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Saturday, March 31, 2018

छप्पर का भूत

पात्र
गोदावरी देवी - घर की बुजुर्ग
कजरी- गोदावरी देवी की पुत्री
सजली- गोदावरी देवी की बड़ी पुत्री
अमरी- कजरी की पुत्री
राजीव- कजरी का पति
सुरजीत- सजली का पति
महेंद्र- कजरी का भाई
चूरन लाल - बंदर
भूमिका
गोदावरी देवी घर की सबसे बुजुर्ग है और  अब इस उम्र में दिखाई सुनाई कम देता है और चलना फिरना भी बंद है क्योंकि पैर साथ नही देते | गाँव के बीचोबीच उनका घर है घर के तीन हिस्से है पहला एक पक्का कमरा फिर बरामदा फिर आंगन और उसी आंगन के कोने में पड़ा है छप्पर, यही गोदावरी देवी की खाट पड़ी रहती है| गोदावरी देवी के पहले तो बच्चे हुए नही फिर पीर फकीर झाड़ फूंक बाबा पुजारी मंदिर इस सब से शादी के 10 साल बाद गोदावरी देवी का घर खुशियों से भर गया और दो लड़की हुई और एक साल बाद लड़का हुआ |
ऐसा नही है की केवल उम्र ने ही गोदावरी देवी को बिस्तर तक पहुंचाया है इसमे उनके पुत्र महेंद्र का भी पूरा हाथ है जो 15 साल की उम्र में किसी गाँव की 30 साल की लड़की के साथ भाग गया और कभी नही लौटा |और गोदावरी जो अपने पति की मौत के बाद उसी का मुह देख कर जी रही थी तेजी से बूढ़ी होती चली गई |
गोदावरी देवी बड़ी बेटी सजली की शादी काफी पहले पास के गाँव में हो गई थी | छोटी बेटी का प्रेम विवाह हुआ था राजीव के साथ , राजीव को गोदावरी देवी नदी किनारे कुत्तों के झुंड से बचा कर लाई थी कुत्तों ने उसकी दो उंगलिया नोच डाली थी जब कोई उस 4 माह के अबोध को नदी किनारे डाल गया था |
इसके अलावा एक बंदर जो की गोदावरी देवी की संतान के साथ ही पला था आंखों के कम दिखने की वजह से गोदावरी देवी के लिए  छप्पर के भूत में तब्दील हो गया था |
दृश्य 1
"चिलचिलाती धूप ने तो सुबह को दोपहर बना दिया "
राजीव ने हल कंधे से उतार कर आंगन के किनारे रखते हुए कहा और छप्पर की ओर बढ़ा |
राजीव ने अकेले ही गोदावरी देवी की खाट को कोने की ओर खिसकाया, इस पर तेजी से आती हुई कजरी तेजी से बोली " मैं आ तो रही थी खिसकाते क्यों हो उठा के रखवा देती किसी दिन खाट का पाया टूट ही जाएंगा|
इस पर राजीव गोदावरी देवी के सिर की तकिया ठीक करते हुए मुस्कुराकर बोला " बुढ़िया अब सूख कर ढाई सौ ग्राम की भी नही है और धूप पड़ गई तो गायब ही न हो जाए  इस लिए कोने में खिसका रहा था " कह कर तेज ठहाका लगाया | मुस्कुराते हुए कजरी तो चली गई पर गोदावरी के कानों में ठहाके की आवाज पहुंची तो पास में पड़ी लाठिया से तेजी से राजीव के एक लगा दिया और बड़बड़ाने लगी " इस बूढ़ी से क्या मजाक करता है मुझसे तो ऊपर वाले ने ही मजाक किया है जिस बेटे के लिए 12 साल 9 महीने मंदिर मंदिर चौखट रगड़ी उसे 12 मिनट में पराया कर दिया |
