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Monday, June 3, 2013

"बाबा चमत्कारी है "

"बम बम भोले ,खोल दरवाजा  बच्चा, देख प्रभु  आये हैं " इतना सुनना  था की अन्दर से चचा निकल कर आये
बाबा ने हाथ देख कर कहा "अरे बच्चा खाली  हाथ, देख हिमालय में कई महीने तप कर के लौटे हैं , कुछ दान दक्षिणा तो दे, बम बम भोले"
"अरे बाबा यहाँ कहाँ आ गए सुबह सुबह चाय भी नहीं पीने  दी "  चचा ने रूखे मन से कहा
" अरे बच्चा घोर अपराध कर रहा है बाबा को कोई मोह नहीं  बाबा को भंडारा कराने  को चाहिए वरना ये मुद्रा तो धूल मात्र  है बाबा के लिए " इतना कहते हुए उस काली लम्बी दाड़ी  बाले उस व्यक्ति की भवे तन गई
" अरे महाराज मैं आपको पहचान नहीं पाया आइये कुटिया  में मेरी मुझे धन्य कर दिया आपने " चचा के तेवर एक दम बदल गए इस पर बाबा ने दाडी पर हाथ फेरा और चचा के आगे आगे बैठक तक आये
"बाबा आप यहाँ बैठो मैं पानी लाता हूँ और भोजन और विश्राम की व्यवस्था देखता हूँ " चचा ये कह कर अन्दर सरक गए और इधर बाबा सोफे पर फ़ैल  कर बैठ गया
इतने में चचा चाची को लेकर बैठक में आये चाची के हाथ में पानी का गिलास था पर बाबा को देखते ही बापस लेकर परदे के पीछे चली गई और साथ में चचा भी और फुसफुसाने लगी " ये किसे बैठा लिया ये तो कोई ढोंगी है
"इस पर चचा ने भी ताव में कहा मेरी आंखे धोखा नहीं खा सकती ये पहुचे हुए बाबा है इनकी सरलता पर मत जाओ "इतना कह पाए थे की बाहर से बाबा के खासने की आवाज आई और दोनों बाहर आ गए
अब चचा चुप चाप किनारे से खड़े हो गए
इस पर बाबा ने कहा "लगता है बिटिया को हम पर बिस्बास नहीं है  "
चचा तुरंत नीचे  चरणों में बैठते हुए बोला " अरे नहीं महराज ये  बात नहीं "
बाबा सोफे से उठने की कोशिश करता हुआ बोला " बच्चा हम सब जानते है "
इतना कहना था की चचा ने बिठाते हुए कहा " आप तो जानते है औरतों के स्वाभाव को "
"ओ शालू आ बाबा के पैर छु कर माफ़ी मांग " चाची  को इशारे से कहा
चाची ने मुह बना कर कहा " एक ऐसे ही मेरे मायके में आये थे तो बो बाद में बड़ा माल इकठ्ठा कर के भाग गए , अब मुझे भरोसा नहीं होता "
चाचा ने गुस्से से कहा" द्देख तुझे यकीं नहीं पर मुझे तो है "
इस पर बाबा बोले " बम बम भोले ये तो मेरा अपमान पर अपमान कर रही है "
चाचा बोले  " नहीं महाराज ऐसा  नहीं है "
चाची  बोली " अगर ये इतने बड़े पहुचे हुए संत है तो कुछ चमत्कार दिखा सकते हैं "
बाबा ने रॉब से दाड़ी पर हाथ फेरते हुए कहा " बता सिक्का हथेली पर गला कर दिखाऊं या पानी में आग पैदा करके दिखाऊं"
चाची ने कहा "मुझे ये आपके पुराने पुराने जादू से क्या लेना कुछ नया हो तो बताइए "
