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Thursday, May 27, 2021

कच्चा मन पक्का प्यार भाग प्रथम

जी पी एम स्कूल का एक आम दिन, जिसमे बच्चे कुछ पानी की टंकियों पर बात कर रहे है, कुछ क्लास में बैठे एक दूसरे को मुह चिढ़ाते जा रहे है, कुछ क्लास मे मेज पर बैठे अपने प्रवचन से दोस्तों में अपने सर्वोपरि होने का भ्रम जगाने की कोशिश में ज्ञान पेल रहे है, कुछ पढ़ भी रहे है ।

वही एक बच्चा स्कूल के दूसरे मंजिल की सीढ़ियों पर एकांत में बैठ कर अपनी ही दुनिया मे खोया है । तभी उसका साथी ढूंढते हुए पहुंचता है।

" क्या कर रहा है यहाँ सीढ़ियों पे, जानता है आज रश्मि ने ट्रीट देने को अड्डे पर बुलाया है, चलेगा क्या "सुमित सीढ़ियों पर बैठते हुए बोला, रंजन अब भी फर्श पर गिरे पानी को टकटकी लगाकर देख रहा था,
" अबे एक्सपायर हो गया क्या " सुमित बैग मारते हुए बोला
रंजन ने चौक कर सुमित को देखा, वो अभी बैग लगने गिरते गिरते बचा था, संभलते हुए उसे चिढ़ाने के अंदाज में बोला" आ गया बृंदा मैम से पिटकर " 

मुह बनाते हुए सुमित ने बैग खोलते हुए  कहा " ला साले फिजिक्स की कॉपी दे, खुद तो आइंस्टीन पैदा हो गया, कभी कोई सवाल गलत ही नहीं होता, और हम घर पर भी पिटे और स्कूल में भी "
रंजन ने मुस्कुराते हुए कॉपी थमाई और बोला " ओ या आई ऍम अ कॉम्पलैन बॉय , हा हा हा"
सुमित ने फिर रंजन को गौर से देखते हुए कहा " क्या , अभी किसके ख्यालों में था "
रंजन हिचकिचाया " क्या यार कुछ नहीं "
" अबे बोल दे ...' सुमित ने पैन की नोक बन्दूक की तरह रंजन के सिर पर तान दी , पर तभी कुछ सोच कर मुस्कुराने लगा।
" हाँ यार बस रजनी मैम के बारे में सोच रहा था " रजन ने सुमित का पैन हटाते हुए कहा
" मैं अब भी कह रहा हूँ वो सिर्फ तुझे बाकि मैम की तरह बस पसंद करती है और कुछ नहीं, तू मुफ्त में सेंटी हुआ जा रहा है " सुमित ने कॉपी पर लिखते लिखते बोला
रंजन फिर किसी दुनियां में जा चूका था। 

रंजन को कुछ वक्त पहले क्लास में जब उसकी कॉपी देखकर उसके गाल पर प्यार से रजनी ने जो हाथ फिराया था वो अभी भी चलता महसूस हो रहा था। ये सब उसके शरीर मे गुदगुदी दौड़ाने के लिए काफी था ।इसलिए ही वो मुस्कुरा रहा था।
" अबे वो रजनी मैंम तुझे बच्चा समझ के प्यार करती हैं तू मरा जा रहा है और वो अंजलि फिर तेरे लिए पराठे लाई थी वो कुछ नहीं " सुमित ने गले में हाथ डालते हुए कहा
रंजन ने चौंक कर खड़े होते हुए कहा " तूने उसे बताया तो नहीं मैं यहाँ हूँ "
" मैं तेरा सच्चा यार हूँ , बस यार पराठे खा कर इतना बोल दिया की तुझे पराठे अच्छे लगे " सुमित ने शरारती मुस्कुराहट से कहा 
" अबे साले खा खा  कर ढोल हो गया है फिर भी ..." पेट पर घूंसा मारते हुए रंजन ने सुमित को गिरा दिया।
" आह उई मां आह आह .." सुमित पेट पकड़ कर लेट गया।
रंजन गंभीर होते हुए सुमित के पेट को सहला कर पूछने लगा " सॉरी सॉरी यार ज्यादा तेज लग गया क्या "
" अबे इतने टेस्टी पराठों के लिए मैं इससे ज्यादा दर्द झेल सकता हूँ" सुमित ने सीढ़ियों पर लेटे मुस्कुराते हुए कहा

" साले अगर अगली बार तूने मेरा नाम लेकर पराठे खाये तो तुझे लूज मोशन की दस बारह गोली खिला दूंगा " रंजन ने सुमित के पैरों पर लात मारी और चलते चलते बोला " आ जा रोहिणी मैम क्लास में लेट आने वालों के साथ क्या करती है याद है या नहीं "

इसे सुनकर सुमित भी पीछे पीछे चला गया


रंजन, एक 14 साल का पढ़ाई में होनहार, पर दिखने में ठीक ठाक लड़का था । 

पर उसके चेहरे पर उसकी हमेशा रहने वाली मुस्कुराहट उसे सभी से अलग करती थी।

अभी उसकी जिंदगी घर से स्कूल और घर से ट्यूशन तक ही सीमित थी। पर रंजन भी था तो एक लड़का ही और वो भी इस खतरनाक उम्र में जिसमे सामान्यतः सभी अपना पहला प्यार पाए न पाएं पर पहले आकर्षण से कोमल मन को उलट पुलट होने से नही बचा पाते।

 ऐसा ही रंजन के साथ हो रहा था और इन दिनों रंजन पहले प्यार की उलझनो में जवान हो रहा था और ये प्यार था या आकर्षण ये उसे भी नही पता और उस पर एक और मुसीबत पहला प्यार आया भी तो किस पर, उसकी मैथ की टीचर रजनी पर।