इस पर स्तब्ध राजीव ने धीमे से बोला " अम्मा जाने वाले का नाम तो हर सांस से याद कर रही है कभी इस अभागे पर भी प्यार से हाथ रख देती तो मुझे भी जिंदा रहने का अधिकार मिल जाता |" इस पर छलक आये आंसू जल्दी से राजीव ने पोंछे और रसोई की तरफ बढ़ गया |
रसोई में कजरी रोटी सेंक रही थी और पल्लू से पसीना पोछते हुए राजीव से मुस्कुरा कर बोली " खा आये लठिया का प्रसाद तो अब दो रोटी भी खा लो "
राजीव बोला " उसकी लाठी से मार नही प्यार बरसता है पर मुझे तो प्यार से एक बार बेटा कह दे इसी का इंतजार है "
"वो तो उस महेंद्र की हरकत ने तुम्हे दुश्मन बना दिया वरना तो तुम ही उनके अच्छे बेटे थे  " कजरी की बातों में संजीदगी उभर आयी ।
" तू तो जानती है मैने कभी किसी का बुरा नही चाहा तो जायदाद के लिए मैं महेंद्र को कैसे बरगला सकता था वो बस एक बार लौट आये तब खुद बूढ़ी को पता चल जाएगा की मैंने नही उस रजनी ने उसे बरगलाया था की मैं उसकी जायदाद के लिए उसकी जान ले लूंगा इसलिए वो उसी के साथ भाग गया| बूढ़ी बोले तो आज मैं सब कुछ छोड़ कर चला जाऊंगा " राजीव ने भरे गले से इतना दर्द उड़ेल दिया इस पर कजरी चूल्हा छोड़ कर राजीव के कंधे पर सर रखकर बैठ गई अभी आंखों में नमी सैलाब बनने को तैयार थी की अमरी ने दौड़ कर दोनों को चिपका लिया और बोली " मुझे सोता छोड़ कर अकेले अकेले प्यार कर रहे है"
इस पर जल्दी से कजरी  आंखों की नमी पोछ कर चूल्हे के पास बैठ कर  थाली लगाने लगी |
" जल्दी से मुहँ धो कर आ जा अमरी" अमरी को हाथ से उठाते हुए राजीव  बोला
तभी बाहर लगातार गोदावरी की लाठिया का जमीन पर पटखना शुरू हो गया और तीनों हंस पड़े
" ये लो बापू , आ गए चूरन लाल " अमरी खुशी से उछलती हुई बाहर आई
बाहर बूढ़ी चीख चीख कर बोल रही थी "भूत भूत छप्पर पर भूत है , है भगवान या तो आंखे ठीक रखते या पूरी फोड़ देते अरे कोई तो इसे भगाओ "
इतना कहना था की बंदर ने एक छलांग में छप्पर से लटकना छोड़ अमरूद की डाल पर बैठ कर डाल हिलाना शुरू कर दिया |
तब तक कजरी दो रोटी ले आई और दीवार पर रख कर बोली " ये लो रोटी तोड़ो डाल मत तोड़ो "
" बापू चूरन लाल कितना बूढ़ा हो गया है  खाल तक लटक गई है " अमरी ने गहरी नजर डाल कर कहा
" हाँ और हो भी क्यों न कितने साल हो गए जब से बूढ़ी खाट पर पड़ी है रोज ही तो आता है पर आंगन में कभी पैर नही रखा" राजीव ने अमरी को गोद में बिठा कर बात आगे बड़ाई |
अंदर से थाली लाती कजरी बोली " साहब इतने सालों से अम्मा से गुस्सा जो हैं अम्मा की एक लठिया पड़ी तो कसम खा ली की आंगन में न उतरेंगे वरना तो एक रोटी के लिए अम्मा के पल्लू को खीचते घूमते थे "
" अब लगता है इस जन्म में तो ऐसे ही छप्पर के भूत ही बने रह जाएंगे, क्योंकि बूढ़ी तो खुद दुनिया से नाराज है इन्हें कौन मनाएगा" और कहते कहते ठहाके से राजीव ने घर भर दिया |
यू ही काम धाम में सुबह से शाम हो गई, बूढ़ी भी लेटे लेटे गुनगुनाने लगी।