इस पर बाबा बोले " बता फिर क्या देखेगी "
चाची ने तुरंत पांच का सिक्का निकल कर कहा " इसे पांच सौ का बना दो तो मानू "
इतना सुनते ही बाबा कुछ सोच में पड़  गए
चाची जब अन्दर जाने को हुई तो चाचा बोले " अरी  रुक तो अभी बाबा ध्यान में जाकर ही तो चमत्कार दिखायेंगे "और तुरंत बाबा के चरणों में पांच का सिक्का रख दिया
अब तो चाची भी बही खड़ी  हो गई और बाबा को देखने लगी बाबा ने करीब पांच  मिनट बाद ऑंखें खोली और चाची  की तरफ देख कर बोले "तुझे पैसे से बहुत मोह है ले तुझे यही चमत्कार दिखता हूँ "
और सिक्का उठा कर अपने हाथ में रखकर आंखे बंद कर ली और मंत्रो का जप शुरू कर दिया
अब तो चाची भी हाथ जोड़ कर बैठ गयी
करीब दस मिनट बाद हथेली खोली तो सिक्का गायब था और उसकी जगह पुरे पांच  सौ का करारा नोट चाची को दिखाया और चाची ने तुरंत नोट अपने हाथ में लेकर  नोट को हर तरफ से देखती हुई बोली " वाह प्रभू  आपने तो कमाल  कर दिया "
इतना कह कर चाची तो नोट लेकर अन्दर चली गईं और चाचा जमींन से उठ कर सोफे पर बाबा के सामने बैठ गए
अब बाबा ने रॉब में और चौड़े होकर बैठने के लिए जैसे ही पैर ऊपर सोफे पर रखा तो चाचा चीख कर बोले " ऐ  कलुए सोफे गन्दा करेगा क्या "
इस पर हैरान बाबा के पैर बही जम  गए और बाबा को सांप सूंघ गया
इस पर चाचा बोले " कल जब शराब का पौआ लिया था तब तो बड़ी लम्बी चौड़ी हांक रहा था और जब पैसे मांगे तो बहा से भाग गया
इतनी बात पर तो बाबा की जुबान से इतना ही निकल सका " तुम्हे कैसे .."
चाचा ने तुरंत कहा "वो मेरे भतीजे की दुकान है अगर आगे से इसे बाप का माल समझ कर भागने की कोशिश की तेरे सारे अड्डे मै  जानता  हूँ  बनके बिहारी मंदिर , भिरवी  द्वारा ..सब बंद हो जायेगा "
इतना सुनते ही बाबा हाथ जोड़ कर बोला " मेरे पांच सौ का नोट तो दे दो साहब आगे से कभी नहीं करूंगा "
" अब देख पांच सौ का नोट तो तू भूल ही जा क्यूंकि वो शीला के हाथ चला गया अब तक तो वो सोच भी चुकी होगी की इसका क्या खरीदना है " चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा
" साहब गरीब के पेट पर लात मत मरो बड़ी मुस्किल से मिला था एक पांच सौ का नोट " बाबा ने गिडगिडाते हुए कहा 
" मुझे पता है कैसे मिला है, पांच सौ का नोट कल ही श्रीवास्तव जी को चूना लगाया था उनकी साइकिल बेच दी ना" चाचा ने कहा
अब तो बाबा के मुह से शब्द नहीं फूट रहे थे
" अब चुप चाप निकल ले वर्ना अभी श्रीवास्तव जी को फ़ोन करता हूँ वो भी अपने पैसे निकाल लेंगे " चाचा ने दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए कहा
बाबा उर्फ़ कल्लू झोला उठाये सरक गया
