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Thursday, May 27, 2021

नेकी का नेग भाग-1

कुंवर लाल सिंह, वैसे तो अपनी गली के सबसे धनिकों में से एक थे क्योंकि उनके मुताबिक "बीबी बच्चे का झमेला मात्र काँटों की गद्दी है जिस पर बैठ इंसान चाहे तो भी मुस्कुरा नही सकता बस दिखावा ही कर सकता है "| यही वजह थी कुंवर साहब ने अभी 44 सावन देखने के बाद भी गृहस्थ जीवन की लालसा नहीं की अब तो आलम ये था की बाल रंग लेने के बाद खुद को अक्सर लड़का समझने लगते थे | ऐसा नही की लोगों ने उन पर शादी के लिए दवाव नही डाला पर उन्होंने हिम्मत से अपनी पैरवी की और आखिर लोग मान गए ।

 फिर भी वक़्त जब गुजरता है तो वह कुछ देते हुए बहुत कुछ साथ ले जाता है । दिन में कुँवर साहब को अपने और शरणागतों के काम से फुरसत नही मिलती थी और रात में आधी रात तक अपने शौक से , अर्थात चित्रकारी । यह शौक शुरुआत से नही था पर अकेलेपन ने बहुत कुछ सिखा दिया था जिसमे से ये एक चित्रकारी थी । अब घर मे जब अकेले पुरुष हो तो सिर्फ एक ही चीज परेशान करती है वो है चूल्हा-चौका ।तो उनकी माता जी का निधन हुआ तभी उन्होंने सोच लिया था जीभ का चटोरापन तो है नही तो कभी थोड़ा कुछ बना कर जीवन जी ही लेंगे और वैसा ही अभी तक स्वयं को ढाल लिया था । 

माँ बाप के गुजरे अभी 2 साल बमुश्किल हुए थे पर घर का गुजारा करना मुश्किल होने लगा क्योंकि कभी काम धाम तो कुछ कभी किया नही जो पूंजी बाप दादा ने छोड़ी वो कुछ हद तक खत्म होने को आ गई थी।किसी ने सही कहा है अगर खाली बैठकर राजा भी खाए तो किसी दिन उसके हाथ भी खाली हो ही जाते है ।

परेशानी बड़ी थी सो कुंवर साहब ने इसके लिए कोई जुगत ढूंढने लगे पर चुपचाप क्योंकि भई किसी को पता चल जाता तो कुंवर साहब की बस इज्जत ही बची थी वो भी चली जाती ।

एक दिन कुंवर साहब अकेले बैठे बैठे ऊंघ रहे थे कि किसी ने बाहर से आवाज लगाई कुंवर साहब क्या घर मे है।

कुंवर साहब बोले "आते है भाई बैठक में बैठिये तब तक "

थोड़ी देर में कुंवर साहब बाहर आये तो सामने बैठे व्यक्ति ने कहा" साहब इस समय आपको परेशान किया इसके लिए माफी चाहता हु "

कुँवर साहब मुस्कुराते बोले " अरे परेशानी कैसी बताइये कैसे आना हुआ"

व्यक्ति ने बिनती के लहजे में कहा" बस साहब कुछ नही मेरे घर की पिछली दीवार ढह गई सो अब खुले में रहने को मजबूर हु अगर आप .."

कुंवर साहब कुछ समझते हुए बोले" इन दिनों मैं भी कुछ मुश्किल दौर से गुजर रहा हु पैसो की थोड़ी किल्लत है वरना आपकी जरूर मदद करता"

व्यक्ति गर्दन हिलाते बोला " अरे नही बात पैसो की नही है बात ये है कि मेरा समान खुले में पड़ा है बारिश के दिन आने वाले है और अभी तो मैं घर ठीक कराने लायक पैसे नही जोड़ पाया हूं इसलिए आया था ..कुछ तीन चार महीनों के लिए शरण मिल जाती तो बड़ा उपकार होता"

कुंवर साहब ने दिल मे सोचा अब तो हम खुद ही इतने बुरे दौर से गुजर रहे है अगर इन लोगो को पता चला तो रही सही इज्जत दाव पर है।

कुंवर साहब का आदतन अब मदद करने का जी भी कर रहा था पर घर के हालात खुल जाने का डर भी था तो सोचा कि कुछ महीने की तो बात है और नौकरो के कमरे तो कब से हम देख भी नही पाए कि कितने कबूतरों ने घर बना लिया ये सोचकर कुछ दिल मे ठान लिया और मुस्कुराते हुए व्यक्ति से बोले "देखो भाई अगर तुमने हमारे बाबा साहब (पिता जी) से ये कहा होता तो अब तक तुमको धक्के देकर भगा दिया होता मगर हमारा दिल किसी की परेशानी में .."

व्यक्ति कुंवर साहब के घुटनो पर दोनों हाथ रखते बोला "माई बाप है आप हमारे आपके मोम जैसे दिल की वजह से ही तो इतने फरियादियो का मेला लगा रहता है आप के दर से कोई खाली आज तक नही गया "

कुंवर साहब ऐसी बातें सुनकर इतने फूल कर कुप्पा हो गए की बोले " तुम बहुत अच्छे इंसान लगते हो इसलिए तुम उन आम के पेड़ के नीचे वाले कमरों में रहने लगो "

व्यक्ति बोला "आपकी बहुत बहुत मेहरबानी"

कुंवर साहब बोले"कौन कौन है तुम्हारे घर मे "

व्यक्ति बोला " मेरी बीबी तो बीमारी में गुजर गई और आप की दया से मेरे दो बच्चे एक विधवा बहन और माँ है "

कुंवर साहब ने कहा " कब से रहने आओगे "

व्यक्ति बोला "आपकी इज़ाज़त हो तो कल शाम तक सारा सामान ले आऊंगा"

कुंवर साहब बोले" ठीक है चाबी ले लेना आकर"

इतना सुनकर खुशी खुशी व्यक्ति चला गया ।

उसे जाते देख किसी की मदद करने का संतोष कुंवर साहब के चेहरे पर था पर सोच रहे थे इन लोगो को घर से दूर कैसे रखूं की इन्हें मेरे हालात पता न चले कुछ सोचना होगा ।

कुंवर साहब के दिमाग मे पूरे दिन अपनी शान खोने के डर की उहापोह में लगे रहे


Wednesday, May 26, 2021

कौन अपना कौन पराया भाग 1

पात्र 

सिम्मी : नायका

समीर : नायक

अर्पिता : समीर की प्रेमिका और सिम्मी की दोस्त

अमनजोत: सिम्मी की माँ

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बुलेट की आवाज ने पूरी गली दहला दी थी सुन कर सिम्मी ने दुकान के काउंटर से झांकते हुए देखा समीर जा रहा था।नीला कुर्ते से गठा शरीर उभर उभर कर बाहर आ रहा था । सिम्मी ने उसे कई बार अपनी दुकान पर ही देखा था कभी रोजमर्रा के सामान लेते कभी बस सिम्मी की माँ का हालचाल पूछते पर कभी बात करने की हिम्मत नही हुई पर हर बार उसे अगली गली के मुड़ने तक जरूर देखती थी। ऐसा ही उसने आज किया था पर आज उसे मां ने झांकते देख लिया और पूछ बैठी की कौन था पहले तो चौक गई फिर हल्के से बोली समीर आया था। मां के उत्तर से संतुष्टि जाहिर करने के अंदाज पर सिम्मी के जान में जान आई ।

सिम्मी सुलझी हुई 18 साल की लड़की थी जो अभी अभी बचपने से निकलना शुरू कर रही थी पर लड़कों से अच्छी खासी दूरी बना कर रखती थी क्योंकि उसके पिता उसकी माँ को ,जब वो पांच साल की थी तभी छोड़ गए थे ये उसके लिए सदमा था , इस बात के लिए वो हर लड़के हर मर्द को दोषी मानती थी पर ना जाने समीर में क्या बात थी वो स्कूल के दिनों से उसकी हर चीज़ का ध्यान रखने लगी पर समीर तक कोई बात नही पहुचने दी । अब वो स्कूल पूरा कर लेने से समीर से भी दूर हो गई थी जिसका उसे अफसोस अक्सर होने लगा था ।उसकी माँ के पास पैसे ना होने से न तो शादी और न पढ़ाई की बात आगे बढ़ पाई क्योंकि आमदनी का एक मात्र स्रोत थी छोटी सी किराने की दुकान ,जो इस पतली सी गली में इकलौती थी।

समीर सीधा साधा पर बड़ा ही हैंडसम जवान था कि हर लड़की उस पर मरे पर वो था कि अर्पिता की आंखों का दीवाना था दोष उसका भी नही था अर्पिता एक तीखे नाक नक्श की पर थोड़ी गहरे रंग की लड़की थी, बोले तो मानो फूल झड़ते हो आखिर अर्पिता को भी समीर से प्यार हो ही गया था और ये बात सिम्मी को अर्पिता ने ही बताई तो घर आकर वो बहुत रोई वो चाहत हार चुकी थी पर फिर भी कुछ भी मां को जाहिर नही होने दिया और स्कूल की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी तो अब घर पर ही कुछ न कुछ करती रहती थी। मां उसके घर रहने से कुछ आराम में आ गई थी क्योंकि वो अब हर घर का काम सिम्मी भरोसे छोड़ सकती थी।सिम्मी भी बस एक बार समीर को देख कर मन समझा लेती थी पर उदासी का रंग चेहरे पर चिपक कर रह गया था । माँ भी कुछ कुछ समझ गई थी पर क्या करती समीर एक अमीर बाप का लड़का था और वो उसके सामने किस हैसियत लायक थी वो जानती थी तो वो अनजान बने रहना ही ठीक समझती थी पर सिम्मी को समीर को देखने का मौका छीनती नही थी और वो प्यार छिनने का दर्द अपने दिल से लगाये थी तो अपनी इकलौती बेटी के आड़े नही आना चाहती थी पर कठोर बन कर दिखाती थी कोई बिन बाप की लड़की का गलत फायदा न उठा पाए ।समीर को वो काफी वक्त से जानती थी इसलिए अपनी बेटी की पसंद को पसंद करती थी पर दुख ये था कि कुछ किया भी नही जा सकता था।

आज सिम्मी कुछ खुश थी कि उसके जन्मदिन पर पहली बार समीर से कुछ बात हुई ,हुआ ये की समीर चाय की पत्ती लेने आया और माँ नहाने के लिए बाथरूम में थी तो उसे मजबूरन जाना पड़ा।

 सिम्मी को देख कर बोला "कैसी हो "

सिम्मी ने अपने दिल की खलबली को डिब्बे इधर उधर करने में छुपा लिया वार्ना उसका कलेजा मुह को आ रहा था ।

सिम्मी को व्यस्त देख समीर ने थोड़ी ऊंची आवाज में पूछा " कैसी हो "

अब सिम्मी को बोलना पड़ा"ठीक  "

समीर कुछ और पूछ पाता सिम्मी ने सवाल दागा"क्या चाहिए"

समीर बोला"मिलने तो आंटी से आया था पर अब चाय पत्ती दे दो"

सिम्मी का मन हुआ कह दे मुझसे बात कर लो पर मन मे रुक गई बात के साथ बोला "कितनी चाहिये"

समीर अपने फ़ोन में कुछ ढूंढता हुआ बोला" 100 ग्राम का पैकेट दे दो"

समीर ने फ़ोन से नज़र उठाई तो सिम्मी चाय का पैकेट हाथ मे पकड़े उसे ही देख रही थी 

समीर बोला "क्या देख रही हो"

सुनते ही सिम्मी दिवास्वप्न से जागी और बिना पैसे लिए अंदर भाग आई

 समीर को लगा कि रसोई में कुछ रखा होगा इसलिए अंदर भाग गई तो तेज आवाज में बोला "अरे पैसे काउंटर पर रखे है उठा लेना"

इधर सिम्मी की सांस अभी भी रुक नही रही थी जैसे दिल हलक में अटक गया हो ,

सिम्मी की माँ अब तक नहा कर बाहर आते है बोली " कौन था सिम्मी"

सिम्मी की आवाज नही निकली तो पास आकर बोली "क्या हुआ हांफ क्यों रही है "

सिम्मी ने बात बदलते हुए कहा "चूहा पैर... पर चढ़..."