जी को जी से, जी बिन जी के, कैसे मैं समझाऊं री
तुझ बिन सूना घर समशानि कैसे भीतर जाऊं री
तार न पत्री खत न खबरिया, जी बिन जी क्या पाऊं री
रूठे रूठे छोड़ के पीछे कैसे प्रीत निभाऊं री
इसे सुन कर अमरी कजरी से बोली "अम्मा कितना अच्छा गाती है, पर ये रो क्यों रही है"
कजरी शाम की रोटी सेंकते बोली" अमरी दुनिया में कुछ दुख बांटने से भी नही बटते, अकेले ही सहने होते
है।
दृश्य 2
चूरन लाल लंगड़ा रहा है और छप्पर से लटकने की कोशिश कर रहा है अम्मा सो रही है और ज्यादा देर न लटक पाने की वजह से नीचे गिर गया और फिर छप्पर के बांस के सहारे चढ़ कर लटकने लगा तो अम्मा को उठाने के लिए कजरी ने सिरहाने से खटिया हिला दी फिर जा कर जब नींद टूटी तो बूढ़ी ने लाठिया पटखना शुरू किया
और फिर बंदर पेड़ पर टिक कर बैठ गया । अब बंदर को भी अपनी रोटी से ज्यादा जिंदगी की शाम का इंतजार था तभी तो अमरी की रखी रोटी भी रास नही आई।
दृश्य 3
सुबह 4 बजे ही बूढ़ी उठ कर कजरी को बुलाती है ,2 रुपए देकर ग्लूकोस के बिस्कुट का पैकिट मंगाने को कहती है ।
"आज क्या हुआ बड़ी जल्दी उठ गई बूढ़ी
,अब 4 बजे कहाँ दुकान खुली होगी, अमरी वाले बिस्कुट ही देदे "राजीव ने कजरी से कहा
बूढ़ी ने बिस्कुट का पैकिट खोलकर  हवा में हाथ बड़ा कर खिलाते हुए कहा " ले मुन्ना खा ले तेरे पसंद के बिस्कुट मंगवाए है राजू को पूरी जायदाद खा लेने दे तू ये बिस्कुट खा मेरे पैसों के है ," बिस्कुट नीचे गिरते जा रहे थे
राजीव ये सुन कर बिलख बिलख कर रोने लगा और उसे संभालते हुए कजरी भी खुद को रोक न सकी और फूट पड़ी |
ये रोना सुन कर अमरी भी उठ गई और राजीव से चिपक गई । बूढ़ी कुछ देर में हवा को सहलाते हुए सो गई मानो आखरी बार अपने बेटे को सुला रही हो ।
करीब सुबह के 6 बजे राजीब बूढ़ी को कुल्ला कराने पानी का गिलास लाया तो देखा अब बस बूढ़ी का शरीर अकड़ा पड़ा है और प्राण तो उड़ चुके है , राजीब धम्म से वही गिर गया और सिसकने लगा, फिर अमरी आयी तो वो भी राजीब को देख रोने लगी, तो कजरी को पता चल गया कि बूढ़ी गुजर गई ।
धीरे धीरे गांव के लोग जुटे रोना धोना बढ़ता गया फिर धीरे धीरे थमा और किसी बुजुर्ग ने कहा "जिसको जाना था वो चला गया अब बाली बच्चों की ओर देखो कजरी सुबह से दो बार बेहोश हो चुकी है।"
इतनी ही देर में कहीं से बंदर भी आ गया।
चूरन लाल ( बंदर) लाश के पास बैठा है ,अशरफ के लड़को ने गुलेल से पत्थर ऐसा निशाना दे कर  मारा जो बंदर के कनपटी पर पड़ा और बूढ़ी के पैरों के पास ढेर हो गया । इतना देख अमरी लड़को की ओर बूढ़ी का डंडा लेकर दौड़ी तो वो दोनों भाग खड़े हुए, लोगो ने कहा लो खिलाने वाला जा रहा है तो खाने वाला कैसे जी पाता बंदर भी ढेर हो गया।
टिकटी  (अर्थी) बांधते  राजीव गा रहा है जो बूढ़ी बाबा की याद में गाती थी " जी को जी से जी बिन जी के कैसे में ......"