रंजन के घर मे कोई ज्यादा सदस्य तो थे नही, उसकी बड़ी बहन चांदनी उर्फ चैरी, एम बी ए कर के दिल्ली में नौकरी कर रही थी I प्रोफ़ेसर माँ सुमन और बिजनेसमैन पिता अशोक के बीच अब रंजन ही केंद्र बिंदु था Iइसलिए रंजन को अपनी किसी मांग को 24 घंटे से ज्यादा इंतजार कभी नही करना पड़ता था पर साथ भी रंजन की हर मांग पूरी होने की और वजहे भी थी जैसे उसका सामान्य से ज्यादा संवेदनशील होना, हर काम को बहुत जल्दी सीख जाना, और फिजूलखर्ची नही करना उसके माँ और पिता दोनों को ही उसकी हर मांग को जायज मानने के काफी था ।रंजन को उसका भविष्य बनाने को लेकर चिंता की जरूरत कभी उसके पिता के जैसा बिजनेसमैन बनने की आकांक्षा के कारण महसूस ही नही हुई।

 सुमित मध्यमवर्गीय परिवार  का इकलौता बेटा था और रंजन का इकलौता दोस्त भी । सुमित के शौक थे पसंद का खाना और शतरंज खेलना । उसके भविष्य को लेकर बहुत सपने थे पर रोज बदलते रहते थे । वो डीलडौल में मोटा होने के कारण क्लास में मजाक का पात्र जरूर बन जाता था पर रंजन का साथ उसे सब भुला देता था ।

उनके ही क्लास की एक लड़की बड़ी सुंदर मासूम और हंसमुख अंजलि थी जो रंजन से बेइंतिहा प्यार करती थी।

उसका हर दिन रंजन का फोटो देखकर शुरू होता था ।फिर सारा दिन रंजन के आगे पीछे घूमने के बाद शाम को उसके साथ बाइक पर ट्यूशन जाने के बाद भी रात को फ़ोन पर भी उसकी बातें होती थी। 

अंजलि के प्यार के बारे में रंजन को छोड़कर सभी जानते थे पर रंजन को लगता था कि रजनी मैम ही उसका पहला और आखिरी प्यार है । रजनी सुमित की पड़ोसी भी थी इसलिए अक्सर सुमित उनके साथ उनकी स्कूटी पर आता दिखाई दे जाता था तो उसकी किस्मत से रंजन को जलन होने लगती थी कि कैसे ये रजनी मैम के साथ बैठा है और मैं तो केवल स्कूल में ही उन्हें देख सकता हूँ और ये तो उनके साथ घर तक जाता है ।

मैम का पड़ोसी है क्या करता मन मसोस कर रह जाता था इधर अंजलि को हर हाल में बस रंजन का साथ चाहिए होता था और रंजन के घर से बस कुछ दूर ही रहती थी इसलिए उसी के साथ बस में आती जाती थी रंजन की तरह ही अमीर घर की शहजादी थी और उसके पिता विदेश में रहते थे वो अपनी माँ उर्मिला और एक छोटे भाई सुमित के साथ रहती थी ।अंजलि के परिवार को यहाँ रहते कुछ साल ही हुए थे पर अंजलि की माँ और रंजन की माँ में अच्छी दोस्ती हो गई थी क्योंकि लगभग रोज ही उनकी मुलाकात रंजन के बस स्टैंड पर हो जाती थी ।

अक्सर रंजन अपनी बाइक पर अंजलि की माँ को मार्किट ले जाना, उसके घर के कामों में हाथ बटाना भी आम बात थी, इसलिए दोनों परिवार काफी घुलमिल चुके थे । अंजलि की माँ से भी अंजलि का रंजन के लिए प्यार कोई छुपा नही था ।

इसलिए एक बार अंजलि की माँ ने इस बारे में रंजन की माँ से बात की 

अंजलि की माँ ने कहा" रंजन इतना प्यारा है कि उसे प्यार करे बिना कोई रह ही नही सकता"

रंजन की माँ ने अंजलि की बात के भाव से अनजान होने के कारण कहा" वो तो है, पर आज ये सब तुम्हे कहने की जरूरत क्यों पड़ गई"

अंजलि की माँ ने मुस्कुराते हुए बात को आगे बढ़ाया" हम्म आज कुछ खास हुआ इसलिए कहना पड़ा"

रंजन की माँ ने आश्चर्य से पूछा" ऐसा क्या हो गया"

अंजलि की माँ ने सपाट लहजे में कहा" अंजलि रंजन को बहुत प्यार करती है"

रंजन की माँ ने सामान्य होते हुए कहा" तो इसमें कौन सी नई बात है, अभी खुद ही तो तुमने कहा कि रंजन इतना प्यारा है कि कोई भी उसे प्यार करने लगेगा"

अंजलि की माँ ने अपनी बात का मतलब न समझते देख रंजन की माँ के हाथ पर हाथ रखकर बोली" सुमन वो प्यार नही वो बाला प्यार "

रंजन की माँ ने समझने की कोशिश करते हुए कहा"वो वाला, कौन सा वाला"

अंजलि ने खुलकर कहा" गर्लफ्रैंड बॉयफ्रेंड वाला"

अब रंजन की माँ ने चौकते हुए कहा" क्या सच मे, तुम्हे कैसे पता चला"

अंजलि की माँ ने गहरी सांस लेते हुए कहा" मैंने देखा कि सुबह सुबह वो फ़ोटो को छू कर सिर से लगा रही थी"

रंजन की माँ ने असमंजस में कहा" मतलब "

अंजलि की माँ ने समझाया" वो मैं अंजलि के पापा के फ़ोटो को देखकर उठती हूँ और फ़ोटो छूकर सिर से लगाती हूँ, उसने मुझे ऐसा करते देखा होगा, इसलिए आज सुबह मैंने देखा कि वो अपनी किताबो के बीच से रखे फ़ोटो को छूकर सिर से लगा रही थी, पहले मुझे लगा भगवान का फोटो देख रही है पर जब उसके जाने के बाद मैं किसी काम से उसके कमरे में गई तो उत्सुकताबश मैंने किताबो के बीच टटोल कर देखा, तो रंजन का फोटो था, इसलिए ही मैंने आज ये बात तुमसे कही"

अब रंजन की माँ थोड़ा गंभीर होकर सोचने लगी। अंजलि की माँ ने देखा तो उसे लगा उसने बता कर कुछ गलत कर दिया तो बोली" सॉरी अगर तुम्हे मेरी बात बुरी लगी हो तो माफ कर दो, पर मुझे शक तो उसकी बातों से पहले ही था क्योंकि उसकी दिन भर की बातों में कई बार रंजन के बारे में ही बातें रहती थी, वो अपने भाई तक को पढ़ाई के बारे में रंजन की बड़ाई करते हुए ही बताती थी और तो और अगर कभी मजाक में भी रंजन की किसी बात को बुरा कहा तो ऐसे चिढ़ जाती है जैसे उसे ही बुरा कह दिया हो।"