और ये कहते रसोई में चली गई।

सिम्मी का आज तक का सबसे अच्छा जन्मदिन जा रहा था। उसने मा की पसंद का खाना बनाया और माँ ने भी बहुत तारीफ की इससे और खुश होकर वो चहकने लगी तो माँ को लगा उसके चेहरे से अब उदासी का बादल हटने लगा है , ये सोच कर वो भी आज सोचने लगी कि आज वो उससे कठोरता की कोई बात नही करेगी और इसी पर वो सिम्मी के सिर पर हाथ फेरते बोली" क्या गिफ्ट चाहिए तुझे"

सिम्मी उनकी ओर देख कर चौकते हुए बोली" तुम्हे याद था"

माँ बोली" जब मैंने पैदा किया है तो भूल कैसे जाती"

सिम्मी और चहक के बोली" तो मेरा गिफ्ट"

मा बोली " खुद ही पसंद कर खरीद लेना मेरी पसंद मेरी तरह खराब होगी" ना चाहते हुए आदतन बात एक ताने की तरह निकल गई।

सिम्मी समझ तो गई पर कुछ बोली नही और चुपचाप खाने लगी।

जब सूरज की तपिश कम हुई तो माँ ने आवाज लगाई "सिम्मी जल्दी आओ रिक्शा आ गया है बाजार चलना है "

सिम्मी हड़बड़ी में रिक्शे में बैठ गई तो माँ ने पुराने ढर्रे में बोला" ताला ठीक से लगाया"

सिम्मी को याद आया उसने ताला लगाया ही नही अगर मा को पता चला तो खैर नही तो रिक्शे से जल्दी से उतरी और बापस आ कर बैठ गई ।

मा बोली" ठीक से लगा था"

सिम्मी बोली" हॉ " और मा से उसकी गलती छुपी रही इसके लिए मुस्कुराने लगी, सोचने लगी वार्ना रास्ते भर के लिये एक टॉपिक मिल जाता।

आखिर उबड़ खाबड़ रोड से होता हुआ रिक्शा स्वर्ण चौक में रुक गया। मा ने बटुए से नोट निकाल कर रिक्शेवाले को दिया और आगे बढ़ गई ।

अब तक सिम्मी ये सोच ही रही थी कि माँ क्या ख़रीदवायेगी मा की आवाज आई" खड़ी क्या है, चल सामने वाली दुकान से झुमकी पसंद कर ले"

सिम्मी ने आव न देखा ताव जल्दी में एक लड़की से टकरा गई , उसने उसका गिरा हुआ बैग उठाते हुए माफी मांगने के लिए चेहरा देखा तो काला चश्मा लगाए अर्पिता सामने थी एक पल में कई विचार मानो कौंध गए कि ये इसे क्या हुआ जो छड़ी के सहारे की नौबत आ गई ।

सिम्मी कुछ पूछ पाती इससे पहले ही मा ने सिम्मी को डांटते हुए कहा "देखकर क्यों नही चलती ये नही देख सकती पर तू तो देख सकती है"

तो सिम्मी ने छड़ी अर्पिता को थमाते हुए कहा" अर्पिता ये कैसे और कब, ये क्या हो गया"

अर्पिता आवाज पहचानती हुए खुशी से बोली " सिममो तू तो स्कूल के बाद गायब ही हो गई तो मैने बाकी सब देखना भी बंद कर दिया " कह कर उससे लिपट गई और रोड पर भीड़ में खड़े होने के बाद भी वो दोनों सब कुछ भूल गए तो माँ ने याद दिलाया "अरे पगलियों ये भरत मिलाप रोड पर ही करोगी चलो सामने किनारे चलो वहाँ बात करना "कह कर वो भी मुस्कुराने लगी पर तभी पीछे से समीर की आवाज ने सभी को चौका दिया " अप्पू तू यहाँ क्या कर रही है तुझे तो अंदर रेस्तरां में बैठा कर .." अरे आंटी आप यहाँ "

माँ ने इस पर सिम्मी से फिर वही बात दोहराते हुए कहा " तुम और तुम्हारी अप्पू दोनो अजीब हो सब बातें सड़क पर ही कर डालोगे क्या"

"सॉरी  आंटी चलिए अंदर" कह कर समीर आंटी और अर्पिता का हाथ पकड़ कर अंदर रेस्तरां में ले जाने लगा इधर सिम्मी ने आते हुए आंसू थाम कर चलते चलते कनखियों को पोंछ कर पीछे पीछे चलने लगी साथ ही बहुत सारी बातें एक साथ दिमाग मे कौंधने लगी , मेरी इकलौती दोस्त का नसीब भी मेरी तरह खराब है, ये क्या हुआ, समीर कैसे इसे संभाल पायेगा ,इन लोगों ने अभी तक शादी की या नही, ...

ये सोचते सोचते रेस्टोरेंट में दाखिल हुए तो कोने एक सीट समीर की बुक थी तो वही दो सीट मंगवा ली अब 

समीर ने आंटी आप लोग आ रहे हो तो बताया नही वरना किसी और कम भीड़ वाले रेस्तरां में सीट बुक कर लेता ।

माँ ने बात को बदलते हुए कहा "अर्पिता तुम्हे अपने पति की बात माननी चाहिए अगर आज कुछ गलत .. कितनी भीड़ शहर में "

अर्पिता ने कुछ कहने को मुंह खोलने का सोच पर तभी समीर ने उसके हाथ को दबा दिया और खुद कहने लगा "आंटी अभी हमने शादी नही की क्योंकि अर्पिता खुद को इस हालत के साथ जीना सीखने के लिए वक़्त .."

समीर अपनी बात पूरी कर पाता उससे पहले ही अर्पिता बोली" क्यों री सिममो तेरा पहला बर्थ डे है जो मुह में दही जमाये बैठी है " 

समीर और माँ दोनो का ही ध्यान सिममी की ओर गया जो एक टक अर्पिता की चश्मे की तरफ बड़े उदास मन से देख रही थी ।

सिम्मी के चेहरे की उदासी को बिना देखे भी अर्पिता बड़ी आसानी से देख पा रही थी । आखिर बचपन की सहेली इतने दिन बाद मिली थी ।

सिम्मी कुछ कहती तब तक अर्पिता बोली" मुझे पता है तू मुझसे नाराज है पर मैं क्या करूँ पर इस काले चश्मे ने तेरे पास आने नही दिया कि तू इसी तरह आंसू बहायेगी और मैं अंधी उन्हें पोंछ भी नही पाउंगी"

सिम्मी ने इस बात पर खुद आंसू पी लेना ही उचित समझा और रुंधे गले से बोली "ये सब कैसे "

"तू मुझे छोड़ कर घर बैठ गई इसलिए मैंने सोचा जब तू नही दिखी और दुनिया देखकर क्या करूंगी" अर्पिता ने अपने चिरपरिचित मीठे अंदाज में कहा क्योंकि आज उसकी सहेली का जन्मदिन था जिस पर वो सिम्मी को और नही रुलाना चाहती थी।

सिम्मी ने कुछ और नही पूछा तो शांति तोड़ने का काम समीर ने किया और बोला "आंटी आपने सिम्मी को गिफ्ट दे दिया क्या "

सिम्मी की माँ ने कहा " वही दिलवाने तो जा रही थी तब तक तुम लोग मिल गए "

अर्पिता बोली " समीर मेरी तरफ से सिम्मी को कोई गिफ्ट दिला दो न प्लीज "

समीर बोला" ठीक है चलो उठो"

अर्पिता बोली" जैसे तैसे तो आंटी के पास बैठने का मौका मिला वो भी तुम छीनना चाहते हो तुम और सिम्मी चले जाओ"

सिम्मी ने मां की तरफ देखा तो माँ असमंजस में थी क्या कहती तभी अर्पिता ने फिर बोला" आंटी आप क्या गिफ्ट दिला रही थी सिममो को "

मां ने असमंजस की स्थिति से बाहर निकलते कहा "बेटा बस छोटे से झुमके दिलाने का सोचा था"

समीर का हाथ पकड़ कर अर्पिता ने झुकने का इशारा किया तो समीर भी कान अर्पिता के मुँह के पास ले आया।

और अर्पिता ने कुछ कहा तो समीर ने हाँ कह दिया।

और सिम्मी के तरफ देख कर समीर ने कहा" सिम्मी चले क्या "

सिम्मी ने फिर माँ का चेहरा देखा तो माँ ने कहा "ले ये पर्स ले जा "

सिम्मी समीर के साथ चली गई और ज्वेलर्स की दुकान में घुस गई और झुमके देखने लगी ।

इधर अर्पिता ने कहा "आंटी आप बड़ी मुश्किल से तो मिले हो यहाँ मेरे पास आकर बैठिये न "

सिम्मी की माँ ने अपने हाथ अर्पिता के पास रखे तो अर्पिता ने अपना सिर सिम्मी की माँ के कंधे पर रख लिया ।

सिम्मी की माँ भी अर्पिता के हाथ को हाथ मे लेकर सहलाने लगी ।

तभी अर्पिता ने कहा " आंटी मैं आपको माँ कह सकती हूं"

ये सुनकर सिम्मी की माँ की आंखों में आंसू भर आये और फिर बोली "क्यों नही बेटा जैसी सिम्मी वैसे ही तू है मेरे लिए "

अर्पिता बोली " सिममो ने मुझे कितनी बार आपके बारे में बताया पर कभी आपसे मिल न सकी आज आपसे मिलके लगा मुझे मेरी माँ मिल गई"