राजीव से लोग बोले लाश को इस खटिया पर बांध कर ही जला देते है, इस टूटी गली खाट का क्या करोगे ।
राजीव ने कहा इस पर अब से मैं सोऊंगा इस पर, जीते जी अम्मा की गोद नही मिली अब तो ये खटिया ही मेरी अम्मा की गोद है।
गोदावरी का अंतिम संस्कार विधि विधान के साथ कर दिया गया।
दृश्य 4
करीब 6 महीने बाद एक दोपहर:
एक बड़े दाड़ी वाला भिखारी दरवाजे पर आवाज लगाता है "अलख निरंजन"
बाहर खेलती अमरी से कहता है जा अम्मा से कह , बड़ी दूर से बाबा आये हैं
कजरी सिर पर पल्ला डाल कर कटोरी में आटा और दूसरे हाथ में गुड़ लाती है
बाबा गुड़ आटा लेकर झोले में रखते हुए बोलता है " बिटिया तेरे घर में कोई बड़ी बूढ़ी नही है "
पीछे से आता राजीव  लगभग चीखते हुए बोलता है " बड़ी बूढ़ी थी पर उसे तूने कई साल पहले मार दिया था महेंद्र, फिर तूने अपने प्यार की छुरी से हर रोज कई साल उसका गला रेता और अब पूछता है,बूढ़ी कहा है अब उससे माफी मांगने को तुझे कोई और जन्म लेना होगा |"
अमरी और कजरी अभी भी भौचक्के से खड़े रहे , और बाबा (महेंद्र) धम्म से घर की चौखट पर सर रख कर दहाड़े मार कर रोने लगा।

Monday, June 3, 2013

"बाबा चमत्कारी है "

"बम बम भोले ,खोल दरवाजा  बच्चा, देख प्रभु  आये हैं " इतना सुनना  था की अन्दर से चचा निकल कर आये
बाबा ने हाथ देख कर कहा "अरे बच्चा खाली  हाथ, देख हिमालय में कई महीने तप कर के लौटे हैं , कुछ दान दक्षिणा तो दे, बम बम भोले"
"अरे बाबा यहाँ कहाँ आ गए सुबह सुबह चाय भी नहीं पीने  दी "  चचा ने रूखे मन से कहा
" अरे बच्चा घोर अपराध कर रहा है बाबा को कोई मोह नहीं  बाबा को भंडारा कराने  को चाहिए वरना ये मुद्रा तो धूल मात्र  है बाबा के लिए " इतना कहते हुए उस काली लम्बी दाड़ी  बाले उस व्यक्ति की भवे तन गई
" अरे महाराज मैं आपको पहचान नहीं पाया आइये कुटिया  में मेरी मुझे धन्य कर दिया आपने " चचा के तेवर एक दम बदल गए इस पर बाबा ने दाडी पर हाथ फेरा और चचा के आगे आगे बैठक तक आये
"बाबा आप यहाँ बैठो मैं पानी लाता हूँ और भोजन और विश्राम की व्यवस्था देखता हूँ " चचा ये कह कर अन्दर सरक गए और इधर बाबा सोफे पर फ़ैल  कर बैठ गया
इतने में चचा चाची को लेकर बैठक में आये चाची के हाथ में पानी का गिलास था पर बाबा को देखते ही बापस लेकर परदे के पीछे चली गई और साथ में चचा भी और फुसफुसाने लगी " ये किसे बैठा लिया ये तो कोई ढोंगी है
"इस पर चचा ने भी ताव में कहा मेरी आंखे धोखा नहीं खा सकती ये पहुचे हुए बाबा है इनकी सरलता पर मत जाओ "इतना कह पाए थे की बाहर से बाबा के खासने की आवाज आई और दोनों बाहर आ गए
अब चचा चुप चाप किनारे से खड़े हो गए