ये सब सुनकर रंजन की माँ का चेहरा धीरे धीरे सामान्य हो चला था और मुस्कुराते हुए कहा" तो तुम ये क्यों नही कहती कि हमारी बेटी बडी हो गई है अब उसके हाथ पीले हो जाने चाहिए, हा हा हा"

अंजलि की माँ को मजाक समझ नही आया, तो थोड़ा गंभीर हो गई तो रंजन की माँ ने उस बात को समझते हुए अंजलि की माँ का हाथ दवाते हुए कहा" तुम क्या सोचने लगी मैं मजाक कर रही थी"

अंजलि की माँ को अभी भी लग रहा था कि रंजन की माँ को बात बुरी लगी है पर वो हंसी में छुपा रही है। उसके इस भाव को पढ़कर रंजन की माँ ने आगे समझाते हुए गंभीरता से कहा" तुम्हें क्या लगा मुझे बुरा लगा इस बात का, ऐसा नही है अगर मेरा रंजन लाखो में एक है तो अंजलि भी किसी से कम नही है, मुझे इस बात के कारण कोई दिक्कत नही पर मैं इसलिए सोच में पड़ गई थी कि अभी हमारे दोनों बच्चे छोटे है और मैं उनके भविष्य के बारे में सोचने लगी और साथ ही ये भी की ये केवल उसका आकर्षण हुआ तो सब बिगड़ भी सकता है"

अंजलि की माँ के चेहरे पर कई भाव आते चले गए और बात को सुनकर खुद ही सोच में पड़ गई।

रंजन की माँ ने अंजलि की मां की हालत देखकर माहौल हल्का करने को कहा" चल कुछ भी हो, तू वादा कर घर मे या बच्चों से अभी इस बारे में कुछ नही कहेगी, वक़्त आने पर मैं खुद ही बात करूंगी, और हाँ ये मेरा वादा रहा अगर दोनों बच्चों को भविष्य में भी ऐसे ही प्यार बना रहा तो मैं खुद तेरी लड़की का हाथ मांगने तेरे घर आऊंगी "

इतना सुनते ही अंजलि की माँ की मुस्कुराहट वापस लौट आई। और उसने रंजन की माँ को गले से लगा लिया।

गले लगाए लगाए अंजलि की माँ ने कहा" मैं तो इसी वजह से डर रही थी, की अगर तुमने अंजलि रंजन के प्यार को स्वीकार नही किया तो..."

रंजन की माँ ने कहा" तो क्या, अंजलि तुझसे ज्यादा मुझे प्यारी है, आज सुन ले मैंने रंजन और अंजलि के प्यार में कभी कोई अंतर नही किया, और आगे भी कभी होने नही दूंगी समझी"

अंजलि की माँ के आंसू छलक आये जिन्हें वो पोंछ कर मुस्कुराने लगी।

इसके बाद ना तो दोनों में से किसी ने इस बारे में बच्चों से कुछ कहा और ना ही बात के बारे में किसी को घर मे बताया।

मगर रंजन था कि हमेशा अपनी रजनी मैम के सपनो में खोया रहता था और इसी उधेड़बुन में जिंदगी बीतने लगी ।

एक दिन गर्मियों की सुबह थी और दीवार से टिका रंजन स्कूल की बस का इन्तजार कर रहा था, रंजन की माँ को आज घर मे ही काम निकल आया तो वो साथ नही थी तो रंजन बात करने के लिये अंजलि का बेसब्री से इंतजार करने लगा तभी अंजलि बड़ी उदास होकर आई ।रंजन ने देखा और छेड़ने के अंदाज में बोला "क्या हुआ अंजू आज इतना सन्नाटा क्यों है"

अंजलि ने चुप्पी तोड़ने नाम ही नही लिया और रंजन के पास से हटकर खड़ी हो गई ।

रंजन को लगा आज ये इतनी नाराज किस बात पर है जो मुझसे बात नही कर रही पर उसने कुछ पूछने को कदम बढ़ाए तब तक बस आ गई और दोनों उसमे बैठ गए । अंजलि वैसे ही चुप्पी साधे रही स्कूल पहुच कर भी ऐसे ही दिन जा रहा था फिर सुमित ने भी उससे पूछने की कोशिश की पर उसने कुछ बताया नही और इसी तरह स्कूल से घर जाने के बाद जब अंजलि उससे बिना बोले घर चली गई तो उसे अचरज हुआ कि पहले तो कभी इतना चुप इसको नही देखा आज बात क्या है 

रंजन घर पहुंचा फ्रिज से निकाल कर खाना गर्म कर खाया और लेट गया तब तक रंजन की माँ भी आ गई 

और रंजन से पूछा " खाना खा लिया "

रंजन ने कहा "हा"

रंजन की माँ ने कॉफ़ी बनाई और एक कप रंजन को देती हुई बोली क्या हुआ "आज मेरा बेटा किस सोच में डूबा है"

रंजन बोला"कुछ नही माँ आज अंजलि सुबह से उदास थी कुछ बताया नही ऐसा तो वो तब भी नही करती जब वो खुद बीमार हो , कुछ बात तो जरूर है"

रंजन की माँ मुस्कुराते हुए "अरे बेटू को दोस्त की इतनी फिक्र , चल तू कॉफ़ी पी मैं फोन करके अंजलि के घर पता करती हूं"

रंजन की माँ फ़ोन पर कुछ देर बात करती है फिर वो खुद भी परेशान हो जाती है ।फिर कुछ सोचते हुए रंजन से कहती है " तू परेशान मत हो अभी मैंने अंजलि को बुलाया है उससे कुछ बात पता कर बताती हु"

थोड़ी देर में अंजलि आ जाती है और माँ के साथ किचिन में चुपचाप खड़ी होकर कुछ काम मे हाथ बटाने लगती तभी रंजन की माँ उसके सिर पर हाथ फेर कर बड़े प्यार से पूछती है " आज मेरी अंजू इतनी चुप है कि उसके होने का तो पता ही नही चल रहा "