चाचा के अन्दर घुसते ही चाची ने गले में हाथ डाल दिए  और बोली " वताओ आज चाय पिओगे या काफी "
चाचा हाथ छुडाते हुए बोले " देख ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं पौवे के पैसे भी देने है "
चाची ने तुरंत कहा " देखिये जी वो आप अपनी जेब से देना मै ये नहीं दूँगी "
" मुझे पता था तेरे हाथ से पैसे वापस लेने से तो यमराज से प्राण वापस लेना ज्यादा आसान है " चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा
और इस पर चाची भी मुस्कुराते हुए बोली " आप भी बम्बई क्योँ नहीं चले जाते, क्या अच्छी एक्टिंग करते हो "
चाचा ने प्यार से चाची का हाथ पकड़ कर कहा " तू भी कुछ कम नहीं है लेकिन जब मेरी हिरोइन यहाँ है तो मै बम्बई कैसे जा सकता हूँ "
ये कह कर चाची को किस कर लिया तो चाची शरमाते हुए रसोई में चली गई
 

Saturday, January 5, 2013

अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता


"राधा तुम्हे ठण्ड नहीं लग रही क्या, कल कर लेना, आओ यहाँ आग के पास बैठो  " तुलीराम ने छत से आँगन में झांककर कहा
राधा ने बर्तन धोते हुए ही कहा" मै न्यू इयर का स्वागत गंदे बर्तनॊ के साथ नहीं करना चाहती, इस साल का काम इसी साल ख़त्म करुँगी"
तुलीराम इतना सुनते आग को एक टक देखने लगा , सोचने लगा  कि इस साल ने क्या क्या नहीं दिखाया उन्हें, लगता है एक सदी बीत गयी हो, हर दिन कुछ न कुछ अनहोनी की ख़बरें मिलती रही आखिर साल ख़त्म हो ही गया
इतना सोच रहे था  कि राधा हाथ पोछ्ते हुए आई और बोली "आग को क्या घूर रहे हो सर्दी इतनी है तो आग भी कहाँ तक साथ देगी"
तुलीराम की चेतना लौटी तो देखा लकड़ियों में आग बची नहीं थी इसलिए बोला " मै तो कह ही रहा था की जल्दी आ जाओ वर्ना आग  बुझ जाएगी "
"कोई बात नहीं चलो बिस्तर में घुस जाते है" राधा ने हाथो को बची आंच को हाथ दिखाते कहा
तुलीराम ने भी हामी भरी और कमरे में चले गए राधा ने आग दरवाजे में ताला लगाया और लाइट बुझाते हुए कमरे में बद गई देखा तो तुलीराम कल के लिए कपड़ो को हुक पर टांग रहा था 
"लगता है कल और ज्यादा सर्दी होगी अपने लिए एक स्वेटर और निकल लीजिये" राधा ने बिस्तर ठीक करते हुए कहा
"आज तो बाहर हवा भी चल रही है " तुलीराम ने समर्थन में कहा
"मैंने तो सोचा था की इस साल की दिवाली अपने घर में मनाएँगे, पर माँ जी के कैंसर के इलाज ने  सब ख़त्म कर दिया " राधा ने रजाई के छोर को खीचते हुए कहा
" जब माँ ही ख़त्म हो गई तो क्या बचता" तुलीराम  ने उदास होते हुए कहा
राधा को सुनते ही जैसे झटका लग गया हो, "मै तो पहले ही कह रही थी की अब ये और नहीं जियेंगी घर ले चलिए पर पिता जी पर तो कुछ असर ही नहीं था, उनका बस चलता तो ..."