इतना कहते ही बिलख पड़ी और सिम्मी की माँ को कस कर चिपका लिया । इस पर सिम्मी की माँ भी रोते हुए उसके काले चश्मे को उतार कर आंसू पोछने लगती है ।

फिर सिम्मी की माँ प्यार से अर्पिता के गाल पर थपकी देते हुए कहती है"तू मुझसे मिलने नही आई और अपनी गलती पर मुझे रुला रही है"

इस पर अर्पिता ने खुद को संभाला और बोली " माँ आज तुमसे मिलकर मेरे दिल का बोझ हल्का हो गया "

सिम्मी की माँ बोली " ऐसा क्यों कह रही है "

अर्पिता ने बात बदलते हुए कहा" अच्छा बहुत हुआ रोना रुलाना एक बात बताइये सिम्मी के लिए कोई लड़का देखा "

सिम्मी की माँ इस सवाल से चौंक गई फिर अचरज से अर्पिता को देखकर बोली "तू क्यों पूछ रही है"

अर्पिता बोली" प्लीज बताइये ना, आपने मुझे अपनी बेटी कहा अब एक बेटी से दूसरी की बात छुपाना क्या सही है"

सिम्मी की माँ ने सामान्य होते हुए कहा" अरे कहा कोई लड़का ढूंढ पाई हूँ एक तो आज कल अच्छे लड़के मिलते कहा है और फिर हमारी गरीबी के कारण कुछ बात आगे नही बढ़ पाती"

अर्पिता मुस्कुराते हुए बोली" मेरी नज़र में एक लड़का है कहो तो बात चलाऊं"

सिम्मी की माँ की आंखे झपकना भूल गई फिर आश्चर्य से बोली " हा क्यों नही पर दान दहेज हम ज्यादा नही दे पाएंगे"

अर्पिता खिलखिलाते हुए बोली "आप लड़के को जानते हो और मैं उसके घरवालों को उसके घरवालों को बस लड़की चाहिए सुंदर घरेलू और संस्कारी "

सिम्मी की माँ ने कहा" अच्छा कौन है वो "

अर्पिता तपाक से बोली"समीर"

अब ये सुन कर तो सिम्मी की मां की बोलती बंद हो गई

अर्पिता ने फिर कहा " मैं जानती हूं कि सिममो समीर दोनों एक दूसरे से प्यार करते है  पर मेरी वजह से चुप है"

सिम्मी की माँ उसकी बातों को  बड़े ध्यान से सुन रही थी

अर्पिता आगे कहती है " मैं शुरू में यही समझी थी कि सिम्मी सिर्फ समीर को दोस्त के दोस्त की तरह ही समझती है पर कुछ दिन पहले जब मैं उसकी एक और दोस्त रंजना से मिली तो उसने बताया सिर्फ इस शक की वजह से की मैं समीर से प्यार करती हूं वो बीच मे से हट गई और मुझे कुछ बताने का मौका भी नही दिया "

बात तो अब सिम्मी की माँ को भी समझ मे आने लगी क्योंकि वो भी जानती थी सिम्मी समीर से प्यार करती है 

और सिम्मी ने खुद बताया था कि अर्पिता और समीर प्यार करते है और शादी करने वाले है।

सिम्मी की माँ ने आगे पूछा "तुम्हे समीर का कैसे पता चला कि वो तुमसे नही सिम्मी से प्यार करता है "

अर्पिता ने गहरी सांस लेकर बताया "जब मुझे सिम्मी के प्यार वाली बात समीर को बताई तो पहले तो वो मुकर गया पर जब मैंने कसम देकर उससे पूंछा तो बोला की हा उसे भी लगा था कि सिम्मी मुझे प्यार करती पर मैं तब तक तुम्हरे प्यार के लिए हां कह चुका था और अब तो मैं सिर्फ तुम्हारा हूं "

अर्पिता ने आगे कहा " मा मैं नही चाहती कि समीर मुझ अंधी के साथ भटके प्लीज मेरी इस काम मे मदद करो तो मैं..... " इतना कहते उसका गला भर गया और फिर सिम्मी मा का हाथ पकड़ कर रोने लगी।

सिम्मी की माँ को कुछ भी समझ नही आ रहा था कि वो क्या कहे और पर फिर भी वो अर्पिता के सिर पर हाथ फेर रही थी ।

तभी समीर और सिम्मी अंदर दाखिल हुए तब तक अर्पिता का रोना भी बंद हो गया था पर सिम्मी देखकर पहचान गई और बोली "अप्पू तुझे शर्म नही आती मेरे जन्मदिन पर तु रोये जा रही है इसलिए कुछ पूछ नही रही थी तेरी बात मान कर तेरा गिफ्ट खुद ले आई और तू है कि टसुए बहाए जा रही है "

अर्पिता खुद को संभालते हुए बोली " अरे बड़ी जल्दी खरीददारी हो गई क्या क्या लाई"

"वही जो तूने समीर को समझाकर भेजा था ..झुमकी" सिम्मी झुमकी अर्पिता के हाथ मे रखते हुए बोली 

अर्पिता बोली" चल अच्छा पहन कर तो दिखा मेरी न सही तो माँ की आंखों से देख लुंगी"

इस पर सिम्मी चौकते हुए बोली "कौन माँ"

अर्पिता सिम्मी के कंधे पर सिर रखकर बोली "ये माँ"

सिम्मी चिढ़ाने के लहजे में बोली "अरे वाह वाह मैंने थोड़ी देर माँ को क्या छोड़ा तूने डाका डाल दिया"

सिम्मी की माँ ने कहा " सिम्मी तो क्या हुआ अब मेरी दो बेटियां है "

सिम्मी ने हंसते हुए कहा" हमें तो पहले भी ताने ही मिले अब तो गाली खा खा कर जीना होगा" इस पर सभी हँसने लगे ।

माँ ने कहा" अप्पू, तो कब आओगी अपनी माँ से मिलने"

अर्पिता ने कहा" माँ से मिलने का कोई वक़्त थोड़े ही होता है, जब चाहूंगी आ जाऊंगी"

समीर के साथ नाश्ता कर चारो लोग बाहर रोड पर आ गये तो अर्पिता ने हाथ मे सिम्मी की माँ का हाथ हाथ मे लेकर कहा "मेरी बात पर गौर करना और इस सिम्मी को भी समझाना प्लीज माँ अब आपका ही सहारा है।

सिम्मी और माँ काफी देर तक अपने अपने खयालो में समीर और अप्पू को बाइक पर जाते देखते रहे।

जीवन-रेखा भाग 1

पात्र 

जीवन : नायक 

रेखा : नायका 

बैदेही : जीवन की ताई 

निराली देवी : रेखा  की माँ 

शेष पात्र आते जाते रहेंगे। 

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दोपहर का समय है। एक रेस्त्रां में प्रेमी युगल बैठकर बात कर रहे है। 

"क्या तुम मुझे सच में इतना प्यार करते हो जीवन " गिरते हुए आंसुओं के साथ रेखा ने जीवन के हाथ को अपने हाथ में ले लिया पर अगले ही पल नजर बचाते हुए हाथ छोड़ कर खिड़की से बाहर की ओर  देखना शुरू कर दिया |इन कुछ पल मे रेखा के चेहरे पर कई रंग  आये और चले गए  | 
" क्या हुआ, तुम्हे मेरे प्यार पर भरोसा नहीं है" जीवन ने गहरी निगाह के साथ रेखा के चेहरे से दिल को पढ़ने की नाकाम कोशिश की |
रेखा अब भी खिड़की के पार  ही देख रही थी | अब भी उसकी जुबान चुप थी पर आंसू बहुत से गम लिए गालों पर ढलकते हुए बहे जा रहे थे | पर जीवन भी क्या करता वो  रेखा के हालात से बिलकुल अनजान बहुत दूर से मिलने आया था | रेखा की निगाहों को देखने के लिए जीवन अपनी कुर्सी खिसका कर और करीब आया और रेखा के कंधे पर हाथ रखते हुए सवालिया निगाहों से रेखा की आँखे झाँकने की कोशिश की | पर अब जबकि रेखा बहुत असहज हो चुकी थी उसका गुबार उसे बेचैन कर रहा था और वो जीवन के कंधे पर सर रख कर बहुत रोना चाहती थी पर ... इस रेस्त्रां का लिहाज करना पड़ा और एक बार गौर से जीवन के चेहरे पर नजर डाली जैसे की वो उसे आखरी बार देख रही हो और तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ गई, पीछे पीछे जीवन ने रेखा-रेखा नाम की कई आवाज दी पर वह नहीं रुकी और  सीधे रिक्शा में बैठ गई, रिक्शे वाले को चलने का इशारा किया |

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रेखा और जीवन की मुलाकात कोई ज्यादा पुरानी नहीं थी पर दोनों जब बातें करते थे तो कोई ये नहीं बता सकता था कि वो अभी एक महीने पहले ही मिले होंगे |
हुआ कुछ यूँ कि कोई चार हफ्ते पहले सीढ़ियों पर फिसलने से रेखा की एड़ी का फैक्चर हो गया और हालत इतनी ख़राब हुई की रेखा हॉस्पिटल पहुँच गई|
रेखा का उसकी माँ के सिवा कोई नहीं था, तो दोनों माँ बेटी हस्पताल के जनरल वार्ड में पहुँच गए | आज पहले ही दिन मुरझाई हुई रेखा को हस्पताल का बिस्तर काँटों की चादर नजर आ रहा था और वह आँखे बंद किये माँ का इन्तजार कर रही थी हस्पताल में आने जाने वालों की पैरों की आवाज नींद के पहलू में जाने रोक रही थी कि तभी लगा जैसे कोई उसके बैड के पाइप  को पकडे है , रेखा ने झट से बिना करवट लिए देखने की कोशिश की और देखा तो  चेक की  शर्ट पहने एक 17 -18  साल का लड़का खड़ा है | अभी वह उसका चेहरा नहीं देख सकी थी | तब तक माँ आ गई जो जरूरत का समान लाने घर गई थी ये देख कर रेखा ने आँखों पर से हाथ हटा लिया और पूछा "  क्या हुआ माँ बड़ी थकी लग रही हो "
माँ ने हाँफते हुए कहा, "  अरे नहीं बस रस्ते में भीड़ बहुत थी "
"तूने अभी तक ये बिस्किट खाये नहीं " पैकिट दिखाते हुए रेखा को नाराजगी से माँ ने  देखा ,
ये कह कर टिफिन से आलू के पराठे निकाले और रेखा की ओर प्लेट रख दी |
"क्या माँ तुम तो जरा जरा सी बात पर" रेखा ने कहा.
"ये जरा सी बात है शाम के पांच बज गए और अभी तक तूने कुछ भी नहीं खाया " माँ ने पानी की बोतल खोली और गिलास में पानी निकाल कर पीने लगी |
"क्या करूं तुम्हारे इन्तजार में पता ही नहीं चला पांच बज गए " माँ को मनाने के अंदाज में रेखा ने कहा,
" चल ठीक है अब तो खा ले " मा ने फिर प्लेट को आगे बढा कर रख दिया
रेखा ने प्लेट से एक कौर उठाया और माँ को देते हुए कहा " लो तुम भी तो खाओ अभी हफ्ते भर सेवा करनी है "
ये सुन कर माँ का गुस्सा फुर्र हो गया और मुस्कुराने लगी |