इतना कहने की देर थी कि जैसे अंजू का दिल का गुबार आंसुओ के साथ बहने लगा और उसे रंजन की माँ ने गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगी।

अंजू तो आज जैसे भरी पड़ी थी सिसकियों के साथ रोते रोते उसने रंजन की माँ को और कस के पकड़ लिया और उनका पूरा कंधा आंसुओ से भीगा दिया ।कुछ देर बाद जब आंसू कम हुए तब रंजन की माँ उसे रसोई से बाहर लेकर डाइनिंग टेबल के पास कुर्सी पर बिठा कर उसे पानी दिया और फिर उसके आंसू पोछ कर उससे फिर से बड़े प्यार से पूछा "अंजू कुछ बताओ भी तो अब कितना रोओगी देखो अब तुम नही चुपी तो मैं भी रोने लगूंगी "

इतना सुनते ही एक नजर रंजन की माँ पर डाल अपने आंसू पोंछकर बोली " कल हमारे घर दादी आई थी जब मैं स्कूल से घर पहुंची तो मम्मी से बोली अब बहुत हुआ इसकी पढ़ाई बंद कराकर इसके हाथ पीले करो इसे क्या कलेट्टर बनाओगी इस पर मम्मी ने कहा अभी ये छोटी है 

इंटर तो पढ़ लेने देते है फिर सोचेंगे तो दादी बोली जैसी मा वैसी बेटी इसके छोटे छोटे कपड़ें नही दिख रहे पूरी घोड़ी हो गई है तुझे शहर में क्या भेजा बेशर्म हो गए है  राम राम राम इस पर मम्मी बोली ये तो स्कूल ड्रेस है सभी लडकिया पहनती है इस पर दादी ने कहा देख मैं तो जा रही हूँ पर आने दे मेरे बेटे को फिर सबसे पहले इस लड़की की शादी ही कराउंगी तभी चैन से बैठूंगी इतना कहकर दादी चाचा के साथ चली गई पर मुझे डर लग रहा है कि मेरी पढ़ाई का क्या होगा "

रंजन की माँ ने अंजलि के हाथ को हाथ मे लेकर बोली "अरे बेटा इतनी सी बात मैं और तेरी मम्मी तेरे लिए इस पूरी दुनिया से लड़ जाएंगे तेरी दादी क्या चीज है तू बस पढ़ाई पर ध्यान दे"

इतना कहने भर से अंजलि के चेहरे पर मुस्कान पूरे दिन में पहली बार लौटी ये देखकर रंजन के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई जो उन दोनों की बातों को अपने कमरे के दरवाजे की ओट से सुन रहा था और अपने कमरे से डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ते हुए बोला "मम्मी किसी के शादी में गए कई साल गुजर गए तो मम्मी लड्डू खाने कब चलना है "

इतना कहना था कि अंजलि उठी और रंजन आगे आगे अपने कमरे की तरफ बापस भागने लगा अंजलि पीछे पीछे बोल रही थी "रुक आज तेरा मुह ही लड्डू जैसा लाल कर देती हूं"

इतना कहते कहते रंजन बेड तक पहुंचकर पलटा तब तक अंजलि डोर मैट में उलझकर रंजन के साथ बेड पर गिर गई । अंजलि अभी भी किसी ख्वाब की तरह एक टक रंजन की आंखों में देख रही थी और रंजन भी आज पहली बार उसे इतने नजदीक से देख रहा था अंजलि के शरीर की खुशबू रंजन की सांसो में घुल कर उसे मदहोश कर रही थी पहली बार उसे उस छुअन का एहसास अजीब अजीब अहसास करा रहा था रंजन ने अंजलि के गुलाबी चेहरे को कई बार देखा था पर आज कुछ अलग था लग रहा था मानो गुलाबी गुलाब पर आंखे नाक और होंठ लगा दिए गए हो अंजलि का मासूम चेहरा रंजन को किसी और दुनिया मे ले गया ,रंजन और अंजलि के दिलों का एहसास एक हो चुका था पर तभी उसे माँ की आवाज बाहर से आई "क्या हुआ रंजन अंजलि गिर गई क्या " 

रंजन ने अंजलि को कंधे से पकड़ कर उठाया तो अंजलि की तंद्रा टूटी और वो दोनों हाथ से अपने चेहरे को शर्म से ढक कर वही बेड पर बैठ गई ।रंजन ने माँ को जवाब दिया " नही माँ बस गिरते गिरते बच गई"

माँ ने कहा " ठीक है तुम लोग बात करो मैं नहाकर आती हूँ "

रंजन ने अंजलि के हाथो को पकड़ कर हटाया तो अंजलि के शर्म से सेब जैसे लाल गाल दिखे तो रंजन की मुस्कुराहट और बढ़ गई अब एक नजर अंजलि ने रंजन को देखकर अपनी आंखें झुका दी ।

रंजन बोला"आज तुझे क्या हुआ ये दुल्हन की तरह शर्मा क्यों रही है बाहर तो अपनी शादी की धड़ल्ले से बातें कर रही थी"

इतना कहना था कि शर्म का गुलाबी रंग एक झटके में उतर गयाऔर अंजलि के आंसू एक बार फिर बहने लगे रंजन को पछतावा होने लगा कि अभी तो जैसे तैसे चुप हुई इसे फिर रुला दिया तो बोला" सॉरी सॉरी मुझे माफ़ कर दे मेरे कहने का वो मतलब नही था प्लीज् अब रो मत "

अंजलि फिर रोये जा रही थी तो रंजन ने उसके पैरों के पास बैठ कर उसके हाथों को हाथो में ले लिया और बोला " देख बड़ी मुश्किल से तेरे चेहरे की हंसी लौटी थी मुझे माफ़ कर दे अब दोबारा ऐसा नही करूंगा "

अंजलि रोते रोते बोली" तो ऐसी बात करता क्यों है "

रंजन ने दोनों कान पकड़े हुए कहा" अब बस ले कान पकड़ कर माफी मांग रहा हूँ अब तो माफ कर दे"