इस पर बाबा ने कहा "लगता है बिटिया को हम पर बिस्बास नहीं है  "
चचा तुरंत नीचे  चरणों में बैठते हुए बोला " अरे नहीं महराज ये  बात नहीं "
बाबा सोफे से उठने की कोशिश करता हुआ बोला " बच्चा हम सब जानते है "
इतना कहना था की चचा ने बिठाते हुए कहा " आप तो जानते है औरतों के स्वाभाव को "
"ओ शालू आ बाबा के पैर छु कर माफ़ी मांग " चाची  को इशारे से कहा
चाची ने मुह बना कर कहा " एक ऐसे ही मेरे मायके में आये थे तो बो बाद में बड़ा माल इकठ्ठा कर के भाग गए , अब मुझे भरोसा नहीं होता "
चाचा ने गुस्से से कहा" द्देख तुझे यकीं नहीं पर मुझे तो है "
इस पर बाबा बोले " बम बम भोले ये तो मेरा अपमान पर अपमान कर रही है "
चाचा बोले  " नहीं महाराज ऐसा  नहीं है "
चाची  बोली " अगर ये इतने बड़े पहुचे हुए संत है तो कुछ चमत्कार दिखा सकते हैं "
बाबा ने रॉब से दाड़ी पर हाथ फेरते हुए कहा " बता सिक्का हथेली पर गला कर दिखाऊं या पानी में आग पैदा करके दिखाऊं"
चाची ने कहा "मुझे ये आपके पुराने पुराने जादू से क्या लेना कुछ नया हो तो बताइए "
इस पर बाबा बोले " बता फिर क्या देखेगी "
चाची ने तुरंत पांच का सिक्का निकल कर कहा " इसे पांच सौ का बना दो तो मानू "
इतना सुनते ही बाबा कुछ सोच में पड़  गए
चाची जब अन्दर जाने को हुई तो चाचा बोले " अरी  रुक तो अभी बाबा ध्यान में जाकर ही तो चमत्कार दिखायेंगे "और तुरंत बाबा के चरणों में पांच का सिक्का रख दिया
अब तो चाची भी बही खड़ी  हो गई और बाबा को देखने लगी बाबा ने करीब पांच  मिनट बाद ऑंखें खोली और चाची  की तरफ देख कर बोले "तुझे पैसे से बहुत मोह है ले तुझे यही चमत्कार दिखता हूँ "
और सिक्का उठा कर अपने हाथ में रखकर आंखे बंद कर ली और मंत्रो का जप शुरू कर दिया
अब तो चाची भी हाथ जोड़ कर बैठ गयी
करीब दस मिनट बाद हथेली खोली तो सिक्का गायब था और उसकी जगह पुरे पांच  सौ का करारा नोट चाची को दिखाया और चाची ने तुरंत नोट अपने हाथ में लेकर  नोट को हर तरफ से देखती हुई बोली " वाह प्रभू  आपने तो कमाल  कर दिया "
इतना कह कर चाची तो नोट लेकर अन्दर चली गईं और चाचा जमींन से उठ कर सोफे पर बाबा के सामने बैठ गए
अब बाबा ने रॉब में और चौड़े होकर बैठने के लिए जैसे ही पैर ऊपर सोफे पर रखा तो चाचा चीख कर बोले " ऐ  कलुए सोफे गन्दा करेगा क्या "
इस पर हैरान बाबा के पैर बही जम  गए और बाबा को सांप सूंघ गया
इस पर चाचा बोले " कल जब शराब का पौआ लिया था तब तो बड़ी लम्बी चौड़ी हांक रहा था और जब पैसे मांगे तो बहा से भाग गया
इतनी बात पर तो बाबा की जुबान से इतना ही निकल सका " तुम्हे कैसे .."
