिता खुद को संभालते हुए बोली " अरे बड़ी जल्दी खरीददारी हो गई क्या क्या लाई"

"वही जो तूने समीर को समझाकर भेजा था ..झुमकी" सिम्मी झुमकी अर्पिता के हाथ मे रखते हुए बोली 

अर्पिता बोली" चल अच्छा पहन कर तो दिखा मेरी न सही तो माँ की आंखों से देख लुंगी"

इस पर सिम्मी चौकते हुए बोली "कौन माँ"

अर्पिता सिम्मी के कंधे पर सिर रखकर बोली "ये माँ"

सिम्मी चिढ़ाने के लहजे में बोली "अरे वाह वाह मैंने थोड़ी देर माँ को क्या छोड़ा तूने डाका डाल दिया"

सिम्मी की माँ ने कहा " सिम्मी तो क्या हुआ अब मेरी दो बेटियां है "

सिम्मी ने हंसते हुए कहा" हमें तो पहले भी ताने ही मिले अब तो गाली खा खा कर जीना होगा" इस पर सभी हँसने लगे ।

माँ ने कहा" अप्पू, तो कब आओगी अपनी माँ से मिलने"

अर्पिता ने कहा" माँ से मिलने का कोई वक़्त थोड़े ही होता है, जब चाहूंगी आ जाऊंगी"

समीर के साथ नाश्ता कर चारो लोग बाहर रोड पर आ गये तो अर्पिता ने हाथ मे सिम्मी की माँ का हाथ हाथ मे लेकर कहा "मेरी बात पर गौर करना और इस सिम्मी को भी समझाना प्लीज माँ अब आपका ही सहारा है।

सिम्मी और माँ काफी देर तक अपने अपने खयालो में समीर और अप्पू को बाइक पर जाते देखते रहे।

जीवन-रेखा भाग 1

पात्र 

जीवन : नायक 

रेखा : नायका 

बैदेही : जीवन की ताई 

निराली देवी : रेखा  की माँ 

शेष पात्र आते जाते रहेंगे। 

.....................................................................................................................................................................

दोपहर का समय है। एक रेस्त्रां में प्रेमी युगल बैठकर बात कर रहे है। 

"क्या तुम मुझे सच में इतना प्यार करते हो जीवन " गिरते हुए आंसुओं के साथ रेखा ने जीवन के हाथ को अपने हाथ में ले लिया पर अगले ही पल नजर बचाते हुए हाथ छोड़ कर खिड़की से बाहर की ओर  देखना शुरू कर दिया |इन कुछ पल मे रेखा के चेहरे पर कई रंग  आये और चले गए  | 
" क्या हुआ, तुम्हे मेरे प्यार पर भरोसा नहीं है" जीवन ने गहरी निगाह के साथ रेखा के चेहरे से दिल को पढ़ने की नाकाम कोशिश की |
रेखा अब भी खिड़की के पार  ही देख रही थी | अब भी उसकी जुबान चुप थी पर आंसू बहुत से गम लिए गालों पर ढलकते हुए बहे जा रहे थे | पर जीवन भी क्या करता वो  रेखा के हालात से बिलकुल अनजान बहुत दूर से मिलने आया था | रेखा की निगाहों को देखने के लिए जीवन अपनी कुर्सी खिसका कर और करीब आया और रेखा के कंधे पर हाथ रखते हुए सवालिया निगाहों से रेखा की आँखे झाँकने की कोशिश की | पर अब जबकि रेखा बहुत असहज हो चुकी थी उसका गुबार उसे बेचैन कर रहा था और वो जीवन के कंधे पर सर रख कर बहुत रोना चाहती थी पर ... इस रेस्त्रां का लिहाज करना पड़ा और एक बार गौर से जीवन के चेहरे पर नजर डाली जैसे की वो उसे आखरी बार देख रही हो और तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ गई, पीछे पीछे जीवन ने रेखा-रेखा नाम की कई आवाज दी पर वह नहीं रुकी और  सीधे रिक्शा में बैठ गई, रिक्शे वाले को चलने का इशारा किया |