तुलीराम ने बीच में ही राधा को टोका " अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता राधा  "
आखिर तुलीराम को लगा अब ये नहीं मानेगी तो चादर ओड कर फिर बहार निकल आये और छत पर ही टहलने लगे ।
तुलीराम की आँखों में अब माँ का वो उदास और बीमार चेहरा घूम रहा था । वैसे तुलीराम के सामने वो कभी रोती नहीं थी पर एक बार हस्पताल में वो जब बोतल में पानी भर कर ला रहा था, तो देखा की पिता जी  उनके आंसू पोंछ रहे थे और वो बस उनका हाथ थाम कर हिम्मत जुटा रही थी । ये देख कर तुलीराम  भी लौट आया और सीधे डॉक्टर के कमरे में चला गया और उससे पूछा " माँ की तबियत सुधर क्यूँ नहीं रही, रोज इतनी तो दबाई दी जा रही है"
डॉक्टर ने तो तभी कह दिया "केस इतना बिगड़ गया है, चाहे कुछ किया जाये ये अब नहीं बच सकती, मेरी  राय  में तो इन्हें घर ले जा कर खूब  सेवा  करो"
तुलीराम को अभी तक खुद पर गुस्सा और तरस दोनों आ रहे थे की  माँ के लिए ही ये दुःख होना था।वो तो इतनी भगवान को याद करती थी , उन्होंने किसी का क्या बुरा किया था।
देर रात जब बापस आया तो राधा सो चुकी थी, वह भी जैसे तैसे आंखे बंद कर लेट गया, आखिर  कुछ देर बाद नींद आ ही  गयी ।
इस बात को और कुछ महीने बीत गए । वक़्त ऐसा मरहम है की चाहे कोई भी घाव लग जाये  वो भर ही देता है  । तुलीराम को भी माँ की याद अब राधा ही दिलाती जब वो अक्सर माँ के इलाज का खर्च गिनाती  पर  तुलीराम कलह बढाना नहीं चाहता था तो चुप हो  जाता या बाहर निकल जाता ।
एक दिन सुबह अखवार पढ़  रहा था  राधा ने चाय का प्याला हाथ में देते हुए कहा " कब तक हम यु ही मकान का किराया देते रहेंगे,  कोई घर नहीं तो प्लाट ही ले लो छोटा सा कमरा बनाकर गुजर कर लेंगे "
तुलीराम बोंला " देख तो रहा हूँ पर केवल पचास हज़ार ही हो पाये है "
राधा ने कहा " कोई बात नहीं तुम बात चलाओ, गहनों पर कुछ पैसे निकाल लेना, कुछ ऑफिस से हो जायेगा "
"ठीक है" तुलीराम  कुछ असमंजस से बोला ।
 ऑफिस की जल्दी में तुलीराम घर से निकल रहा था तभी राधा की चीख  सुनाई दी । वह तेजी से आंगन  की ओर बढा देखा तो कपड़ो की बाल्टी किनारे लुढकी है और राधा बेहोश है, उसने जल्दी से उसे उठाया और  एक रिक्शे पर बिठा कर हॉस्पिटल ले आया  । 
अब उसे डॉक्टर का इन्तजार था, डॉक्टर ने राधा की टांग देख कर कहा  टांग टूट गयी है ,जल्दी ही *-ऑपरेशन करना होगा आप चालीस हज़ार काउंटर पर जमा करा दें । हो सकता है की रॉड  डालनी पड़े  ।"
राधा इस समय दर्द से कराह रही थी तुलीराम ने  जल्दी से एटीएम पर जाकर पैसे निकाले और जमा करा दिए । ऑपरेशन  हो गया और राधा ठीक होने लगी ।
2 महीने बाद राधा ने दीवार के सहारे चलना शुरू कर दिया था  और तब तुलीराम ने कहा " क्या बात है आज तो कमाल कर दिया राधा"
राधा ने कहा "सब तुम्हारी वजह से हो पाया वरना मुझे तो लगा मै मर ही जाउंगी "
तुलीराम ने कहा "अब तुम ही तो मेरे लिए सबकुछ हो तुम्हे कुछ कैसे हो सकता है "
तुलीराम ने छेड़ने के अंदाज में कहा "तुम्हे तो  अभी नए घर में भी जाना है "
राधा का मुह उतर गया और बोली "अब कहाँ से आएंगे पैसे जो नया घर खरीदेंगे "
तुलीराम बोले " तुम ठीक हो गयी, अब फिर पैसे इकठ्ठे हो जाएँगे "
राधा बोली " तुमने इतना खर्च क्यों किया "
तुलीराम ने राधा को सीने से लगा कर कहा "अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता राधा"