चाचा ने तुरंत कहा "वो मेरे भतीजे की दुकान है अगर आगे से इसे बाप का माल समझ कर भागने की कोशिश की तेरे सारे अड्डे मै  जानता  हूँ  बनके बिहारी मंदिर , भिरवी  द्वारा ..सब बंद हो जायेगा "
इतना सुनते ही बाबा हाथ जोड़ कर बोला " मेरे पांच सौ का नोट तो दे दो साहब आगे से कभी नहीं करूंगा "
" अब देख पांच सौ का नोट तो तू भूल ही जा क्यूंकि वो शीला के हाथ चला गया अब तक तो वो सोच भी चुकी होगी की इसका क्या खरीदना है " चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा
" साहब गरीब के पेट पर लात मत मरो बड़ी मुस्किल से मिला था एक पांच सौ का नोट " बाबा ने गिडगिडाते हुए कहा 
" मुझे पता है कैसे मिला है, पांच सौ का नोट कल ही श्रीवास्तव जी को चूना लगाया था उनकी साइकिल बेच दी ना" चाचा ने कहा
अब तो बाबा के मुह से शब्द नहीं फूट रहे थे
" अब चुप चाप निकल ले वर्ना अभी श्रीवास्तव जी को फ़ोन करता हूँ वो भी अपने पैसे निकाल लेंगे " चाचा ने दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए कहा
बाबा उर्फ़ कल्लू झोला उठाये सरक गया
चाचा के अन्दर घुसते ही चाची ने गले में हाथ डाल दिए  और बोली " वताओ आज चाय पिओगे या काफी "
चाचा हाथ छुडाते हुए बोले " देख ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं पौवे के पैसे भी देने है "
चाची ने तुरंत कहा " देखिये जी वो आप अपनी जेब से देना मै ये नहीं दूँगी "
" मुझे पता था तेरे हाथ से पैसे वापस लेने से तो यमराज से प्राण वापस लेना ज्यादा आसान है " चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा
और इस पर चाची भी मुस्कुराते हुए बोली " आप भी बम्बई क्योँ नहीं चले जाते, क्या अच्छी एक्टिंग करते हो "
चाचा ने प्यार से चाची का हाथ पकड़ कर कहा " तू भी कुछ कम नहीं है लेकिन जब मेरी हिरोइन यहाँ है तो मै बम्बई कैसे जा सकता हूँ "
ये कह कर चाची को किस कर लिया तो चाची शरमाते हुए रसोई में चली गई
 

Wednesday, May 8, 2013

"ये मर्द जात कितनी बदजात"

"ये मर्द जात भी कितनी बदजात है , जो औरतों को चैन से जीने भी नहीं देते " रौशनी ने झल्लाते हुए कहा.
