Friday, August 30, 2024

सुख की आस भाग -१

प्रमिला 29 साल की सुंदर सुशील घरेलू महिला है, जो गृहकार्य मे दक्ष है पर ज्यादातर घरेलू महिलाओ की तरह ही उपेक्षित जीवन गुजार रही है। उसका पति प्रमोद एक साधारण दिखने वाला पुरुष है। एक तो पहले ही कद काठी से कमजोर सा दिखता है और ऊपर से चेहरे पर चेंचक के दाग ने उसे कुंठा से भर दिया । जब उसकी शादी उसकी सरकारी नौकरी के कारण प्रमिला से हुई तब वह 28 और प्रमिला 17 की थी। दहेज में जो भी संभव था दिया गया, पर समय के साथ प्रमिला ने जैसे जैसे सुंदरता के परवान चढ़े, प्रमोद में हीन भावना और शक बढ़ते ही गए । एक तो प्रमिला ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं, वही प्रमोद बी टेक, प्रमिला ने जैसे जैसे चाहा कि मायके में सात बहनों के कारण जिस हालात में जी चुकी अब शादी के बाद तो खुश रहना उसका हक़ है, सो वो हर तरह से प्यार लुटाने लगी खाना रहना जीना सब प्रमोद के पसंद पर न्योछावर कर दिया, पर प्रमोद को लगा कि प्रमिला को आजादी मिली तो वो उसकी जो कुछ इज्जत करती है वो भी न चली जाए तो वो उसे कायदों में बांधने लगा और खुद तो परेशान रहने लगा साथ ही कायदे बढ़ाते बढ़ाते कब क़ायदे जेलर वाले हो गए पता ही नही चला। शादी के एक साल बाद निशु पैदा हुई तो लगा प्रमिला के हालात सुधरेंगे पर हुआ उल्टा और जिंदगी में जो भी उम्मीद थी वो खत्म हो गई।इसी उधेड़ बुन में कब बारह साल गुजर गए पता ही नही चला।

एक दिन निशु के स्कूल में खेल प्रतियोगिता थी, जिसमे माता पिता का आना अनिवार्य था तो मुझे जाना था । तो मैंने जब इनसे पूछा तो पहले तो मना कर दिया फिर निशु के स्कूल से फोन आने पर बोले मैं ऑफिस से आ रहा हूँ तैयार हो जाओ, ये सुनकर मैं चौंक गई आज किस्मत में आजादी का सूरज कैसे उगा । 

खैर साथ मे स्कूल बस में ही हम पहुंचे । धीरे धीरे सारा दिन कट गया और अब बापस जाने के लिए बस में आकर बैठ गई। मैं स्कूल बस में बैठी सोच ही रही थी की स्कूल ऐसा होता है क्योंकि मेरे मां बाप ने तो छोटी उम्र में हाथ पीले और जिंदगी काली कर दी, तभी एक स्टाफ मेंबर ने आकर पूछा" मैम यहाँ कोई बैठा है क्या" मैंने हां में सर हिला दिया जिस पर वो जाकर पिछली सीट पर बैठ गया । प्रोग्राम खत्म होने लगा तो अब और लोग भी आने लगे तो बार बार सीट खाली नही है बताना पड़ेगा ये सोच कर उनको आवाज लगाई "अंदर आ जाइये न" वो किसी और बच्ची के पिता से बात कर रहे थे । उन्होंने गुस्से से देखा और बेटी के स्कूल में खड़े हैं ये लिहाज कर अंदर आकर बैठ गए बीच में हमारी बेटी निशु आकर बैठ गई पर जब पीठ पर लटके बैग को आगे गोद मे रखकर आराम से बैठने को कहा तो मुझे बोली "नहीं मैं ऐसे ही बैठूंगी" मैंने सोचा जिद में अपने बाप पर गई है सोच कर बैठे रहने दिया बस से बाहर झांक कर देखा तो रंग बिरंगे कपड़ो में बच्चे बसों की ओर आ रहे थे, किसी के हाथ मे ट्रॉफी और किसी के हाथ मे सर्टिफिकेट थे और कुछ उदास थे क्योंकि वो खाली हाथ थे । उन उदास बच्चों को देख कर याद आया कि उन बच्चों को अगली बार जीतने की आस तो है पर मैं....

खैर अब जबकि बस मेन रोड पर आ चुकी थी तो ड्राइवर ने म्यूजिक प्लेयर की आवाज और बड़ा दी और मेरे होंटो पर मुस्कराहट फ़ैल गई सोचा घर पर तो म्यूजिक पर मेरे हाकिम साहिब का बैन है थोड़ा यहाँ ही सुन लूँ । तो थोड़ा आगे बढ़कर पीछे टिक गई और आंखे बंद कर खुली खिड़की से आती हवा में घुली आजादी महसूस करने लगी।

गाना भी क्या मेरा फ़ेवरेट लता जी की आवाज के घूंट कानों से पीने अब तो इतना मजा आने लगा मेरी उँगलियाँ थिरकने लगी।

'आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन

बिना ही बात मुस्कुराये रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन

ओ री कली, सजा तू डोली

ओ री लहर, पहना तू पायल

ओ री नदी, दिखा तू दर्पण

ओ री किरण, ओढा तू आँचल

इक जोगन है बनी आज दुल्हन

आओ उड़ जाए कही बनके पवन

आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन

शरारत करने को ललचाये रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन'

निशा का चेहरा आज बहुत खिला खिला था क्योंकि आज मेरी बेटी सोच रही थी उसके मां पापा उसका बैडमिंटन मैच देखने आये है पर मैं जानती थी की उनका मुझ पर अविश्वास और शक इतना ज्यादा हो गया है कि वो मुझे दरवाजे पर न जाने दे, यहाँ क्या आने देते। खैर कुछ भी आज का दिन था बड़ा अच्छा , निशु मैच जीत गई, खुली हवा में जी लिए और तो और लता जी का गाना भी सुन लिया बस और क्या चाहिए ।

चलो फिर, अपना जेल आ गया मतलब घर आ गया। निशु का बैग मैंने हाथ मे ले लिया और निशु ने उसमे से ट्रॉफी अपने हाथ मे ले ली जो वो अपने सभी पड़ोसियों को दिखाना चाहती, ये देख मुस्कुराते हुए मैंने उनकी तरफ देखा तो पाया वो मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रहे है पर क्यों, कुछ पल में ही याद आया कि बैग भारी था तो मैंने कंधे पर ले लिया जिससे मेरा सर पर का पल्लू नीचे ढलक गया था, बात समझ मे आते ही मैंने पल्लू सर पर किया और बैग हाथ मे लटका लिया ।

तब तक पड़ोस के सक्सेना जी और उनकी छोटी बेटी अपने दरवाजे की क्यारी में पानी दे रहे थे , तो उनको और निशु दोनों को ही अपनी खुशी बांटने के लिए एक एक साथी मिल गया, और मैं घर के अंदर आ गई।

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