..................................................................................................................................................................
रेखा और जीवन की मुलाकात कोई ज्यादा पुरानी नहीं थी पर दोनों जब बातें करते थे तो कोई ये नहीं बता सकता था कि वो अभी एक महीने पहले ही मिले होंगे |
हुआ कुछ यूँ कि कोई चार हफ्ते पहले सीढ़ियों पर फिसलने से रेखा की एड़ी का फैक्चर हो गया और हालत इतनी ख़राब हुई की रेखा हॉस्पिटल पहुँच गई|
रेखा का उसकी माँ के सिवा कोई नहीं था, तो दोनों माँ बेटी हस्पताल के जनरल वार्ड में पहुँच गए | आज पहले ही दिन मुरझाई हुई रेखा को हस्पताल का बिस्तर काँटों की चादर नजर आ रहा था और वह आँखे बंद किये माँ का इन्तजार कर रही थी हस्पताल में आने जाने वालों की पैरों की आवाज नींद के पहलू में जाने रोक रही थी कि तभी लगा जैसे कोई उसके बैड के पाइप  को पकडे है , रेखा ने झट से बिना करवट लिए देखने की कोशिश की और देखा तो  चेक की  शर्ट पहने एक 17 -18  साल का लड़का खड़ा है | अभी वह उसका चेहरा नहीं देख सकी थी | तब तक माँ आ गई जो जरूरत का समान लाने घर गई थी ये देख कर रेखा ने आँखों पर से हाथ हटा लिया और पूछा "  क्या हुआ माँ बड़ी थकी लग रही हो "
माँ ने हाँफते हुए कहा, "  अरे नहीं बस रस्ते में भीड़ बहुत थी "
"तूने अभी तक ये बिस्किट खाये नहीं " पैकिट दिखाते हुए रेखा को नाराजगी से माँ ने  देखा ,
ये कह कर टिफिन से आलू के पराठे निकाले और रेखा की ओर प्लेट रख दी |
"क्या माँ तुम तो जरा जरा सी बात पर" रेखा ने कहा.
"ये जरा सी बात है शाम के पांच बज गए और अभी तक तूने कुछ भी नहीं खाया " माँ ने पानी की बोतल खोली और गिलास में पानी निकाल कर पीने लगी |
"क्या करूं तुम्हारे इन्तजार में पता ही नहीं चला पांच बज गए " माँ को मनाने के अंदाज में रेखा ने कहा,
" चल ठीक है अब तो खा ले " मा ने फिर प्लेट को आगे बढा कर रख दिया
रेखा ने प्लेट से एक कौर उठाया और माँ को देते हुए कहा " लो तुम भी तो खाओ अभी हफ्ते भर सेवा करनी है "
ये सुन कर माँ का गुस्सा फुर्र हो गया और मुस्कुराने लगी |

रात के ग्यारह बज गए थे और रेखा की आँखों में अभी भी नींद नहीं थी, और माँ बेंच पर लेट कर आँखे बंद किये थी शायद सो भी गई हो .
तभी नजर घुमा कर वार्ड के और बेड देखे , सब के सब भरे हुए थे और  तभी उसकी नजर अपने बराबर वाले बेड पर पड़ी जिस पर वो चेक की शर्ट वाला लड़का जो सुबह दिखा था , उम्रदराज महिला के पैर दबा रहा था ,
और इतने में उसने भी देख लिया कि रेखा उसे देख रही है , रेखा ने हड़बड़ा कर नजर बचा ली अब और कुछ देखने की हिम्मत नहीं हुई तो आँखे बंद कर सोने की कोशिश की जो सफल भी हो गई |
सुबह करीब पांच बजे से ही चहलकदमी शुरू हो गई तो रेखा की आँख खुल गई माँ की तरफ देखा तो वो नहीं थी ,सोचा बाथरूम गई होंगी फिर पास वाले बेड की तरफ देखा तो वो चेक शर्ट वाला लड़का महिला के पैरों पर सर रखे ही सो गया था शायद देर रात तक पैर दबाता रहा होगा |