"अरे नहीं दीदी सारा कुसूर मर्दों पर डालना ठीक नहीं " नीलू ने आदतन अपना पक्ष रखा ।
" बड़ी आई मर्दों की वकील , तूने अभी देखा ही क्या है ,झेल तो मै....." कहते कहते रौशनी रुक गई , कई लकीरें माथे पर खिच गई ।
नीलू ने पूछा,"क्या हुआ दीदी "  नीलू के कंधे पर हाथ रखते ही किसी दिवास्वप्न से चौंक गई और जाते हुए बोली " कुछ नहीं बस मुझे मर्द पसंद नहीं "
रौशनी , नीलू और उनकी माँ (मिसेज शर्मा )कुल मिला कर तीन प्राणी का छोटा सा संसार, शर्मा जी का देहांत तो कई साल पहले ही लम्बी बीमारी के बाद हो गया था .पर उनकी कमी को पूरा करने में मिसेज शर्मा ने कोई कमी नहीं छोड़ी शर्मा जी के ऑफिस में नौकरी कर ली जिससे गुजारा ठीक हुआ तो बेटियों की पढाई भी ठीक से होने लगी ।
पर आज हालत कुछ और थे , आज रौशनी पहले वाली छोटी सी दस साल की गुडिया  नहीं, उन्नीस साल की नव यौवना थी और ग्रेजुएशन कर रही थी ,आज नीलू और मिसेज शर्मा से कहीं ज्यादा शर्मा जी जरूरत महसूस हो रही थी, इसी लिए वह कभी रात को बिस्तर पर कभी कभी नहाते हुए बाथरूम में रो कर दिल हल्का कर लेती थी ।
इस उखड़े रवैये से परेशां घर के सभी सदस्य चाह कर भी कुछ जान नहीं पा रहे थे माँ ने तो कई बार पूछा पर जवाब में या तो रौशनी चुप रह जाती या टाल देती
खैर दिन ऐसे ही गुजरते रहे और एक दिन रौशनी घर में धडधडाते हुए कॉलेज से आई साइकिल किनारे टिकाई और कमरे में जाकर बिस्तर पर गिर गई  नीलू जल्दी से आई तो देखा की रौशनी लेटे हुए हाफ रही है और कपडे गंदे है जैसे गिर गई हो नीलू जाकर पानी लेने गई तो देखा की साइकिल का अगला टायर कुछ टेड़ा हो गया है .पानी देते वक़्त रौशनी से पूछा "क्या हुआ" रौशनी ने अभी भी चुप्पी साध रख्खी थी।
शाम को मिसेज शर्मा ने साइकिल की हालत देखी तो डर गयी और सीधे रौशनी को पुकारते हुए कमरे में जाकर रौशनी को गले से लगा लिया और खुद धम्म से बिस्तर पर बैठ गई। 
 नीलू तुरंत पानी लाई देखा तो रौशनी की गोद में मिसेज शर्मा लगभग अचेत सी लेटी  हैं रौशनी नें गिलास लेकर पानी के छीटे मिसेज शर्मा के मुहं पर मारे तब कुछ होश में आ गई। अब इस हालत में रौशनी ने कुछ भी माँ को बताना मुनासिब समझा और बहाना बना कर टाल  गई। 
अगले दिन शनिवार था तो मिसेज शर्मा सब्जी लेकर घर आई देखा तो घर पर कोई मेहमान आये है अन्दर शर्मा जी के छोटे भाई त्रिलोचन शर्मा , किसी लड़के के साथ बैठे थे। 
"भाभी जी नमस्ते " कहते हुए त्रिलोचन नें पैर छूए तो मिसेज शर्मा ने नीलू से कहा की चाय बना ला
"और बताइए भाईसाहब घर में सब ठीक है " मिसेज शर्मा पसीना पोछते हुए बोली
"भाभी सब ठीक है ममता (त्रिलोचन की पत्नी )तो आने को कह रही थी पर मैंने ही कहा की आज इस गर्मी में कहा साथ में मारी फिरेगी और घर भी अकेला छोडना ठीक नहीं " त्रिलोचन सोफे पर ठीक से टिकते हुए बोले
"हाँ सही कह रहे हैं कुछ दिन से तो कूलर भी जवाब दे गया है "मिसेज शर्मा चाय देते हुए बोली
अब त्रिलोचन को मुद्दे पर आते ज्यादा टाइम ना लगा। 
"वैसे भाभी मैं कह रहा था की पीछे वाला जो कमरा है वो खाली है न," त्रिलोचन चाय का सिप लेते हुए बोले