रात के ग्यारह बज गए थे और रेखा की आँखों में अभी भी नींद नहीं थी, और माँ बेंच पर लेट कर आँखे बंद किये थी शायद सो भी गई हो .
तभी नजर घुमा कर वार्ड के और बेड देखे , सब के सब भरे हुए थे और  तभी उसकी नजर अपने बराबर वाले बेड पर पड़ी जिस पर वो चेक की शर्ट वाला लड़का जो सुबह दिखा था , उम्रदराज महिला के पैर दबा रहा था ,
और इतने में उसने भी देख लिया कि रेखा उसे देख रही है , रेखा ने हड़बड़ा कर नजर बचा ली अब और कुछ देखने की हिम्मत नहीं हुई तो आँखे बंद कर सोने की कोशिश की जो सफल भी हो गई |
सुबह करीब पांच बजे से ही चहलकदमी शुरू हो गई तो रेखा की आँख खुल गई माँ की तरफ देखा तो वो नहीं थी ,सोचा बाथरूम गई होंगी फिर पास वाले बेड की तरफ देखा तो वो चेक शर्ट वाला लड़का महिला के पैरों पर सर रखे ही सो गया था शायद देर रात तक पैर दबाता रहा होगा |

अब रेखा को माँ सहारा देकर बाथरूम लेकर गई और फ्रेश होकर रेखा बापस आ रही थी की तभी  पतले गलियारे से गुजरते हुए किसी से उसका कन्धा लग गया तो वो इस बात पर बिना देखे बिफर पड़ी और बोली " लोगो को अस्पताल में भी चलना नहीं आता बस मुंह उठाये जानवर की तरह दौड़ लगा दी |" इतना कह कर माँ ने उसको चुप रहने का इशारा किया तो चुप तो हो गई पर गुस्सा शांत नहीं हुआ और ऐसे ही धीरे धीरे चलकर बैड तक पहुँच कर बैठ गई  | 

मूड तो रेखा का पहले ही अस्पताल के शोर ने ख़राब कर दिया था जो ठीक से नींद नहीं आई और ऊपर से सुबह ही सुबह ये सब  | माँ ने चाय देते हुए कहा " क्या हुआ इतनी सी बात से मुँह सिकोड़ लिया यहाँ कोई भी मजे के लिए नहीं आया सब को यहाँ से जाने की जल्दी है "

तब तक पास वाले बैड पर एक वार्डबॉय ने लेटी महिला से पुछा " क्यों ताई कैसा हाल है ये जीवन इतनी हड़बड़ी में कहाँ गया "

" अरे कुछ नहीं ये उसका रोज का है मैंने जरा सा मजाक क्या दिया की तू तो  पैरो में लेटे ऐसे सो रहा है जैसे मैं मर गई हूँ , तो तुनक कर भाग गया " माँ ने मुस्कुराते हुए वार्डबॉय को देखकर कहा  |

"हा हा हा अभी भी बच्चा ही है ये, जब साथ पढ़ता था तब भी इसको मनाना पड़ता था " बार्डबॉय ने चाय का कप महिला की ओर बढ़ाया और कहा " मैं  समझाता हु उसे आप चाय पियो तब तक " 

ये कह कर जा ही रहा था की जीवन लौट आया  | लगता था जैसे रो कर आया है पर बार्ड बॉय को वहां देख कर पूछने लगा " क्या हुआ यहाँ "

बार्डबॉय बोला " तुझे दौड़ कर जाते देखा तो लगा जैसे कुछ गड़बड़ है इसलिए ताई से मिलने आ गया....और यहाँ तो पता लगा जीवन अपनी ताई को अकेला इस हाल में छोड़ कर भाग गए हा हा हा "

जीवन बात का मतलब समझते हुए उससे नजर बचाते  हुए दवाइओं में से सुबह खाली पेट लेने वाली दवाई

को ताई  को देते हुए बोला " कुछ नहीं यार बस मुँह धोने गया था " 

  इस पर बार्डबॉय उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला " यार जीवन ताई ने मुझे सब बता दिया तेरा बचपना कब जायेगा "

जीवन ने महिला की तरफ देखते हुए चेहरा सख्त हो गया और बार्डबॉय से बोला " मेरा ताई के अलावा इस दुनिया में है ही कौन और ये भी ऐसी बातें कर के मेरा खून जलाती है कभी कभी तो लगता है कि  कही जा के मर ... "

इतना कहते कहते पलकों पर दो आंसू के मोती आ गए जो जीवन चेहरा पीछे करके पोंछ कर खुद को संयत करने लगा।          

 माहौल को ठीक करने को मुस्कुराते हुए बार्डबॉय बोला " यार जीवन तूने कसम खा रखी है की तू रूठे और हम तुझे मनाये ताई ने तो सिर्फ मजाक किया था "

जीवन भी खुद को सामान्य करते हुए मुस्कुराने लगा  और बोला " चल ठीक है, अच्छा ये डॉक्टर कितने बजे आएँगी आज "

वार्डबॉय बोला " मै चलता हु थोड़ी देर में पूँछ कर बता दूंगा "

रेखा और उसकी माँ अभी भी उस तरफ ही देख कर कुछ समझने की कोशिश कर रही थी की तभी उस ताई ने रेखा की माँ से मुखातिब होकर कहा " बहनजी ये लड़का शरीर से बड़ा हो गया है पर दिमाग से बच्चे का बच्चा ही रह गया इसे कौन समझाए की जो आया है उसे तो एक दिन जाना ही है  "

रेखा की माँ ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा " नहीं बहन जी हम जिन्हे प्यार करते है उनके दूर जाने की बात से डर जाते है..., मुझे तो लगता आपसे ये लड़का बहुत प्यार करता है  "

"हां शायद सही कहा आपने उस बेचारे को कभी माँ  बाप का साया भी नसीब नहीं हुआ मेरे इन्ही हाथों में पला है और अब मेरे भी शरीर में दम नहीं की इसका कुछ ख्याल रख सकूँ " कहते कहते उदास होकर महिला ने पुरानी यादों को मन में कुरेदना शुरू कर दिया और यादों में खो गई। 

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जीवन एक सुलझा हुआ लेकिन किस्मत का मारा लड़का है । पैदा होते ही माँ बाप दोनों का स्वर्गवास एक बीमारी से हो गया फिर जीवन का घर कर्जे में चला गया अब सिर्फ खेत ही थे जो व्यक्ति उन्हें जोत रहा था वो उसे अपने घर ले गया करीब पंद्रह दिन बाद एक आदमी आया जो जीवन के पिता के बारे में पूछ रहा था तो गांव वालों ने उससे  उसके बारे में पुछा तो वो बोला मैं जीवन का ताऊ हु पर मैं बहुत ही दूर था इसलिए आ न सका अब मुझे जीवन के परिवार के बारे में बताओ। गांव वालों ने सब कुछ बता दिया तो वो कहने लगा मैं जीवन से मिलना चाहता हु तो उसे जीवन से मिलवा दिया गया तो वो बोला मैं इसे अपने साथ ले जाना चाहता हु मेरे भाई  निशानी को अब मै पालूंगा और बड़ा आदमी बनाऊंगा। कुछ लोगों को लगा ये सही कह रहा इस बच्चे को कोई अपना मिल जायेगा तो फिर उसके सींग उगने शुरू हुए और उसने पुछा की  घर खेत और घर के सामान का क्या हुआ वो भी उसे चाहिए तो गांव के प्रधान को शक हो गया तो भी उसने कहा "ये घर तो कर्जे की भेंट चढ़ गया और घर में सामान के नाम पर सिर्फ कुछ चम्मच कटोरी है बस खेत बचे है जो गांव का ही एक आदमी जोत रहा है"

 जीवन का ताऊ बोला मै सब कुछ बेंच कर इसे ले जाना चाहूंगा तो प्रधान ने उसे कहा "देखो भाई मै उस मासूम के जीवन की खातिर अभी तो कुछ बेंचने नहीं दूंगा पर हाँ अगर इसके समझदार होने तक पाल सको तो मै खुद ही खेत खरीद लूँगा "

अब तो जीवन के ताऊ का मुँह उतर गया पर तभी जीवन के खेत जोतने वाला बोला "प्रधान जी मुझे लगता ये सज्जन कुछ परेशान लगते  है" इतने में वहां का थानेदार आ गया बोला "क्या बात है प्रधान जी क्या हुआ यहाँ भीड़ कैसी है "

तो प्रधान ने सारी बात थानेदार को बताई तो थानेदार ने भी जरा कड़ककर कहा "हां भाई ले जाओ इस बच्चे को पर हर महीने इसे दिखाने  लाना होगा वार्ना तुम तो सब बेंच बांच के बच्चे को फ़ेंक के  गायब हो जाओगे।"

  इतना सुनते ही जीवन के ताऊ के  हाथ पैर  फूल गए क्यूंकि एक दिन पहले ही तो वो जेल से छूटा था और पता चला की उसका भाई मर गया अब जायदाद को बेंच कर कुछ दारू का इंतजाम करने का सोच कर आया था तो यहा तो दांव उल्टा पड़ गया। 

आखिरकार उसने कहा "मै  मेहनत  मजदूरी वाला आदमी इस बच्चे को कैसे पाल पाउँगा अगर कुछ मदद नहीं मिली तो"

बात प्रधान को जच गई तो बोला "ठीक है तो ऐसा करते है की इसके खेतों की कीमत 18 हिस्से कर देते है और हर साल इसके जन्मदिन  पर मै खुद आकर तुम्हे दे जाया करूँगा अब ठीक है"

सुनकर जीवन का ताऊ कुछ सोच रहा था तब तक थानेदार बोला "चलो उठो जीवन को लेकर मेरी गाड़ी में बैठो" इतना सुनकर जीवन का ताऊ सहम कर कुछ बोल न सका और जाने लगा तो प्रधान ने कहा "ये लो तुम्हारी पहली क़िस्त इसमें डेढ़ लाख रूपए है और जीवन को देखने मैं आता रहूँगा पता मुझे दे जाओ"

 अब तो जीवन का ताऊ क्या करता पता देकर गाड़ी में बैठ कर किस्मत को रोने लगा पर सोचा कोई बात नहीं ये डेढ़ लाख भी कोई कम रकम नहीं है।  

कुछ देर में ही घर  पहुँच कर थानेदार से बोला आइये घर में चलिए थानेदार से अपनी पत्नी को मिलवाया पत्नी ने   सोचा फिर कोई झमेला कर आया जो पुलिस के साथ में है