अंजलि ने अपने आंसू पोछते हुए कहा" ठीक है इस बार माफ कर दिया पर दोबारा बोला तो समझ लेना"

रंजन मुस्कुराते हुए बोला " ये हुई न बात पर अब मुझे बस एक दुख है एक शादी की दावत का नुकसान हो गया" और खिलखिलाने लगा ।

इतना सुनकर रंजन के सीने पर मारते हुए रंजन के गले लग गई रंजन भी उसके सिर पर हाथ फेरने लगा ।

रंजन और अंजलि दोनों ही बस ऐसे ही गले लगे थे दोनों की आंखे बंद हो चुकी थी सांसे दोनों जैसे एक साथ ले रहे थे जैसे एक जिस्म हो चुके हो और उनका अलग होने को दिल ही नही कर रहा था तभी बाहर से माँ की आवाज आई "रंजन अंजलि चली गई क्या"

रंजन के बोलने से पहले अंजलि ने रंजन से अलग होते हुए कहा "नही आंटी अभी यही हूँ "

ये कहते कहते एक बार फिर रंजन को देखकर अंजलि मुस्कुराई और रसोई की तरफ चली गई और रंजन उसके जाने के बाद अपने बेड में लेट कर अंजलि के मासूम चेहरे और उसकी प्यारी मुस्कुराहट के बारे में सोचने लगा ।

ऐसे ही लेटे लेटे उसकी नींद लग गई और फिर हड़बड़ाकर तब टूटी जब उसके माँ के चीखने की आवाज आई ...





नेकी का नेग भाग-1

कुंवर लाल सिंह, वैसे तो अपनी गली के सबसे धनिकों में से एक थे क्योंकि उनके मुताबिक "बीबी बच्चे का झमेला मात्र काँटों की गद्दी है जिस पर बैठ इंसान चाहे तो भी मुस्कुरा नही सकता बस दिखावा ही कर सकता है "| यही वजह थी कुंवर साहब ने अभी 44 सावन देखने के बाद भी गृहस्थ जीवन की लालसा नहीं की अब तो आलम ये था की बाल रंग लेने के बाद खुद को अक्सर लड़का समझने लगते थे | ऐसा नही की लोगों ने उन पर शादी के लिए दवाव नही डाला पर उन्होंने हिम्मत से अपनी पैरवी की और आखिर लोग मान गए ।

 फिर भी वक़्त जब गुजरता है तो वह कुछ देते हुए बहुत कुछ साथ ले जाता है । दिन में कुँवर साहब को अपने और शरणागतों के काम से फुरसत नही मिलती थी और रात में आधी रात तक अपने शौक से , अर्थात चित्रकारी । यह शौक शुरुआत से नही था पर अकेलेपन ने बहुत कुछ सिखा दिया था जिसमे से ये एक चित्रकारी थी । अब घर मे जब अकेले पुरुष हो तो सिर्फ एक ही चीज परेशान करती है वो है चूल्हा-चौका ।तो उनकी माता जी का निधन हुआ तभी उन्होंने सोच लिया था जीभ का चटोरापन तो है नही तो कभी थोड़ा कुछ बना कर जीवन जी ही लेंगे और वैसा ही अभी तक स्वयं को ढाल लिया था । 

माँ बाप के गुजरे अभी 2 साल बमुश्किल हुए थे पर घर का गुजारा करना मुश्किल होने लगा क्योंकि कभी काम धाम तो कुछ कभी किया नही जो पूंजी बाप दादा ने छोड़ी वो कुछ हद तक खत्म होने को आ गई थी।किसी ने सही कहा है अगर खाली बैठकर राजा भी खाए तो किसी दिन उसके हाथ भी खाली हो ही जाते है ।

परेशानी बड़ी थी सो कुंवर साहब ने इसके लिए कोई जुगत ढूंढने लगे पर चुपचाप क्योंकि भई किसी को पता चल जाता तो कुंवर साहब की बस इज्जत ही बची थी वो भी चली जाती ।

एक दिन कुंवर साहब अकेले बैठे बैठे ऊंघ रहे थे कि किसी ने बाहर से आवाज लगाई कुंवर साहब क्या घर मे है।

कुंवर साहब बोले "आते है भाई बैठक में बैठिये तब तक "

थोड़ी देर में कुंवर साहब बाहर आये तो सामने बैठे व्यक्ति ने कहा" साहब इस समय आपको परेशान किया इसके लिए माफी चाहता हु "

कुँवर साहब मुस्कुराते बोले " अरे परेशानी कैसी बताइये कैसे आना हुआ"

व्यक्ति ने बिनती के लहजे में कहा" बस साहब कुछ नही मेरे घर की पिछली दीवार ढह गई सो अब खुले में रहने को मजबूर हु अगर आप .."

कुंवर साहब कुछ समझते हुए बोले" इन दिनों मैं भी कुछ मुश्किल दौर से गुजर रहा हु पैसो की थोड़ी किल्लत है वरना आपकी जरूर मदद करता"

व्यक्ति गर्दन हिलाते बोला " अरे नही बात पैसो की नही है बात ये है कि मेरा समान खुले में पड़ा है बारिश के दिन आने वाले है और अभी तो मैं घर ठीक कराने लायक पैसे नही जोड़ पाया हूं इसलिए आया था ..कुछ तीन चार महीनों के लिए शरण मिल जाती तो बड़ा उपकार होता"

कुंवर साहब ने दिल मे सोचा अब तो हम खुद ही इतने बुरे दौर से गुजर रहे है अगर इन लोगो को पता चला तो रही सही इज्जत दाव पर है।

कुंवर साहब का आदतन अब मदद करने का जी भी कर रहा था पर घर के हालात खुल जाने का डर भी था तो सोचा कि कुछ महीने की तो बात है और नौकरो के कमरे तो कब से हम देख भी नही पाए कि कितने कबूतरों ने घर बना लिया ये सोचकर कुछ दिल मे ठान लिया और मुस्कुराते हुए व्यक्ति से बोले "देखो भाई अगर तुमने हमारे बाबा साहब (पिता जी) से ये कहा होता तो अब तक तुमको धक्के देकर भगा दिया होता मगर हमारा दिल किसी की परेशानी में .."