अब रेखा को माँ सहारा देकर बाथरूम लेकर गई और फ्रेश होकर रेखा बापस आ रही थी की तभी  पतले गलियारे से गुजरते हुए किसी से उसका कन्धा लग गया तो वो इस बात पर बिना देखे बिफर पड़ी और बोली " लोगो को अस्पताल में भी चलना नहीं आता बस मुंह उठाये जानवर की तरह दौड़ लगा दी |" इतना कह कर माँ ने उसको चुप रहने का इशारा किया तो चुप तो हो गई पर गुस्सा शांत नहीं हुआ और ऐसे ही धीरे धीरे चलकर बैड तक पहुँच कर बैठ गई  | 

मूड तो रेखा का पहले ही अस्पताल के शोर ने ख़राब कर दिया था जो ठीक से नींद नहीं आई और ऊपर से सुबह ही सुबह ये सब  | माँ ने चाय देते हुए कहा " क्या हुआ इतनी सी बात से मुँह सिकोड़ लिया यहाँ कोई भी मजे के लिए नहीं आया सब को यहाँ से जाने की जल्दी है "

तब तक पास वाले बैड पर एक वार्डबॉय ने लेटी महिला से पुछा " क्यों ताई कैसा हाल है ये जीवन इतनी हड़बड़ी में कहाँ गया "

" अरे कुछ नहीं ये उसका रोज का है मैंने जरा सा मजाक क्या दिया की तू तो  पैरो में लेटे ऐसे सो रहा है जैसे मैं मर गई हूँ , तो तुनक कर भाग गया " माँ ने मुस्कुराते हुए वार्डबॉय को देखकर कहा  |

"हा हा हा अभी भी बच्चा ही है ये, जब साथ पढ़ता था तब भी इसको मनाना पड़ता था " बार्डबॉय ने चाय का कप महिला की ओर बढ़ाया और कहा " मैं  समझाता हु उसे आप चाय पियो तब तक " 

ये कह कर जा ही रहा था की जीवन लौट आया  | लगता था जैसे रो कर आया है पर बार्ड बॉय को वहां देख कर पूछने लगा " क्या हुआ यहाँ "

बार्डबॉय बोला " तुझे दौड़ कर जाते देखा तो लगा जैसे कुछ गड़बड़ है इसलिए ताई से मिलने आ गया....और यहाँ तो पता लगा जीवन अपनी ताई को अकेला इस हाल में छोड़ कर भाग गए हा हा हा "

जीवन बात का मतलब समझते हुए उससे नजर बचाते  हुए दवाइओं में से सुबह खाली पेट लेने वाली दवाई

को ताई  को देते हुए बोला " कुछ नहीं यार बस मुँह धोने गया था " 

  इस पर बार्डबॉय उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला " यार जीवन ताई ने मुझे सब बता दिया तेरा बचपना कब जायेगा "

जीवन ने महिला की तरफ देखते हुए चेहरा सख्त हो गया और बार्डबॉय से बोला " मेरा ताई के अलावा इस दुनिया में है ही कौन और ये भी ऐसी बातें कर के मेरा खून जलाती है कभी कभी तो लगता है कि  कही जा के मर ... "

इतना कहते कहते पलकों पर दो आंसू के मोती आ गए जो जीवन चेहरा पीछे करके पोंछ कर खुद को संयत करने लगा।          

 माहौल को ठीक करने को मुस्कुराते हुए बार्डबॉय बोला " यार जीवन तूने कसम खा रखी है की तू रूठे और हम तुझे मनाये ताई ने तो सिर्फ मजाक किया था "

जीवन भी खुद को सामान्य करते हुए मुस्कुराने लगा  और बोला " चल ठीक है, अच्छा ये डॉक्टर कितने बजे आएँगी आज "