 जीवन का ताऊ बोला  " कुछ चाय पानी लेंगे साहब "

थानेदार बोला " नहीं , यहाँ कौन कौन रहता है "

जीवन का ताऊ बोला " बस मै  और मेरी बीबी "

" और तुम काम क्या करते हो " थानेदार ने घर देखते हुए कहा 

जीवन की ताई गुस्से में तपाक  से बोली " कुछ नहीं बस दारू झगड़ा और जेल "

इतना सुनते ही थानेदार चौंका इधर जीवन का ताऊ जीवन को खाट पर लिटा कर आया और ताई  के गाल पर एक थप्पड़ रसीद दिया 

ये देखते ही थानेदार का जोरदार चाटा लगा ताऊ को कि बत्तीसी हिल गई और थानेदार ने पिस्तौल निकाल कर ताऊ के कनपटी पर लगा दी और बोला " अगर आज के बाद मैंने ये हाथ किसी औरत या बच्चे पर चलता देखा तो तेरा भेजा उडा दूंगा चल भाग यहाँ से  और ये पैसे इधर ला "

तब तक जीवन जो इस धमाचौकड़ी से जाग गया और रोने लगा। ताई  से रुका नहीं गया और जीवन को उठा कर चुपाने लगी। जीवन कुछ देर में फिर सो गया। 

तब थानेदार ने ताई  को गांव की पूरी बात बताई तो उनकी आँखों में आंसू आ गए और माथे पर चूमती हुई जीवन का चेहरा निहारने लगी और बोली " बिलकुल अपनी माँ पर गया है "

थानेदार ने कहा " देखिये अब इसका कोई नहीं है आपको ही इसे पालना होगा "

ताई बोली " जब तक मै  जिन्दा हु इसके प्यार में कोई कमी नहीं रहने दूंगी वैसे भी इसी ने तो मेरी सूनी गोद भर दी वार्ना तो मैं किसके लिए जी रही थी मुझे खुद नहीं पता "

थानेदार बोला " जब तुम्हारा आदमी जेल चला जाता है तो घर कैसे चलाती हो "

ताई ने कहा " पेट भरने को कुछ घरों में चूल्हा चौका कर लेती हु "

थानेदार बोला " अब ये सब करने की जरूरत नहीं लो ये डेढ़  लाख रुपए है जीवन के खेत की कीमत का हिस्सा है अगले 18 साल तक ऐसे ही मिलते रहेंगे "

ताई ने कहा " अगर ये पैसे ले भी लिए तो वो दुष्ट मुझसे छीन  कर ले जाएगा और दारु में उडा देगा "

थानेदार ने  सोचते हुए कहा " ठीक है तो तुम एक किराने की दुकान खोल लो इस तरह कुछ कमा भी पाओगी और  जीवन का ख्याल भी रख पाओगी "

ताई को लगा बात  तो सही है पर कुछ सोचते हुए बोली " पर मै तो दुकान के बारे में जानती नहीं फिर .."

"मै किसी को भेज दूंगा जो तुम्हे बता देगा कहा से सामान खरीदना है "थानेदार ने कहा और ये मेरा मोबाइल नंबर रखो कभी कोई जरूरत हो तो फोन  कर लेना और हाँ ये 5000 रखो कुछ कपडे इसके और एक छोटा मोबाइल  ले लेना बाकी पैसे जरूरत पर मेरे घर से ले लिया करना अब चलो तुम्हे मै घर दिखा देता हु "

ताई को जैसे बिन मांगी मुराद मिल गई हो। ताई को जीवन का मासूम चेहरा देखकर फिर आंसू  आए और उसे  प्यार से चूमते हुए बोली " ये जीवन क्या आया मुझे फिर से नया जीवन मिल गया "

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इधर वर्तमान में जीवन माँ के लिए खाना लेकर आया था और प्लेट में परोस कर ताई को दे रहा था  ताई तो जैसे पुरानी  यादों की धूप छाव में ऐसी बैठी थी की सुन नहीं रही थी तो जीवन ने ताई पर हाथ रख कर हिलाया तो उसे देख कर मुस्कुरा उठी और जीवन के चेहरे पर प्यार से हाथ फेरती बोली " तू  नहीं होता तो मै किसके लिए जीती "

जीवन भी मुस्कुरा उठा और बोला " अरे ताई  ये बोल की तुम नहीं होती तो मै  भी  कहाँ होता "

ये कहते हुए प्लेट ताई के हाथ में दे दी और खुद सेब छीलने लगा इतने में डॉक्टर भी कमरे में  तो जीवन पीछे हट गया और डाक्टर नंदिनी की प्यारी आवाज से ताई मुस्कुरा दी 

डाक्टर ने नब्ज देखते बोला " और बताइये आंटी कैसे हाल है अब रात बुखार तो नहीं आया "

ताई तो जैसे उसके इन्तजार में ही थी बोली " बेटा बस अब मै ठीक हो गई अब इन दवाइयों को मत देना मुझे इन से उलटी आती है "

डॉक्टर मुस्कुराई और बोली " ठीक है आंटी दवाई नहीं तो इंजेक्सन ही सही शऱीर में दवा तो पहुचानी पड़ेगी "

ताई  इंजेक्सन की बात सुन कर घबड़ाते हुए बोली " अब तू कहती है तो मै दवाई ही खा लुंगी "

ये सुनकर सभी मुस्कुराने लगे और डॉक्टर अगली बैड पर रेखा को देखने पहुंची और बोली " अपने पैर की उँगलियाँ चलाओ "

रेखा ने कसमसाते हुए उँगलियाँ चलाई तो डॉक्टर बोली " ठीक है दर्द ज्यादा तो नहीं "

रेखा ने कहा "नहीं पर ..."

डॉक्टर बोली " पर क्या "

बीच में रेखा की माँ ने कहा " बस दिन भर नींद आती रहती है दवाई से  इसको "

डॉक्टर वार्ड बॉय को इशारे से परचा दिखाती हुई बोली " वो कल दर्द ज्यादा था इसलिए ये गोली दी थी अब दर्द काम हो गया तो इसकी कोई जरुरत ही नहीं "

ये कहते डॉक्टर आगे बढ़ गई। 

फिर माँ ने रेखा से कहा " मै घर होकर आती हु तू आराम कर "

रेखा ने कहा " अब तो आराम ही आराम है पर तुम जल्दी आना "

रेखा फिर लेटे बोर होने लगी अब तो नींद भी नहीं आ रही थी तो  इधर उधर देखने लगी और नज़र फिर  जीवन पर चली गई 

देखा  तो वो सेब  छील चुका था और  काट कर कटोरी में रख रहा था 

जीवन फिर ताई को सेब देकर बाहर चला गया और कुछ  बाद एक बिस्किट और एक न्यूज़ पेपर लेकर लौटा और तब तक रेखा अपने ही गुमसुम सर पर हाथ रखे लेटी  थी। 

रेखा के पास वाली बेंच पर बैठ गया और कुछ बोलने जा ही रहा था की रेखा हाथ हटा कर उसे घूर कर देखने लगी 

वो घबड़ाते हुए रेखा से बोला  " मुझे माफ़ कर दीजिये "

रेखा ने चौंकते हुए फिर देखा तो जीवन बोला " सुबह मैं आपसे टकरा गया था इसलिए "

रेखा ने कहा " ठीक है कोई बात नही "

जीवन ने फिर कुछ सोचते हुए कहा "तो आपने मुझे माफ़ कर दिया "

रेखा अभी भी बात खत्म करने की जल्दी में बोली" हा कर दिया"

तो जीवन ने बिस्किट का पैकेट बढ़ाते हुए मुस्कुराते हुए कहा " तो इसी बात पर मीठा हो जाये"

रेखा मुस्कुराना चाहती थी पर वैसे ही सख्ती से बोली "नही मुझे नही चाहिए "

जीवन बोला "तो लगता है आपने माफ नही किया "

रेखा को अब गुस्सा आने लगा और बोली" देखिए मुझे ये नही चाहिए और आप जाइये "

जीवन अब समझ गया और अखबार और बिस्किट रखते हुए बोला " देखिए मैं कोई आपको परेशान करने नही आया बस आपको परेशान होते देख आया हु यहाँ अस्पताल में वक़्त कटता नहीं काटना पड़ता है इसलिए ये अखबार और ये बिस्किट रख रहा हु बाकी आपकी मर्जी"

और उदास मन से अपनी बेंच पर जाकर बैठ गया और एक डायरी में कुछ लिखने लगा।

रेखा को समझ नही आ रहा था कि क्या करे तो वैसे ही लेटी रही और कुछ देर के बाद उसको लगा जैसे चक्कर आ रहा है और उल्टी सी आने लगी ।

जैसे ही जीवन को ये आभास हुआ तो वो जल्दी से आया और कूड़ेदान को बैड के नीचे से बाहर की तरफ सरका दिया जिससे वो उल्टी उसी में कर पाई और एक दो बार मे ही उसे लगा अब कुछ ठीक लग रहा है तो जीवन ने उसे पानी दिया और कूड़ेदान को अंदर सरकाकर बाहर चला गया और एक गोली लाया और रेखा को दी और बोला इसे खा लीजिये आराम मिल जाएगा ।

रेखा ने गोली ले कर खा ली फिर वैसे ही सिर पर हाथ रख कर लेट गई।

थोड़ीदेर में जीवन फिर पूछने आया "अब दोबारा तो नही आ रही "

रेखा ने सिर को ना में हिलाया

जीवन ने कहा" पेट मे जो था वो तो निकल गया अब दवाई खाने से पहले बिस्किट खा लेना "

पता नही क्यों पर रेखा कुछ देर तक जीवन को जाते हुए देखती रही फिर मुस्कुराने लगी

जीवन बापस आया तो देखा रेखा एक करबट से लेटे लेटे अखबार के पन्ने पलट कर देख रही है तो जीवन ये देखकर मुस्कुरा उठा और रेखा की नजर पड़ते ही वो झेप गई और अपने मुंह अखबार के पीछे छुपा लिया ।

जीवन अब ताई को जगाया और बोला "ताई उठो ये दवाई खा लो फिर सो जाना "

ताई ने दवाई खाई और फिर लेट गई।

अब जीवन बैठ कर फिर डायरी में कुछ लिखने लगा तब तक रेखा की माँ आ गई ।

और रेखा से बोली " दर्द तो नही हो रहा अब"

रेखा ने अखबार किनारे करते बोला" मिल गई फुरसत आज आपकी लड़की तो गुजर ही गई थी "

रेखा की माँ ने चौकते हुए कहा " क्यों क्या हुआ "

"मुझे चक्कर और फिर उल्टी आई थी लगा जैसे मैं मर ही जाउंगी" रेखा कह कर मा का चेहरा ध्यान से देखने लगी जिस पर बेटी के लिए चिंता की रेखाएं आ गई थी 

माँ बोली " फिर "