राधा अब खुद को तुलीराम से बहुत छोटा महसूस कर रही थी और उसके पश्चाताप के आंसू  रोके नहीं रुक रहे थे ।




Thursday, December 27, 2012

"जिन्दा प्यार"

"पता नहीं कहाँ  मर गयी मेरे पेट में चूहे कब्बडी खेल रहे है, ये साली रोज ही देर लगाती है रोटी बनाती है कि पैदा करती है " हरिया ने बडबडाते हुए पसीना पोछा और एक बार फिर गाँव कि ओर देखा इस बार धीरे धीरे चलती हुई धनिया आती दिखाई दी तो कुछ आराम मिला ।
धनिया ने खाना और पानी रखा तो हरिया बोला "कहाँ रह गयी थी यहाँ जान निकल रही थी "
"आज जल्दी में तवे से पैर लग गया और छाला पड़ गया" धनिया ने आह भरते हुए कहा तो टीस हरिया के दिल तक जा पहुंची। इतना सुनते ही भूख प्यास तो हरिया की मर ही चुकी थी क्यूंकि दुनिया में धनिया ही तो इकलौती थी जो हरिया का जिंदगी का एकमात्र सहारा थी। 
"ला दिखा , कुछ लगा लिया था .....पता नहीं तेरा आज कल ध्यान कहा रहता है " खाना एक तरफ रखते हुए हरिया ने कहा ।
"कुछ देर पानी में रखा था तभी तो देर हो गई " धनिया ने पैर पर पड़ा छाला 
दिखाते हुए कहा ।
छाला मोटा पड़ गया था तो हरिया बोला "आज न आती मै भूखा मर थोड़े ही जाता "
ये वही हरिया था जो थोड़ी देर पहले भूख से कुलबुलाता धनिया को गाली दे रहा था मगर अब उसकी आंखे बता रहीं थी जली धनिया है पर जलन हरिया के दिल पर हो रही है। 
धनिया ने हरिया के मुँह पर हाथ रखा और बोली "आपको भूखा रख कर मैं तो मर जाती "
इतना सुनकर हरिया मुस्कुराना चाहता था पर उसका धनिया के लिए प्यार उसे रोक रहा था तो वो दिल ही दिल में उसके लिए आंसू बहा रहा था। 
इतने में उसका ध्यान धनिया की दूसरे पैर के पास गया जो वो मेड के दूसरी तरफ फैला कर बैठी थी और अनजाने में मेड को पैर  के अंगूठे से कुरेद रही थी और मेड का कुछ हिस्सा गिरने के कारण काली पूँछ दिखाई दे रही थी जिसे दखकर अंदाजा लगाया जा सकता था की अंदर उस सांप की मोटाई किसी की कलाई से काम नहीं होगी हरिया कुछ दनिया से कह पाता  तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्यूंकि मेड की काफी मिटटी  खोखल होने के कारन ढह  गई और सांप का असली चेहरा सामने आ गया लगता की अगर ये किसी को डस ले तो वो परलोक सिधारने में ज्यादा देर नहीं लगा पायेगा धनिया अभी भी हरिया पर बिना ध्यान दिए अपने छाले को सहला रही थी हरी या ने चीख कर धनिया से कहा " धनिया पैर  हटा "
धनिया कुछ समझ पाती उससे पहले ही नाग अपना फन  उठा चूका था पर धनिया को ये धयान न होने से अभी भी उसने छाले वाला पैर भी मेड की तरफ कर दिया उस नाग को नागवार गुजरा। 
हरिया ने ध्यान 
से उस नाग को झपटने की कोशिश की क्यूंकि उसे पता था अगर कुछ पल ही इन्तजार धनिया के आखरी पल बन जाते और उसने झट से उसे दबोच कर दूर डालने को ले गया पर छोड़ने के लिए जैसे ही हाथ ढीला किया नाग ने डस लिया और हरिया वही लेटता चला गया ।
अब धनिया दौड़ कर हरिया के पास गयी और उसने देखा क़ी हरिया क़ी साँस नहीं चल रही है तो नाग क़ी तरफ हाथ बढाकर बोली "मुझे भी डस ले, अब मैं भी जी के क्या करूंगी "
तब नाग बोला "अब प्यार निभाने क़ी बारी तेरी है अब तू भी मर गयी तो हरिया के मरने का क्या फायेदा कौन उसके प्यार को याद रखेगा "
"प्यार में मरना नहीं प्यार के बिना जीना ही प्यार को इस दुनिया में जिन्दा रखता है "