वार्डबॉय बोला " मै चलता हु थोड़ी देर में पूँछ कर बता दूंगा "

रेखा और उसकी माँ अभी भी उस तरफ ही देख कर कुछ समझने की कोशिश कर रही थी की तभी उस ताई ने रेखा की माँ से मुखातिब होकर कहा " बहनजी ये लड़का शरीर से बड़ा हो गया है पर दिमाग से बच्चे का बच्चा ही रह गया इसे कौन समझाए की जो आया है उसे तो एक दिन जाना ही है  "

रेखा की माँ ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा " नहीं बहन जी हम जिन्हे प्यार करते है उनके दूर जाने की बात से डर जाते है..., मुझे तो लगता आपसे ये लड़का बहुत प्यार करता है  "

"हां शायद सही कहा आपने उस बेचारे को कभी माँ  बाप का साया भी नसीब नहीं हुआ मेरे इन्ही हाथों में पला है और अब मेरे भी शरीर में दम नहीं की इसका कुछ ख्याल रख सकूँ " कहते कहते उदास होकर महिला ने पुरानी यादों को मन में कुरेदना शुरू कर दिया और यादों में खो गई। 

.....................................................................................................................................................................

जीवन एक सुलझा हुआ लेकिन किस्मत का मारा लड़का है । पैदा होते ही माँ बाप दोनों का स्वर्गवास एक बीमारी से हो गया फिर जीवन का घर कर्जे में चला गया अब सिर्फ खेत ही थे जो व्यक्ति उन्हें जोत रहा था वो उसे अपने घर ले गया करीब पंद्रह दिन बाद एक आदमी आया जो जीवन के पिता के बारे में पूछ रहा था तो गांव वालों ने उससे  उसके बारे में पुछा तो वो बोला मैं जीवन का ताऊ हु पर मैं बहुत ही दूर था इसलिए आ न सका अब मुझे जीवन के परिवार के बारे में बताओ। गांव वालों ने सब कुछ बता दिया तो वो कहने लगा मैं जीवन से मिलना चाहता हु तो उसे जीवन से मिलवा दिया गया तो वो बोला मैं इसे अपने साथ ले जाना चाहता हु मेरे भाई  निशानी को अब मै पालूंगा और बड़ा आदमी बनाऊंगा। कुछ लोगों को लगा ये सही कह रहा इस बच्चे को कोई अपना मिल जायेगा तो फिर उसके सींग उगने शुरू हुए और उसने पुछा की  घर खेत और घर के सामान का क्या हुआ वो भी उसे चाहिए तो गांव के प्रधान को शक हो गया तो भी उसने कहा "ये घर तो कर्जे की भेंट चढ़ गया और घर में सामान के नाम पर सिर्फ कुछ चम्मच कटोरी है बस खेत बचे है जो गांव का ही एक आदमी जोत रहा है"

 जीवन का ताऊ बोला मै सब कुछ बेंच कर इसे ले जाना चाहूंगा तो प्रधान ने उसे कहा "देखो भाई मै उस मासूम के जीवन की खातिर अभी तो कुछ बेंचने नहीं दूंगा पर हाँ अगर इसके समझदार होने तक पाल सको तो मै खुद ही खेत खरीद लूँगा "

अब तो जीवन के ताऊ का मुँह उतर गया पर तभी जीवन के खेत जोतने वाला बोला "प्रधान जी मुझे लगता ये सज्जन कुछ परेशान लगते  है" इतने में वहां का थानेदार आ गया बोला "क्या बात है प्रधान जी क्या हुआ यहाँ भीड़ कैसी है "

तो प्रधान ने सारी बात थानेदार को बताई तो थानेदार ने भी जरा कड़ककर कहा "हां भाई ले जाओ इस बच्चे को पर हर महीने इसे दिखाने  लाना होगा वार्ना तुम तो सब बेंच बांच के बच्चे को फ़ेंक के  गायब हो जाओगे।"