रेखा धीमे स्वर में बोली " फिर उन्होंने मुझे पानी दिया और एक गोली लेकर दी तब जाकर कुछ चक्कर कम हुए "

रेखा के उन्होंने के इशारे को देखकर कर मा ने रेखा के साथ पीछे मुड़ कर देखा तो जीवन अभी भी कुछ डायरी में लिख रहा था ।

माँ ने रेखा से कहा " जरूर इन दवाइयों से गर्मी हो गई हो गई ये तो अच्छा है कि आज खाना भी मैं सादा ही लाई हु चल हाथ धो कर खा ले"

रेखा ने कहा" ठीक है °

रेखा ने  खाना खाते हुए एक दो बार जीवन को देखा तो वो उसे खाते देख मुस्कुरा रहा था तो फिर रेखा ने भी मुस्कुरा कर देखा और खाना खाने लगी

अब जीवन रेखा की तरफ आया और रेखा की माँ से बोला "आंटी आज रात के खाने को थोड़ा हल्का ही रखियेगा नर्स बोल रही थी जिससे इसके लिए गोली लेने गया था"

रेखा की माँ ने जीवन की तरफ देखकर कहा " हाँ बेटा ध्यान रखूंगी पर जो तुमने किया उसके लिए बहुत शुक्रिया "

जीवन मुस्कुराते हुए बोला " मुझे शुक्रिया नही माफी दिला दीजिये सुबह जानवरो की तरह टकरा जाने के लिए "

रेखा ये बात सुनकर झेंप जाती  है

रेखा की माँ ने रेखा को देखते हुए बोली " बेटा अब तो माफ करदे "

तो रेखा बोली "मैंने इन्हें पहले ही माफ कर दिया"

"इस जीवन का जीवन सफल हो गया " कहते कहते खिलखिलाने लगा तो रेखा और उसकी माँ भी हँसने लगी ।

इस हसी को सुनकर अभी नींद से उठी ताई को समझ नही आया तो बोली "जीवन क्या हुआ"

जीवन बोला"अरे ताई आप चूक गए अभी यहां प्रभु साक्षात आये और बोले बच्चा तुझे माफ किया"

ताई अभी भी असमंजस में बोली " किस लिए "

जीवन बोला" सुबह मेरी अच्छी ताई को अकेला छोड़कर जाने के लिए"

ताई अब उसकी मजाक को समझ कर मुस्कुराने लगी जीवन आगे कहने लगा " ताई वो कह रहे थे तुम्हारी ताई अब सौ साल और जियेंगी, यकीन ना  आये तो इन मौसी से पूछ लो।"

ताई ये सुन कर जीवन से साथ खिलखिलाने लगी और उधर अपने लिए मौसी सुनकर रेखा की माँ भी भावना से भर गई ।

रेखा की माँ बोली " हा बहन जी जीवन सच कह रहा है "

रेखा को अभी भी यकीन नही हो रहा था कि उसकी माँ एक अनजान की बातों पर इतना खिलखिला रही थी 

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Wednesday, May 8, 2013

"ये मर्द जात कितनी बदजात"