व्यक्ति कुंवर साहब के घुटनो पर दोनों हाथ रखते बोला "माई बाप है आप हमारे आपके मोम जैसे दिल की वजह से ही तो इतने फरियादियो का मेला लगा रहता है आप के दर से कोई खाली आज तक नही गया "

कुंवर साहब ऐसी बातें सुनकर इतने फूल कर कुप्पा हो गए की बोले " तुम बहुत अच्छे इंसान लगते हो इसलिए तुम उन आम के पेड़ के नीचे वाले कमरों में रहने लगो "

व्यक्ति बोला "आपकी बहुत बहुत मेहरबानी"

कुंवर साहब बोले"कौन कौन है तुम्हारे घर मे "

व्यक्ति बोला " मेरी बीबी तो बीमारी में गुजर गई और आप की दया से मेरे दो बच्चे एक विधवा बहन और माँ है "

कुंवर साहब ने कहा " कब से रहने आओगे "

व्यक्ति बोला "आपकी इज़ाज़त हो तो कल शाम तक सारा सामान ले आऊंगा"

कुंवर साहब बोले" ठीक है चाबी ले लेना आकर"

इतना सुनकर खुशी खुशी व्यक्ति चला गया ।

उसे जाते देख किसी की मदद करने का संतोष कुंवर साहब के चेहरे पर था पर सोच रहे थे इन लोगो को घर से दूर कैसे रखूं की इन्हें मेरे हालात पता न चले कुछ सोचना होगा ।

कुंवर साहब के दिमाग मे पूरे दिन अपनी शान खोने के डर की उहापोह में लगे रहे


सूरज पर ग्रहण भाग प्रथम

सूरज कहने को तो बड़ा शांत लड़का था पर आज किसी अपने को इस हालत में देख कर खुद को  चीखने से रोक नहीं पाया | दरअसल उसकी बहन निशा सीढ़ी से गिरकर बेहोश हो चुकी थी |
और  वो हाथो में उसे उठा कर दरवाजे की तरफ दौड़ा जा रहा था की तभी पीछे से उसकी बुआ की गरजती हुई आवाज आई "क्या कर दिया तूने निशा को "
उसने चलते चलते कहा " ये गिर कर बेहोश हो गई "
इतना सुनते ही मानो निर्मला देवी का गुस्सा तो आसमान छूने लगा और तेज क़दमों से आकर सूरज की पीठ पर दो बजनदार घूसे लगाये |

निर्मला देवी ने चीखते हुए कहा " क्यों रे जब तक हम दोनों को भी नहीं खायेगा चेन से नहीं बैठेगा जैसे लाला जी को खा गया, जरूर तूने ही धक्का दिया होगा देखो तो कितना खून निकल रहा है, पड़ गई तेरे कलेजे को ठंडक , तू उसी सड़क पर मर क्यों नहीं गया जहाँ से तुझे लाला जी तुझे उठा के लाये थे ",
अब कोई भी आवाज सूरज के कानों तक नहीं पहुँच रही थी उसे बस निशा की उस चोट की फिक्र थी जो उसके सर में लगी थी उसने बहुत कोशिश की निशा की बेहोशी टूटी नहीं तो फिर वह निशा को उठा कर बाहर रिक्शे की तरफ बढ़ने लगा इस पर बुआ ने उसकी शर्ट पकड़ कर कहा "तुझ जैसे मनहूस की तो परछाई भी अब निशा पर नहीं .."
इतना ही निर्मला कह पाई कि सूरज की लाल आँखे और रोइ सी आवाज ने उन्हें चुप हो जाने पर मजबूर कर दिया, सूरज बोला"बुआ जी बस मुझे अस्पताल जाने दो फिर जो चाहे कह लेना |"
और इतना सुनने पर निर्मला ने सूरज की शर्ट को छोड़ दिया |

 
आज अस्पताल में सूरज का दूसरा दिन था, निशा सो रही थी और निर्मला निशा के सर पर  हाथ फेर रही थी और सूरज डॉक्टर को रिपोर्ट दिखा रहा था | चैक अप होने और सारी रिपोर्ट् देखने के बाद डॉक्टर ने सूरज की तरफ देखकर कहा," तुम्हारी बहन बड़ी किस्मत बाली है कोई बड़ा फ़ैक्चर नहीं हुआ , सारी रिपोर्ट नार्मल है, अब हम इसे नार्मल वार्ड में शिफ्ट कर रहे हैं कल इसे डिस्चार्ज करा लेना |
डॉक्टर के जाने के बाद पास खड़ी नर्स मेनन ने दवाइयाँ निकालते हुए कहा " सच में इस लड़की की किस्मत बहुत अच्छी है वरना इतना फिक्र करने वाला भाई कहाँ मिलता है, अब तो जाकर थोड़ी देर सो लो सूरज वर्ना ये ठीक हो जायेगी और तुम बीमार हो जाओगे " इतना कह कर मुस्कुराने लगी |
अगले दिन निशा को घर लाया गया और सूरज ने जैसे ही निशा को बिस्तर पर लेटाया, निशा बोली" सॉरी भैया मेरी गलती थी और डाँट आपको लगी "
" अरे नहीं पगली कोई बात नहीं ये तो तेरे लिए उनका प्यार था "सूरज ने उसके लटके हुए निशा केे पैर बिस्तर पर रखते हुए कहा |
"नहीं भैया मैं हमेशा से मां का व्यवहार देखती आई हूँ उन्होंने जरूर तुम्हे खूब खरी खोटी सुनाई होगी मुझे पता है" इतना कहना था सूरज ने अपने होंटों पर ऊँगली के इशारे से निशा को मुस्कुराते हुए चुप रहने का इशारा किया और बोला"अब बात नहीं बाक़ी बातें कल होंगी सो जाओ"

इतना कहते हुए निशा बोली " मैं सो जाउंगी पर आप बादा करो जबतक मैं सो नही जाती आप यही बैठोगे "

इतना कहकर सूरज की गोद मे सिर रख कर लेट गई सूरज भी प्यार से उसके  सर पर हाथ फिराने लगा और 