  इतना सुनते ही जीवन के ताऊ के  हाथ पैर  फूल गए क्यूंकि एक दिन पहले ही तो वो जेल से छूटा था और पता चला की उसका भाई मर गया अब जायदाद को बेंच कर कुछ दारू का इंतजाम करने का सोच कर आया था तो यहा तो दांव उल्टा पड़ गया। 

आखिरकार उसने कहा "मै  मेहनत  मजदूरी वाला आदमी इस बच्चे को कैसे पाल पाउँगा अगर कुछ मदद नहीं मिली तो"

बात प्रधान को जच गई तो बोला "ठीक है तो ऐसा करते है की इसके खेतों की कीमत 18 हिस्से कर देते है और हर साल इसके जन्मदिन  पर मै खुद आकर तुम्हे दे जाया करूँगा अब ठीक है"

सुनकर जीवन का ताऊ कुछ सोच रहा था तब तक थानेदार बोला "चलो उठो जीवन को लेकर मेरी गाड़ी में बैठो" इतना सुनकर जीवन का ताऊ सहम कर कुछ बोल न सका और जाने लगा तो प्रधान ने कहा "ये लो तुम्हारी पहली क़िस्त इसमें डेढ़ लाख रूपए है और जीवन को देखने मैं आता रहूँगा पता मुझे दे जाओ"

 अब तो जीवन का ताऊ क्या करता पता देकर गाड़ी में बैठ कर किस्मत को रोने लगा पर सोचा कोई बात नहीं ये डेढ़ लाख भी कोई कम रकम नहीं है।  

कुछ देर में ही घर  पहुँच कर थानेदार से बोला आइये घर में चलिए थानेदार से अपनी पत्नी को मिलवाया पत्नी ने   सोचा फिर कोई झमेला कर आया जो पुलिस के साथ में है

 जीवन का ताऊ बोला  " कुछ चाय पानी लेंगे साहब "

थानेदार बोला " नहीं , यहाँ कौन कौन रहता है "

जीवन का ताऊ बोला " बस मै  और मेरी बीबी "

" और तुम काम क्या करते हो " थानेदार ने घर देखते हुए कहा 

जीवन की ताई गुस्से में तपाक  से बोली " कुछ नहीं बस दारू झगड़ा और जेल "

इतना सुनते ही थानेदार चौंका इधर जीवन का ताऊ जीवन को खाट पर लिटा कर आया और ताई  के गाल पर एक थप्पड़ रसीद दिया 

ये देखते ही थानेदार का जोरदार चाटा लगा ताऊ को कि बत्तीसी हिल गई और थानेदार ने पिस्तौल निकाल कर ताऊ के कनपटी पर लगा दी और बोला " अगर आज के बाद मैंने ये हाथ किसी औरत या बच्चे पर चलता देखा तो तेरा भेजा उडा दूंगा चल भाग यहाँ से  और ये पैसे इधर ला "

तब तक जीवन जो इस धमाचौकड़ी से जाग गया और रोने लगा। ताई  से रुका नहीं गया और जीवन को उठा कर चुपाने लगी। जीवन कुछ देर में फिर सो गया। 

तब थानेदार ने ताई  को गांव की पूरी बात बताई तो उनकी आँखों में आंसू आ गए और माथे पर चूमती हुई जीवन का चेहरा निहारने लगी और बोली " बिलकुल अपनी माँ पर गया है "

थानेदार ने कहा " देखिये अब इसका कोई नहीं है आपको ही इसे पालना होगा "

ताई बोली " जब तक मै  जिन्दा हु इसके प्यार में कोई कमी नहीं रहने दूंगी वैसे भी इसी ने तो मेरी सूनी गोद भर दी वार्ना तो मैं किसके लिए जी रही थी मुझे खुद नहीं पता "

थानेदार बोला " जब तुम्हारा आदमी जेल चला जाता है तो घर कैसे चलाती हो "

ताई ने कहा " पेट भरने को कुछ घरों में चूल्हा चौका कर लेती हु "