"ये मर्द जात भी कितनी बदजात है , जो औरतों को चैन से जीने भी नहीं देते " रौशनी ने झल्लाते हुए कहा.
"अरे नहीं दीदी सारा कुसूर मर्दों पर डालना ठीक नहीं " नीलू ने आदतन अपना पक्ष रखा ।
" बड़ी आई मर्दों की वकील , तूने अभी देखा ही क्या है ,झेल तो मै....." कहते कहते रौशनी रुक गई , कई लकीरें माथे पर खिच गई ।
नीलू ने पूछा,"क्या हुआ दीदी "  नीलू के कंधे पर हाथ रखते ही किसी दिवास्वप्न से चौंक गई और जाते हुए बोली " कुछ नहीं बस मुझे मर्द पसंद नहीं "
रौशनी , नीलू और उनकी माँ (मिसेज शर्मा )कुल मिला कर तीन प्राणी का छोटा सा संसार, शर्मा जी का देहांत तो कई साल पहले ही लम्बी बीमारी के बाद हो गया था .पर उनकी कमी को पूरा करने में मिसेज शर्मा ने कोई कमी नहीं छोड़ी शर्मा जी के ऑफिस में नौकरी कर ली जिससे गुजारा ठीक हुआ तो बेटियों की पढाई भी ठीक से होने लगी ।
पर आज हालत कुछ और थे , आज रौशनी पहले वाली छोटी सी दस साल की गुडिया  नहीं, उन्नीस साल की नव यौवना थी और ग्रेजुएशन कर रही थी ,आज नीलू और मिसेज शर्मा से कहीं ज्यादा शर्मा जी जरूरत महसूस हो रही थी, इसी लिए वह कभी रात को बिस्तर पर कभी कभी नहाते हुए बाथरूम में रो कर दिल हल्का कर लेती थी ।
इस उखड़े रवैये से परेशां घर के सभी सदस्य चाह कर भी कुछ जान नहीं पा रहे थे माँ ने तो कई बार पूछा पर जवाब में या तो रौशनी चुप रह जाती या टाल देती
खैर दिन ऐसे ही गुजरते रहे और एक दिन रौशनी घर में धडधडाते हुए कॉलेज से आई साइकिल किनारे टिकाई और कमरे में जाकर बिस्तर पर गिर गई  नीलू जल्दी से आई तो देखा की रौशनी लेटे हुए हाफ रही है और कपडे गंदे है जैसे गिर गई हो नीलू जाकर पानी लेने गई तो देखा की साइकिल का अगला टायर कुछ टेड़ा हो गया है .पानी देते वक़्त रौशनी से पूछा "क्या हुआ" रौशनी ने अभी भी चुप्पी साध रख्खी थी।
शाम को मिसेज शर्मा ने साइकिल की हालत देखी तो डर गयी और सीधे रौशनी को पुकारते हुए कमरे में जाकर रौशनी को गले से लगा लिया और खुद धम्म से बिस्तर पर बैठ गई। 
 नीलू तुरंत पानी लाई देखा तो रौशनी की गोद में मिसेज शर्मा लगभग अचेत सी लेटी  हैं रौशनी नें गिलास लेकर पानी के छीटे मिसेज शर्मा के मुहं पर मारे तब कुछ होश में आ गई। अब इस हालत में रौशनी ने कुछ भी माँ को बताना मुनासिब समझा और बहाना बना कर टाल  गई। 
अगले दिन शनिवार था तो मिसेज शर्मा सब्जी लेकर घर आई देखा तो घर पर कोई मेहमान आये है अन्दर शर्मा जी के छोटे भाई त्रिलोचन शर्मा , किसी लड़के के साथ बैठे थे। 
"भाभी जी नमस्ते " कहते हुए त्रिलोचन नें पैर छूए तो मिसेज शर्मा ने नीलू से कहा की चाय बना ला
"और बताइए भाईसाहब घर में सब ठीक है " मिसेज शर्मा पसीना पोछते हुए बोली
"भाभी सब ठीक है ममता (त्रिलोचन की पत्नी )तो आने को कह रही थी पर मैंने ही कहा की आज इस गर्मी में कहा साथ में मारी फिरेगी और घर भी अकेला छोडना ठीक नहीं " त्रिलोचन सोफे पर ठीक से टिकते हुए बोले
"हाँ सही कह रहे हैं कुछ दिन से तो कूलर भी जवाब दे गया है "मिसेज शर्मा चाय देते हुए बोली
अब त्रिलोचन को मुद्दे पर आते ज्यादा टाइम ना लगा। 
"वैसे भाभी मैं कह रहा था की पीछे वाला जो कमरा है वो खाली है न," त्रिलोचन चाय का सिप लेते हुए बोले
 "हाँ खाली है पर अब उसे स्टोर बना रखा है , क्योँ " मिसेज शर्मा ने सवाल पूछा
" ये मेरे साले का लड़का है सूरज इसे यहाँ एक कॉलेज में एडमिशन मिल गया है सोचता हूँ अगर इसे यहाँ .."कहते कहते बीच में ही चाय की सिप से मुहं भर लिया
बड़ी शंका में डूब गयी मिसेज शर्मा .अब क्या कहे
सूरज वक़्त की नजाकत को समझते हुए बोला"आंंटी मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता इसलिए मैं आपके यहाँ किरायेदार की तरह ही रहूँगा, वक़्त पर किराया देता रहूँगा, वो तो मेरे अजनबी होने के कारण यहाँ कोई कमरा नहीं दे रहा इसलिए आप के पास आना पड़ा वर्ना मै तो खुद आपको परेशां नहीं करना चाहता था  "
सूरज ने एक सांस में अपनी दिल की बात को रख दिया।   
मिसेज शर्मा की थोड़ी शंका दूर हुई तो बात बनाते हुए बोली ."ऐसी कोई बात नहीं है बेटा ,बस कमरा थोडा छोटा है इस गर्मी में कैसे रह पाओगे  "
" नहीं आंटी कोई बात नहीं मैं एडजस्ट कर लूँगा और रही बात गर्मी की तो मैं  कही भी रहू ये तो पीछा नहीं छोड़ेगी " सूरज अपनी बात मनवाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था। 
अभी इस अनजान लड़के को लड़कियों के घर में पनाह देना ठीक है या नही जैसी कई बातों का सोच कर मिसेज शर्मा उठने को हुई तो 
"बुआ,बस सामान कहाँ रखना है ये बता देना " मुस्कुराते हुए सूरज बोला
लगभग निरुत्तर सी मिसेज शर्मा को नीलू की आवाज रसोई से आई वो चली गई।
" माँ कहाँ मुसीबत मोल ले रही हो " नीलू धीमे से फुसफुसाते हुए बोली।
"क्या करू ऐसे मना भी तो नहीं कर सकते, 
तुम्हारे पापा के जाने के बाद तुम्हारे चाचा ने हमारी बुरे वक्त में कितनी मदद की है, मना करूँ भी तो किस मुँह से, और फिर अपनी ममता चाची को तो जानती ही हो उसे पता लगा कि उसके भाई के लड़के को मना किया वो भी किराये पर कमरा देने से तो घर सर पर उठा लेगी" मिसेज शर्मा ने समझाने की कोशिश की
"पांच छेह सौ देकर पूरा घर अपना समझेगा " नीलू थोड़ी तेज आवाज में बोल गई।
मिसेज शर्मा कुछ सोचते हुए बाहर आ गई।
त्रिलोचन बोले "ठीक है भाभी तो अब हम चलेंगे, चलो भई सूरज  "इतना कह कर त्रिलोचन बाहर निकल गए।
 सूरज ने पैर छूए और बोला " आंटी माफ़ करना मैंने आपकी बातें सुन ली थी मैं पैसे की एहमियत समझता हूँ, इसलिए मैं पांच छेह सौ में किसी का घर कब्जाने बाला नहीं और मैं पंद्रह सौ तक देकर कमरा ले सकता हूँ, इससे ज्यादा मैं नहीं दे पाउँगा क्यूंकि पढाई का खर्च भी निकालना है "
ये कह कर सूरज बाहर जाने लगा तो मिसेज शर्मा ने उसे बुलाया और बोली"कब से आओगे "
सूरज मुस्कुराने लगा और बोला "मुझे सोमवार से ही  कॉलेज जाना है इस लिए कल का ही दिन है "
मिसेज शर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा "ठीक है पर अगर कोई गलती हुई तो भाई साहब से शिकायत कर दूँगी "
इस पर त्रिलोचन कुछ कह पाते तब तक सूरज बोला "  अरे नहीं बुआ मेरे कान पकड़ने को आप हो तो फूफा जी को बताने की क्या जरूरत है "
और इस पर दोनों हसने लगे और सूरज चला गया
अगले दिन से सूरज ने अपनी बातों से सबको अपना बनाना शुरू कर दिया। सूरज की बातें होती ही ऐसी थी कि कोई प्रभावित हुए बिना रह नही पाता था पर अभी भी रौशनी से दूरी बनी हुई थी इसी बीच रौशनी की नीलू और माँ से भी सूरज से बात करने के कारण कहा सुनी बढ़ती गयी क्यूंकि रौशनी को एक मर्द का उसके घर में होना खल रहा था जिससे वो सबसे ज्यादा चिड्ती थी।
 आखिर एक दिन कपडे धोते वक़्त नीलू से पूछ ही लिया " क्या तुम्हारी दीदी हमेशा से ही ऐसी थी या मेरे आने के बाद हुई है "
नीलू ने हँसते हुए कहा "अरे नहीं वो तो सबसे ज्यादा तेज ठहाका लगाती थी की दादी को डंडा लेकर मारने आना पड़ता था चुप करा ने के लिए "
" तो अब क्या हुआ " सूरज ने कपडे रोक कर नीलू की बात पर ध्यान दिया।
" पता नहीं जब से कॉलेज में एडमिशन हुआ तब से ऐसी ही मर्दों से चिडने लगी है " नीलू ने बाल्टी में हाथ छप छपाते हुए उदास मन से कहा।
अब सूरज को लगा की कुछ बात तो है जो रौशनी को परेशान कर रही है।
सूरज अगले दिन से ही जाँच पड़ताल में लग गया।
दोस्तों से कॉलेज में पता लगाया कुछ पता नहीं लगा फिर एक दिन शाम को उसका पीछा करने लगा तो देखा, रामदास चौराहे के पास कुछ लड़के खड़े हैं और रौशनी को घूर रहे है अब रौशनी भी तेजी से पेडल मार कर तेजी से साइकिल दौड़ा रही है और लड़के हंस हंस कर सीटी बजा रहे हैं उनमे से एक बोला "क्या झांसी की रानी है घोडा दौड़ा रही है " तो दूसरा बोला "अरे हमें भी तो बैठा लो आगे नहीं तो पीछे ही टिक जायेंगे  "
इसी बीच सूरज ने देखा की अब रौशनी आगे निकल चुकी तो लड़कों के पास पहुँच गया और बोला "क्या बदतमीजी है "
तो एक बोला " क्योँ तेरी बहन है क्या "
सूरज ने उसके एक जोरदार चाटा जड़ा और बोला " चल तुझे थाने में ही बताऊंगा की बहन के साथ तुझे कैसे बोलना चाहिए "
इतने में एक ट्राफिक हवालदार आया और सलाम कर के सूरज से बोला "आप यहाँ कैसे, साहब "
सूरज बोला "थाने में शिकायत की उस लड़की ने ,कि कुछ लड़के उसे परेशान कर रहे हैं वही देखने आया था ये साले यहाँ डेरा जमाये हैं, अब थाने में रामलीला कराऊंगा  इनसे  "
लड़कों में से पीछे से निकल कर एक हाथ जोड़ कर आया "साब माफ़ कर दो अब नहीं करेंगे "एक एक कर सभी ने सॉरी बोलना शुरु कर दिया।
तो सूरज बोला " अरे नहीं आज की रात तो थाने में तुम्हारे पिछवाड़े पर लाल रंग की पुताई करूँगा वो भी अपने प्यारे डंडे से "
अब तो सब के सब डर गए और दो ने तो पैर भी पकड लिए।
हवलदार बोला "छोड़ दो साब अगर अब ये यहाँ दिखाई दिए तो मैं खुद आपको फ़ोन कर दूंगा "
सूरज बोला " फिर भी गलती कि सजा तो मिलेगी तुम सब को मुर्गा बनना पड़ेगा "
सभी सड़क को इधर उधर देखते मुर्गा बन गए .।
सूरज ने कैमरे में एक फोटो ली और सबको भाग जाने के लिए कहा ।
सबके जाने के बाद ट्रेफिक हवलदार को पचास रुपये बडाये तो हवलदार बोला " अरे नहीं बेटा मै बिकाऊ हूँ पर मेरे भी बेटियां हैं आज का ये ड्रामा करके एक बेटी को ही तो बचाया है "
"ठीक है हवलदार जी, मेरी बात पर भरोसा कर आपने मेरा इतना साथ दिया उसका बहुत धन्यवाद पर कल से मैं खुद इस जगह दिखाई दूंगा सिर्फ कुछ दिन के लिए" कहते हुए सूरज घर की ओर चल दिया। हवलदार उसकी इस आखिरी बात को शायद समझ नही पाया पर कुुुछ पूूछा भी नही।
फिर अगले दिन से लड़कों की जगह वो खुद वहां बैठने लगा और जब रौशनी आई तो सीटी मार कर बोला " कहाँ चली जानेमन " इतना सुनते ही रौशनी ने बिना उस ओर देखे पहले की तरह साइकिल दौड़ाने लगी और  पीछे से वो भी घर की पिछली गली तक आया और मुड कर बापस चला गया और थोड़ी देर बाद जब घर में घुसा तो देखा रौशनी मुहं धो रही है।
उसने कुछ कहने के लिए उसके पास जाने को कदम बडाये तो वो पीछे मुड कर कमरे में चली गई।
सूरज ने भी रोज की आदत डाल ली और रोज पीछा करने लगा।
और एक दिन रौशनी की तरफ बड़ा तो मुड़कर रौशनी कमरे में नहीं गई और सूरज पास में जाकर खड़ा हो गया और पीछे से हलके से कान में बोला "ऐसे ही अगर उन लड़कों के सामने भी डट जाओ तो वो मैदान छोड़ कर ही भाग जायेंगे "
इतना सुनते ही रौशनी का गुस्सा काफूर हो गया और अचम्भे से कुछ देर सूरज को जाते देखती रही।
सूरज की बात रात भर सीने में कौंधती रही और आखिर रौशनी नें एक फैसला लिया और मुस्कुराते हुए करवट लेकर सो गयी।
अगले दिन वह तेजी से साइकिल लेकर बढ़ती जा रही थी तो फिर वही सीटी और आवाज आई " जानेमन हमे भी तो लेती जाओ "
इतना सुनते ही साइकिल आवाज की तरफ मोड़ कर बिना देखे एक झन्नाटेदार चाटा गाल पर रसीद दिया कुुुछ बोलने ही जा रही थी, फिर देखा तो ऑंखें फटी रह गई सूरज का लाल गाल देखकर तो जैसे हलक की आवाज हलक में ही अटक गई और फिर सूरज बिना कुछ बोले घर चला आया।
शाम के धुंध के बीच सूरज डूबते सूरज को देख रहा था और नीलू बैठे बैठे लाल गाल देखकर मुस्कुरा रही थी
इतने में रौशनी आई और बोली "सूरज ये सब क्या है "
तो सूरज उठा और मिसेज शर्मा के रसोई के स्लैब पर बैठ गया जहाँ मिसेज शर्मा खाना बना रही थी
मिसेज शर्मा गाल के लाल रंग को देखकर इतनी अचंभित नहीं हुई जितना रौशनी को देखकर और वो भी सूरज से पूछ रही थी " सूरज बताओ ये सब क्या है "
सूरज मुस्कुराया और बोला " देखिये आंटी जी ये जब मुझसे बात नहीं करती तो मै क्योँ करू "
इतने में नीलू ने आकर कहा " माँ दीदी ने सूरज भैया का गाल लाल किया है " और खिल खिला कर हंस पड़ी।
 अब तो मिसेज शर्मा को भी जानना था की क्या बात है तो सूरज के चेहरे की ओर अचरज से देखने लगी।
सूरज उठा और आँगन के कोने में पड़ी बेंच पर पालती मारकर बैठ कर बोला  "एक कहानी सुनो मज़ा आयेगा" नीलू बोली ठीक है कहो साथ में बाकि सब भी बैठ गए।
सूरज ने शुरू  किया " एक राजकुमारी थी वो रोज पढने जाती थी तो रास्ते में शैतानों का गाँव पड़ता था वो उसे परेशान करते थे तो वो अपना घोडा और तेजी से दौडाते हुए निकल जाती थी शैतान अपनी शैतानी पर और खुश होते और रोज उसे परेशान करते , इस तरह कई महीने बीतते गए पर कोई हल न निकला और एक दिन एक बाबा वहां से गुजर रहे थे तो उन्होंने देखा की राजकुमारी शैतानों से नहीं अपने डर से ज्यादा डरती है तो राजकुमारी को एक मंत्र दिया और अगले दिन राजकुमारी ने सब शैतानों को मार भगाया कहानी कैसी लगी "
"पर तुम शैतानों  की जगह .."कहते कहते रौशनी शर्मा गई और इस पर नीलू अपनी हसी रोक नहीं सकी।
तब सूरज बोला " मेरा काम तो केवल मंत्र का असर देखना था तो वहां खड़ा हो गया "
  " और वो शैतान कहाँ गए बाबा जी" नीलू ने पूछा
"आओ बच्चा  दिखाता हूँ" और ये कह कर अपने कमरे में सभी को ले गया और तस्वीर जिसमे लड़के मुर्गा बने हुए थे देते हुए बोला "देखो "
उस तस्वीर को देखते ही रौशनी खिलखिलाकर हसने लगी ये देख मिसेज शर्मा के आँखों से आंसू निकलने लगे आखिर कर उन्हें उनकी पुरानी रौशनी जो मिल गयी थी ।