धीरे धीरे निशा नींद की आगोश में चली गई।

रात भर की अपने बिस्तर की नींद ने निशा की चेहरे की रौनक लौटा दी थी जिसे देख कर सूरज भी खुशी खुशी काम पर जाने को तैयार था पर अभी लगता है कि सूरज पर लगा ग्रहण हटा नही था । 

पिछले दो दिन से सूरज दुकान पर खुद नही जा पाया था और इसी कारण दुकान पर काम करने वाले लड़के अमर और रंजीत ही दुकान का काम संभाल रहे थे ।

करीब 11 बजे निर्मला देवी जब गल्ले पर आकर बैठी तो पता चला तिजोरी से 2000 का एक नोट कम है निर्मला देवी तो कई दिन से इस बात शक था कि सूरज पैसे की चोरी कर रहा है आज यकीन हो गया । इसी शक की बजह से ही तो निर्मला देवी ने नोटों को गिन कर रखा था । अब तो उन्होंने आब न देखा ताव सूरज को बुला कर दो झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद दिए । सूरज के आंसू निकल आये पर फिर भी निर्मला की तरफ प्रश्नवाचक निगाह डाली तो निर्मला ने गला फाड़ कर चीखना शुरू किया और बोली"हाय हाय ये लड़का तो हमे जब तक सड़क पर नही ले आएगा नही रुकेगा अभी हजारो रुपये का अस्पताल का खर्चा कराया और अब चोरी पर उतर आया  तू ऐसा निकलेगा मैं जानती थी कितनी बार कहा इस नाली के कीड़े को वही सड़ने दो लाला जी नही माने ..हाय हाय खुद तो चले गए इस करमजले को भी साथ  ले जाते " 

इतना सुनकर आस पास के दुकानदार और ग्राहक भी ये सब देख कर माजरा समझने की कोशिश करने लगे तभी एक महिला अंदर आई और बोली "क्या हुआ बहन जी "

निर्मला देवी ने कहा " देखो ना मैंने जरा सा अपनी लड़की के इलाज पर ध्यान देना क्या शुरू किया ये लड़का तो चोरी पर उतर आया"

महिला बोली" ऐसे चोरों को तो पुलिस के हवाले कर देना चाहिए रुकिए अभी बुलाती हु "

निर्मला देवी को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई हो जोर देते हुए निर्मला ने कहा " हाँ बुलाइये वही उगलवाएँगे इसके मुँह से "

इतना सुनते एक आदमी अंदर आया और बोला " क्या हुआ मैडम "

इतना सुनते ही वो महिला आदमी को देखकर मुस्कुराने लगी बोली " देखिए ना हबलदार साहब ये मासूम सा लड़का जो सुबक रहा है कितना डीठ है कि चोरी के बारे में इतना पिट के भी कुछ नही बोल रहा है "

हवलदार बोला" अच्छा , ओये बता कहा गया नोट बरना थाने ले जाकर इतने बेंत मारूंगा की पिछले जन्म का भी याद आ जायेगा"

सूरज जो कोने में खड़ा सुबक रहा था कि कैसे समझाए की चोरी उसने नही की ।

हवलदार ने सूरज की कॉलर को खींचते हुए कहा " चल जब तेरी मर्जी और ठुकाई की है तो मैं भी क्या कर सकता हु अच्छा मैडम इसे ले जा रहा हु इसकी बोलती खुलते ही बताऊंगा"

"अरे रुकिए इसका झाड़ा तो ले लीजिए हवलदार जी" महिला ने सूरज का हाथ पकड़ कर रोकते हुए कहा

हवलदार को बात सही लगी और उसने सूरज का झाड़ा लेते हुए एक 2000 का मुड़ा हुआ नोट निकाल कर निर्मला को दिखाया तो निर्मला चौंक उठी "हॉ यही है यही तो है " और नोट को लेकर तुरंत गल्ले में डाल दिया

"बहुत बहुत शुक्रिया हवलदार जी " निर्मला ने हंसते हुए कहा

हवलदार ने भी हंसते हुए कहा " इस शुक्रिया से क्या होगा देना है तो एक 2 किलो अरहर की दाल दे दीजिए हे हे हे"

निर्मला समझ गई आज तो ये हवलदार उसका 300 का चूना लगा कर जाएगा तो बोली" अरे अमर जरा 2 किलो बढ़िया वाली अरहर की दाल तो ले आ "

महिला ने हवलदार से कहा "अरे हवलदार जी इस लड़के को तो रंगे हाथ पकड़ लिया फिर भी छोड़ रहे हो जरा कुछ दिन जेल में डालो वरना फिर से बड़ी चोरी करेगा"

हवलदार ने हामी भरते हुए कहा" सही कहा मैडम आपने ये साले इस उम्र में चोरी सीख गए तो बड़े होकर डाके डालेंगे इसे तो दिन नही महीने भर जेल में डालूंगा"

इतने में अमर दाल ले आया जिसे लेकर हवलदार एक हाथ मे दाल और दूसरे से सूरज का कॉलर पकड़ कर ले गया ।

 ये देखकर निर्मला ने चैन की सांस ली और महिला से बोली "बहनजी आपने तो कमाल कर दिया इतनी जल्दी तो करमचंद जासूस भी नही ढूंढ पाते ही ही ही "

महिला बोली " हा बहन जी मेरा दिमाग बहुत तेज चलता है उसी के लिए तो बादाम आधा किलो दे दीजिए"

महिला पैसे दिए और बादाम लेकर बोली " चलिए आपकी उस चोर लड़के से जान छुटी अब इन लड़को को जरा दबा कर रखियेगा"

निर्मला देवी बोली " हा बहनजी मैं तो उस सूरज के बच्चे को जन्म से ही जानती हूं बड़ा दुस्ट है अच्छा हुआ अब तो मैं गंगा नहाई वो इतने साल लाला जी की बजह से बर्दास्त कर रही थी वार्ना तो कबका धक्के मार के निकाल दिया होता ।

महिला ने कहा " अच्छा ठीक है फिर मैं चलती हु"