थानेदार बोला " अब ये सब करने की जरूरत नहीं लो ये डेढ़  लाख रुपए है जीवन के खेत की कीमत का हिस्सा है अगले 18 साल तक ऐसे ही मिलते रहेंगे "

ताई ने कहा " अगर ये पैसे ले भी लिए तो वो दुष्ट मुझसे छीन  कर ले जाएगा और दारु में उडा देगा "

थानेदार ने  सोचते हुए कहा " ठीक है तो तुम एक किराने की दुकान खोल लो इस तरह कुछ कमा भी पाओगी और  जीवन का ख्याल भी रख पाओगी "

ताई को लगा बात  तो सही है पर कुछ सोचते हुए बोली " पर मै तो दुकान के बारे में जानती नहीं फिर .."

"मै किसी को भेज दूंगा जो तुम्हे बता देगा कहा से सामान खरीदना है "थानेदार ने कहा और ये मेरा मोबाइल नंबर रखो कभी कोई जरूरत हो तो फोन  कर लेना और हाँ ये 5000 रखो कुछ कपडे इसके और एक छोटा मोबाइल  ले लेना बाकी पैसे जरूरत पर मेरे घर से ले लिया करना अब चलो तुम्हे मै घर दिखा देता हु "

ताई को जैसे बिन मांगी मुराद मिल गई हो। ताई को जीवन का मासूम चेहरा देखकर फिर आंसू  आए और उसे  प्यार से चूमते हुए बोली " ये जीवन क्या आया मुझे फिर से नया जीवन मिल गया "

 ...................................................................................................................................................................

इधर वर्तमान में जीवन माँ के लिए खाना लेकर आया था और प्लेट में परोस कर ताई को दे रहा था  ताई तो जैसे पुरानी  यादों की धूप छाव में ऐसी बैठी थी की सुन नहीं रही थी तो जीवन ने ताई पर हाथ रख कर हिलाया तो उसे देख कर मुस्कुरा उठी और जीवन के चेहरे पर प्यार से हाथ फेरती बोली " तू  नहीं होता तो मै किसके लिए जीती "

जीवन भी मुस्कुरा उठा और बोला " अरे ताई  ये बोल की तुम नहीं होती तो मै  भी  कहाँ होता "

ये कहते हुए प्लेट ताई के हाथ में दे दी और खुद सेब छीलने लगा इतने में डॉक्टर भी कमरे में  तो जीवन पीछे हट गया और डाक्टर नंदिनी की प्यारी आवाज से ताई मुस्कुरा दी 

डाक्टर ने नब्ज देखते बोला " और बताइये आंटी कैसे हाल है अब रात बुखार तो नहीं आया "

ताई तो जैसे उसके इन्तजार में ही थी बोली " बेटा बस अब मै ठीक हो गई अब इन दवाइयों को मत देना मुझे इन से उलटी आती है "

डॉक्टर मुस्कुराई और बोली " ठीक है आंटी दवाई नहीं तो इंजेक्सन ही सही शऱीर में दवा तो पहुचानी पड़ेगी "

ताई  इंजेक्सन की बात सुन कर घबड़ाते हुए बोली " अब तू कहती है तो मै दवाई ही खा लुंगी "

ये सुनकर सभी मुस्कुराने लगे और डॉक्टर अगली बैड पर रेखा को देखने पहुंची और बोली " अपने पैर की उँगलियाँ चलाओ "

रेखा ने कसमसाते हुए उँगलियाँ चलाई तो डॉक्टर बोली " ठीक है दर्द ज्यादा तो नहीं "

रेखा ने कहा "नहीं पर ..."