Saturday, January 5, 2013

अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता


"राधा तुम्हे ठण्ड नहीं लग रही क्या, कल कर लेना, आओ यहाँ आग के पास बैठो  " तुलीराम ने छत से आँगन में झांककर कहा
राधा ने बर्तन धोते हुए ही कहा" मै न्यू इयर का स्वागत गंदे बर्तनॊ के साथ नहीं करना चाहती, इस साल का काम इसी साल ख़त्म करुँगी"
तुलीराम इतना सुनते आग को एक टक देखने लगा , सोचने लगा  कि इस साल ने क्या क्या नहीं दिखाया उन्हें, लगता है एक सदी बीत गयी हो, हर दिन कुछ न कुछ अनहोनी की ख़बरें मिलती रही आखिर साल ख़त्म हो ही गया
इतना सोच रहे था  कि राधा हाथ पोछ्ते हुए आई और बोली "आग को क्या घूर रहे हो सर्दी इतनी है तो आग भी कहाँ तक साथ देगी"
तुलीराम की चेतना लौटी तो देखा लकड़ियों में आग बची नहीं थी इसलिए बोला " मै तो कह ही रहा था की जल्दी आ जाओ वर्ना आग  बुझ जाएगी "
"कोई बात नहीं चलो बिस्तर में घुस जाते है" राधा ने हाथो को बची आंच को हाथ दिखाते कहा
तुलीराम ने भी हामी भरी और कमरे में चले गए राधा ने आग दरवाजे में ताला लगाया और लाइट बुझाते हुए कमरे में बद गई देखा तो तुलीराम कल के लिए कपड़ो को हुक पर टांग रहा था 
"लगता है कल और ज्यादा सर्दी होगी अपने लिए एक स्वेटर और निकल लीजिये" राधा ने बिस्तर ठीक करते हुए कहा
"आज तो बाहर हवा भी चल रही है " तुलीराम ने समर्थन में कहा
"मैंने तो सोचा था की इस साल की दिवाली अपने घर में मनाएँगे, पर माँ जी के कैंसर के इलाज ने  सब ख़त्म कर दिया " राधा ने रजाई के छोर को खीचते हुए कहा
" जब माँ ही ख़त्म हो गई तो क्या बचता" तुलीराम  ने उदास होते हुए कहा
राधा को सुनते ही जैसे झटका लग गया हो, "मै तो पहले ही कह रही थी की अब ये और नहीं जियेंगी घर ले चलिए पर पिता जी पर तो कुछ असर ही नहीं था, उनका बस चलता तो ..."
तुलीराम ने बीच में ही राधा को टोका " अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता राधा  "
आखिर तुलीराम को लगा अब ये नहीं मानेगी तो चादर ओड कर फिर बहार निकल आये और छत पर ही टहलने लगे ।
तुलीराम की आँखों में अब माँ का वो उदास और बीमार चेहरा घूम रहा था । वैसे तुलीराम के सामने वो कभी रोती नहीं थी पर एक बार हस्पताल में वो जब बोतल में पानी भर कर ला रहा था, तो देखा की पिता जी  उनके आंसू पोंछ रहे थे और वो बस उनका हाथ थाम कर हिम्मत जुटा रही थी । ये देख कर तुलीराम  भी लौट आया और सीधे डॉक्टर के कमरे में चला गया और उससे पूछा " माँ की तबियत सुधर क्यूँ नहीं रही, रोज इतनी तो दबाई दी जा रही है"
डॉक्टर ने तो तभी कह दिया "केस इतना बिगड़ गया है, चाहे कुछ किया जाये ये अब नहीं बच सकती, मेरी  राय  में तो इन्हें घर ले जा कर खूब  सेवा  करो"
तुलीराम को अभी तक खुद पर गुस्सा और तरस दोनों आ रहे थे की  माँ के लिए ही ये दुःख होना था।वो तो इतनी भगवान को याद करती थी , उन्होंने किसी का क्या बुरा किया था।
देर रात जब बापस आया तो राधा सो चुकी थी, वह भी जैसे तैसे आंखे बंद कर लेट गया, आखिर  कुछ देर बाद नींद आ ही  गयी ।
इस बात को और कुछ महीने बीत गए । वक़्त ऐसा मरहम है की चाहे कोई भी घाव लग जाये  वो भर ही देता है  । तुलीराम को भी माँ की याद अब राधा ही दिलाती जब वो अक्सर माँ के इलाज का खर्च गिनाती  पर  तुलीराम कलह बढाना नहीं चाहता था तो चुप हो  जाता या बाहर निकल जाता ।
एक दिन सुबह अखवार पढ़  रहा था  राधा ने चाय का प्याला हाथ में देते हुए कहा " कब तक हम यु ही मकान का किराया देते रहेंगे,  कोई घर नहीं तो प्लाट ही ले लो छोटा सा कमरा बनाकर गुजर कर लेंगे "
तुलीराम बोंला " देख तो रहा हूँ पर केवल पचास हज़ार ही हो पाये है "
राधा ने कहा " कोई बात नहीं तुम बात चलाओ, गहनों पर कुछ पैसे निकाल लेना, कुछ ऑफिस से हो जायेगा "
"ठीक है" तुलीराम  कुछ असमंजस से बोला ।
 ऑफिस की जल्दी में तुलीराम घर से निकल रहा था तभी राधा की चीख  सुनाई दी । वह तेजी से आंगन  की ओर बढा देखा तो कपड़ो की बाल्टी किनारे लुढकी है और राधा बेहोश है, उसने जल्दी से उसे उठाया और  एक रिक्शे पर बिठा कर हॉस्पिटल ले आया  । 
अब उसे डॉक्टर का इन्तजार था, डॉक्टर ने राधा की टांग देख कर कहा  टांग टूट गयी है ,जल्दी ही *-ऑपरेशन करना होगा आप चालीस हज़ार काउंटर पर जमा करा दें । हो सकता है की रॉड  डालनी पड़े  ।"
राधा इस समय दर्द से कराह रही थी तुलीराम ने  जल्दी से एटीएम पर जाकर पैसे निकाले और जमा करा दिए । ऑपरेशन  हो गया और राधा ठीक होने लगी ।
2 महीने बाद राधा ने दीवार के सहारे चलना शुरू कर दिया था  और तब तुलीराम ने कहा " क्या बात है आज तो कमाल कर दिया राधा"
राधा ने कहा "सब तुम्हारी वजह से हो पाया वरना मुझे तो लगा मै मर ही जाउंगी "
तुलीराम ने कहा "अब तुम ही तो मेरे लिए सबकुछ हो तुम्हे कुछ कैसे हो सकता है "
तुलीराम ने छेड़ने के अंदाज में कहा "तुम्हे तो  अभी नए घर में भी जाना है "
राधा का मुह उतर गया और बोली "अब कहाँ से आएंगे पैसे जो नया घर खरीदेंगे "
तुलीराम बोले " तुम ठीक हो गयी, अब फिर पैसे इकठ्ठे हो जाएँगे "
राधा बोली " तुमने इतना खर्च क्यों किया "
तुलीराम ने राधा को सीने से लगा कर कहा "अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता राधा"
राधा अब खुद को तुलीराम से बहुत छोटा महसूस कर रही थी और उसके पश्चाताप के आंसू  रोके नहीं रुक रहे थे ।




Thursday, December 27, 2012

"जिन्दा प्यार"

"पता नहीं कहाँ  मर गयी मेरे पेट में चूहे कब्बडी खेल रहे है, ये साली रोज ही देर लगाती है रोटी बनाती है कि पैदा करती है " हरिया ने बडबडाते हुए पसीना पोछा और एक बार फिर गाँव कि ओर देखा इस बार धीरे धीरे चलती हुई धनिया आती दिखाई दी तो कुछ आराम मिला ।
धनिया ने खाना और पानी रखा तो हरिया बोला "कहाँ रह गयी थी यहाँ जान निकल रही थी "
"आज जल्दी में तवे से पैर लग गया और छाला पड़ गया" धनिया ने आह भरते हुए कहा तो टीस हरिया के दिल तक जा पहुंची। इतना सुनते ही भूख प्यास तो हरिया की मर ही चुकी थी क्यूंकि दुनिया में धनिया ही तो इकलौती थी जो हरिया का जिंदगी का एकमात्र सहारा थी। 
"ला दिखा , कुछ लगा लिया था .....पता नहीं तेरा आज कल ध्यान कहा रहता है " खाना एक तरफ रखते हुए हरिया ने कहा ।
"कुछ देर पानी में रखा था तभी तो देर हो गई " धनिया ने पैर पर पड़ा छाला 
दिखाते हुए कहा ।
छाला मोटा पड़ गया था तो हरिया बोला "आज न आती मै भूखा मर थोड़े ही जाता "
ये वही हरिया था जो थोड़ी देर पहले भूख से कुलबुलाता धनिया को गाली दे रहा था मगर अब उसकी आंखे बता रहीं थी जली धनिया है पर जलन हरिया के दिल पर हो रही है। 
धनिया ने हरिया के मुँह पर हाथ रखा और बोली "आपको भूखा रख कर मैं तो मर जाती "
इतना सुनकर हरिया मुस्कुराना चाहता था पर उसका धनिया के लिए प्यार उसे रोक रहा था तो वो दिल ही दिल में उसके लिए आंसू बहा रहा था। 
इतने में उसका ध्यान धनिया की दूसरे पैर के पास गया जो वो मेड के दूसरी तरफ फैला कर बैठी थी और अनजाने में मेड को पैर  के अंगूठे से कुरेद रही थी और मेड का कुछ हिस्सा गिरने के कारण काली पूँछ दिखाई दे रही थी जिसे दखकर अंदाजा लगाया जा सकता था की अंदर उस सांप की मोटाई किसी की कलाई से काम नहीं होगी हरिया कुछ दनिया से कह पाता  तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्यूंकि मेड की काफी मिटटी  खोखल होने के कारन ढह  गई और सांप का असली चेहरा सामने आ गया लगता की अगर ये किसी को डस ले तो वो परलोक सिधारने में ज्यादा देर नहीं लगा पायेगा धनिया अभी भी हरिया पर बिना ध्यान दिए अपने छाले को सहला रही थी हरी या ने चीख कर धनिया से कहा " धनिया पैर  हटा "
धनिया कुछ समझ पाती उससे पहले ही नाग अपना फन  उठा चूका था पर धनिया को ये धयान न होने से अभी भी उसने छाले वाला पैर भी मेड की तरफ कर दिया उस नाग को नागवार गुजरा। 
हरिया ने ध्यान 
से उस नाग को झपटने की कोशिश की क्यूंकि उसे पता था अगर कुछ पल ही इन्तजार धनिया के आखरी पल बन जाते और उसने झट से उसे दबोच कर दूर डालने को ले गया पर छोड़ने के लिए जैसे ही हाथ ढीला किया नाग ने डस लिया और हरिया वही लेटता चला गया ।
अब धनिया दौड़ कर हरिया के पास गयी और उसने देखा क़ी हरिया क़ी साँस नहीं चल रही है तो नाग क़ी तरफ हाथ बढाकर बोली "मुझे भी डस ले, अब मैं भी जी के क्या करूंगी "
तब नाग बोला "अब प्यार निभाने क़ी बारी तेरी है अब तू भी मर गयी तो हरिया के मरने का क्या फायेदा कौन उसके प्यार को याद रखेगा "
"प्यार में मरना नहीं प्यार के बिना जीना ही प्यार को इस दुनिया में जिन्दा रखता है "