इतना कहकर महिला ने अपनी स्कूटी उठाई और आगे बढ़ गई थोड़ी देर बाद थाने के बाहर खड़े सूरज और हवलदार के पास जाकर रुकती है । सूरज अभी भी उस चोरी वाले दुःस्वप्न में खड़ा हवलदार के पास सिर झुकाए खड़ा था । कि तभी महिला की आवाज से चौंक जाता है महिला मुस्कुराकर हवलदार से कहती है "शुक्रिया आपने मेरी बहुत मदद की " इस पर हवलदार कहता है "इसमें शुक्रिया कैसा मैंने तो बस अपना फर्ज निभाकर इस मासूम को उस जालिम से बचाने में आपकी मदद की है और मुझे तो मेरा इनाम भी 2किलो दाल के रूप में मिल चुका हा हा हा"

महिला हंसते हुए कहती है "जी हवलदार जी सही कहा कर भला तो हो भला"

इतना सुनकर हवालदार सूरज को वहाँ छोड़कर थाने में अंदर चला जाता है और सूरज उसे पीछे से देखता रहता है कि शायद वो लौट कर फिर उसे थाने ले जाने आएगा

पर तभी सूरज को देखते हुए महिला बोली "चलो सूरज पीछे बैठो"

सूरज वही जड़वत खड़ा अचम्भे से महिला को देख रहा था।अभी तक जो हुआ वो उसके साधारण मन के परे था

महिला ने सूरज की हालत समझते हुए कहा " देख सूरज मैं तुझे घर चलकर सब बताती हु अभी बस इतना समझ की आज से तू अकेला नही अब तेरी दीदी तेरे साथ है चल अब स्कूटी पर बैठ तुझे तेरा नया घर दिखाती हु "

सूरज कुछ जिज्ञासा से फिर कहना चाहता है" पर दीदी ..."

इतना कहते महिला उसका हाथ थाम कर स्कूटी की तरफ कर देती है और सूरज स्कूटी पर बैठकर बिना कुछ बोले बस अपनी जिंदगी की उठापटक को देखकर मुस्कुराने लगता है मानो उसे अपने भविष्य में कुछ अच्छा होने की आशा की किरण दिख रही हो

                               क्रमशः

                           


Thursday, December 27, 2012

"जिन्दा प्यार"

"पता नहीं कहाँ  मर गयी मेरे पेट में चूहे कब्बडी खेल रहे है, ये साली रोज ही देर लगाती है रोटी बनाती है कि पैदा करती है " हरिया ने बडबडाते हुए पसीना पोछा और एक बार फिर गाँव कि ओर देखा इस बार धीरे धीरे चलती हुई धनिया आती दिखाई दी तो कुछ आराम मिला ।
धनिया ने खाना और पानी रखा तो हरिया बोला "कहाँ रह गयी थी यहाँ जान निकल रही थी "
"आज जल्दी में तवे से पैर लग गया और छाला पड़ गया" धनिया ने आह भरते हुए कहा तो टीस हरिया के दिल तक जा पहुंची। इतना सुनते ही भूख प्यास तो हरिया की मर ही चुकी थी क्यूंकि दुनिया में धनिया ही तो इकलौती थी जो हरिया का जिंदगी का एकमात्र सहारा थी। 
"ला दिखा , कुछ लगा लिया था .....पता नहीं तेरा आज कल ध्यान कहा रहता है " खाना एक तरफ रखते हुए हरिया ने कहा ।
"कुछ देर पानी में रखा था तभी तो देर हो गई " धनिया ने पैर पर पड़ा छाला 
दिखाते हुए कहा ।
छाला मोटा पड़ गया था तो हरिया बोला "आज न आती मै भूखा मर थोड़े ही जाता "
ये वही हरिया था जो थोड़ी देर पहले भूख से कुलबुलाता धनिया को गाली दे रहा था मगर अब उसकी आंखे बता रहीं थी जली धनिया है पर जलन हरिया के दिल पर हो रही है। 
धनिया ने हरिया के मुँह पर हाथ रखा और बोली "आपको भूखा रख कर मैं तो मर जाती "
इतना सुनकर हरिया मुस्कुराना चाहता था पर उसका धनिया के लिए प्यार उसे रोक रहा था तो वो दिल ही दिल में उसके लिए आंसू बहा रहा था। 
इतने में उसका ध्यान धनिया की दूसरे पैर के पास गया जो वो मेड के दूसरी तरफ फैला कर बैठी थी और अनजाने में मेड को पैर  के अंगूठे से कुरेद रही थी और मेड का कुछ हिस्सा गिरने के कारण काली पूँछ दिखाई दे रही थी जिसे दखकर अंदाजा लगाया जा सकता था की अंदर उस सांप की मोटाई किसी की कलाई से काम नहीं होगी हरिया कुछ दनिया से कह पाता  तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्यूंकि मेड की काफी मिटटी  खोखल होने के कारन ढह  गई और सांप का असली चेहरा सामने आ गया लगता की अगर ये किसी को डस ले तो वो परलोक सिधारने में ज्यादा देर नहीं लगा पायेगा धनिया अभी भी हरिया पर बिना ध्यान दिए अपने छाले को सहला रही थी हरी या ने चीख कर धनिया से कहा " धनिया पैर  हटा "
धनिया कुछ समझ पाती उससे पहले ही नाग अपना फन  उठा चूका था पर धनिया को ये धयान न होने से अभी भी उसने छाले वाला पैर भी मेड की तरफ कर दिया उस नाग को नागवार गुजरा। 
हरिया ने ध्यान 
से उस नाग को झपटने की कोशिश की क्यूंकि उसे पता था अगर कुछ पल ही इन्तजार धनिया के आखरी पल बन जाते और उसने झट से उसे दबोच कर दूर डालने को ले गया पर छोड़ने के लिए जैसे ही हाथ ढीला किया नाग ने डस लिया और हरिया वही लेटता चला गया ।
अब धनिया दौड़ कर हरिया के पास गयी और उसने देखा क़ी हरिया क़ी साँस नहीं चल रही है तो नाग क़ी तरफ हाथ बढाकर बोली "मुझे भी डस ले, अब मैं भी जी के क्या करूंगी "
तब नाग बोला "अब प्यार निभाने क़ी बारी तेरी है अब तू भी मर गयी तो हरिया के मरने का क्या फायेदा कौन उसके प्यार को याद रखेगा "
"प्यार में मरना नहीं प्यार के बिना जीना ही प्यार को इस दुनिया में जिन्दा रखता है "