डॉक्टर बोली " पर क्या "

बीच में रेखा की माँ ने कहा " बस दिन भर नींद आती रहती है दवाई से  इसको "

डॉक्टर वार्ड बॉय को इशारे से परचा दिखाती हुई बोली " वो कल दर्द ज्यादा था इसलिए ये गोली दी थी अब दर्द काम हो गया तो इसकी कोई जरुरत ही नहीं "

ये कहते डॉक्टर आगे बढ़ गई। 

फिर माँ ने रेखा से कहा " मै घर होकर आती हु तू आराम कर "

रेखा ने कहा " अब तो आराम ही आराम है पर तुम जल्दी आना "

रेखा फिर लेटे बोर होने लगी अब तो नींद भी नहीं आ रही थी तो  इधर उधर देखने लगी और नज़र फिर  जीवन पर चली गई 

देखा  तो वो सेब  छील चुका था और  काट कर कटोरी में रख रहा था 

जीवन फिर ताई को सेब देकर बाहर चला गया और कुछ  बाद एक बिस्किट और एक न्यूज़ पेपर लेकर लौटा और तब तक रेखा अपने ही गुमसुम सर पर हाथ रखे लेटी  थी। 

रेखा के पास वाली बेंच पर बैठ गया और कुछ बोलने जा ही रहा था की रेखा हाथ हटा कर उसे घूर कर देखने लगी 

वो घबड़ाते हुए रेखा से बोला  " मुझे माफ़ कर दीजिये "

रेखा ने चौंकते हुए फिर देखा तो जीवन बोला " सुबह मैं आपसे टकरा गया था इसलिए "

रेखा ने कहा " ठीक है कोई बात नही "

जीवन ने फिर कुछ सोचते हुए कहा "तो आपने मुझे माफ़ कर दिया "

रेखा अभी भी बात खत्म करने की जल्दी में बोली" हा कर दिया"

तो जीवन ने बिस्किट का पैकेट बढ़ाते हुए मुस्कुराते हुए कहा " तो इसी बात पर मीठा हो जाये"

रेखा मुस्कुराना चाहती थी पर वैसे ही सख्ती से बोली "नही मुझे नही चाहिए "

जीवन बोला "तो लगता है आपने माफ नही किया "

रेखा को अब गुस्सा आने लगा और बोली" देखिए मुझे ये नही चाहिए और आप जाइये "

जीवन अब समझ गया और अखबार और बिस्किट रखते हुए बोला " देखिए मैं कोई आपको परेशान करने नही आया बस आपको परेशान होते देख आया हु यहाँ अस्पताल में वक़्त कटता नहीं काटना पड़ता है इसलिए ये अखबार और ये बिस्किट रख रहा हु बाकी आपकी मर्जी"

और उदास मन से अपनी बेंच पर जाकर बैठ गया और एक डायरी में कुछ लिखने लगा।

रेखा को समझ नही आ रहा था कि क्या करे तो वैसे ही लेटी रही और कुछ देर के बाद उसको लगा जैसे चक्कर आ रहा है और उल्टी सी आने लगी ।

जैसे ही जीवन को ये आभास हुआ तो वो जल्दी से आया और कूड़ेदान को बैड के नीचे से बाहर की तरफ सरका दिया जिससे वो उल्टी उसी में कर पाई और एक दो बार मे ही उसे लगा अब कुछ ठीक लग रहा है तो जीवन ने उसे पानी दिया और कूड़ेदान को अंदर सरकाकर बाहर चला गया और एक गोली लाया और रेखा को दी और बोला इसे खा लीजिये आराम मिल जाएगा ।

रेखा ने गोली ले कर खा ली फिर वैसे ही सिर पर हाथ रख कर लेट गई।

थोड़ीदेर में जीवन फिर पूछने आया "अब दोबारा तो नही आ रही "

रेखा ने सिर को ना में हिलाया

जीवन ने कहा" पेट मे जो था वो तो निकल गया अब दवाई खाने से पहले बिस्किट खा लेना "

पता नही क्यों पर रेखा कुछ देर तक जीवन को जाते हुए देखती रही फिर मुस्कुराने लगी

जीवन बापस आया तो देखा रेखा एक करबट से लेटे लेटे अखबार के पन्ने पलट कर देख रही है तो जीवन ये देखकर मुस्कुरा उठा और रेखा की नजर पड़ते ही वो झेप गई और अपने मुंह अखबार के पीछे छुपा लिया ।

जीवन अब ताई को जगाया और बोला "ताई उठो ये दवाई खा लो फिर सो जाना "

ताई ने दवाई खाई और फिर लेट गई।

अब जीवन बैठ कर फिर डायरी में कुछ लिखने लगा तब तक रेखा की माँ आ गई ।

और रेखा से बोली " दर्द तो नही हो रहा अब"

रेखा ने अखबार किनारे करते बोला" मिल गई फुरसत आज आपकी लड़की तो गुजर ही गई थी "

रेखा की माँ ने चौकते हुए कहा " क्यों क्या हुआ "

"मुझे चक्कर और फिर उल्टी आई थी लगा जैसे मैं मर ही जाउंगी" रेखा कह कर मा का चेहरा ध्यान से देखने लगी जिस पर बेटी के लिए चिंता की रेखाएं आ गई थी 

माँ बोली " फिर "

रेखा धीमे स्वर में बोली " फिर उन्होंने मुझे पानी दिया और एक गोली लेकर दी तब जाकर कुछ चक्कर कम हुए "

रेखा के उन्होंने के इशारे को देखकर कर मा ने रेखा के साथ पीछे मुड़ कर देखा तो जीवन अभी भी कुछ डायरी में लिख रहा था ।

माँ ने रेखा से कहा " जरूर इन दवाइयों से गर्मी हो गई हो गई ये तो अच्छा है कि आज खाना भी मैं सादा ही लाई हु चल हाथ धो कर खा ले"

रेखा ने कहा" ठीक है °

रेखा ने  खाना खाते हुए एक दो बार जीवन को देखा तो वो उसे खाते देख मुस्कुरा रहा था तो फिर रेखा ने भी मुस्कुरा कर देखा और खाना खाने लगी

अब जीवन रेखा की तरफ आया और रेखा की माँ से बोला "आंटी आज रात के खाने को थोड़ा हल्का ही रखियेगा नर्स बोल रही थी जिससे इसके लिए गोली लेने गया था"

रेखा की माँ ने जीवन की तरफ देखकर कहा " हाँ बेटा ध्यान रखूंगी पर जो तुमने किया उसके लिए बहुत शुक्रिया "

जीवन मुस्कुराते हुए बोला " मुझे शुक्रिया नही माफी दिला दीजिये सुबह जानवरो की तरह टकरा जाने के लिए "

रेखा ये बात सुनकर झेंप जाती  है

रेखा की माँ ने रेखा को देखते हुए बोली " बेटा अब तो माफ करदे "

तो रेखा बोली "मैंने इन्हें पहले ही माफ कर दिया"

"इस जीवन का जीवन सफल हो गया " कहते कहते खिलखिलाने लगा तो रेखा और उसकी माँ भी हँसने लगी ।

इस हसी को सुनकर अभी नींद से उठी ताई को समझ नही आया तो बोली "जीवन क्या हुआ"

जीवन बोला"अरे ताई आप चूक गए अभी यहां प्रभु साक्षात आये और बोले बच्चा तुझे माफ किया"

ताई अभी भी असमंजस में बोली " किस लिए "

जीवन बोला" सुबह मेरी अच्छी ताई को अकेला छोड़कर जाने के लिए"

ताई अब उसकी मजाक को समझ कर मुस्कुराने लगी जीवन आगे कहने लगा " ताई वो कह रहे थे तुम्हारी ताई अब सौ साल और जियेंगी, यकीन ना  आये तो इन मौसी से पूछ लो।"

ताई ये सुन कर जीवन से साथ खिलखिलाने लगी और उधर अपने लिए मौसी सुनकर रेखा की माँ भी भावना से भर गई ।

रेखा की माँ बोली " हा बहन जी जीवन सच कह रहा है "

रेखा को अभी भी यकीन नही हो रहा था कि उसकी माँ एक अनजान की बातों पर इतना खिलखिला रही थी 

.…...……...........................................................