 "हाँ खाली है पर अब उसे स्टोर बना रखा है , क्योँ " मिसेज शर्मा ने सवाल पूछा
" ये मेरे साले का लड़का है सूरज इसे यहाँ एक कॉलेज में एडमिशन मिल गया है सोचता हूँ अगर इसे यहाँ .."कहते कहते बीच में ही चाय की सिप से मुहं भर लिया
बड़ी शंका में डूब गयी मिसेज शर्मा .अब क्या कहे
सूरज वक़्त की नजाकत को समझते हुए बोला"आंंटी मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता इसलिए मैं आपके यहाँ किरायेदार की तरह ही रहूँगा, वक़्त पर किराया देता रहूँगा, वो तो मेरे अजनबी होने के कारण यहाँ कोई कमरा नहीं दे रहा इसलिए आप के पास आना पड़ा वर्ना मै तो खुद आपको परेशां नहीं करना चाहता था  "
सूरज ने एक सांस में अपनी दिल की बात को रख दिया।   
मिसेज शर्मा की थोड़ी शंका दूर हुई तो बात बनाते हुए बोली ."ऐसी कोई बात नहीं है बेटा ,बस कमरा थोडा छोटा है इस गर्मी में कैसे रह पाओगे  "
" नहीं आंटी कोई बात नहीं मैं एडजस्ट कर लूँगा और रही बात गर्मी की तो मैं  कही भी रहू ये तो पीछा नहीं छोड़ेगी " सूरज अपनी बात मनवाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था। 
अभी इस अनजान लड़के को लड़कियों के घर में पनाह देना ठीक है या नही जैसी कई बातों का सोच कर मिसेज शर्मा उठने को हुई तो 
"बुआ,बस सामान कहाँ रखना है ये बता देना " मुस्कुराते हुए सूरज बोला
लगभग निरुत्तर सी मिसेज शर्मा को नीलू की आवाज रसोई से आई वो चली गई।
" माँ कहाँ मुसीबत मोल ले रही हो " नीलू धीमे से फुसफुसाते हुए बोली।
"क्या करू ऐसे मना भी तो नहीं कर सकते, 
तुम्हारे पापा के जाने के बाद तुम्हारे चाचा ने हमारी बुरे वक्त में कितनी मदद की है, मना करूँ भी तो किस मुँह से, और फिर अपनी ममता चाची को तो जानती ही हो उसे पता लगा कि उसके भाई के लड़के को मना किया वो भी किराये पर कमरा देने से तो घर सर पर उठा लेगी" मिसेज शर्मा ने समझाने की कोशिश की
"पांच छेह सौ देकर पूरा घर अपना समझेगा " नीलू थोड़ी तेज आवाज में बोल गई।
मिसेज शर्मा कुछ सोचते हुए बाहर आ गई।
त्रिलोचन बोले "ठीक है भाभी तो अब हम चलेंगे, चलो भई सूरज  "इतना कह कर त्रिलोचन बाहर निकल गए।
 सूरज ने पैर छूए और बोला " आंटी माफ़ करना मैंने आपकी बातें सुन ली थी मैं पैसे की एहमियत समझता हूँ, इसलिए मैं पांच छेह सौ में किसी का घर कब्जाने बाला नहीं और मैं पंद्रह सौ तक देकर कमरा ले सकता हूँ, इससे ज्यादा मैं नहीं दे पाउँगा क्यूंकि पढाई का खर्च भी निकालना है "
ये कह कर सूरज बाहर जाने लगा तो मिसेज शर्मा ने उसे बुलाया और बोली"कब से आओगे "
सूरज मुस्कुराने लगा और बोला "मुझे सोमवार से ही  कॉलेज जाना है इस लिए कल का ही दिन है "
मिसेज शर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा "ठीक है पर अगर कोई गलती हुई तो भाई साहब से शिकायत कर दूँगी "
इस पर त्रिलोचन कुछ कह पाते तब तक सूरज बोला "  अरे नहीं बुआ मेरे कान पकड़ने को आप हो तो फूफा जी को बताने की क्या जरूरत है "
और इस पर दोनों हसने लगे और सूरज चला गया
अगले दिन से सूरज ने अपनी बातों से सबको अपना बनाना शुरू कर दिया। सूरज की बातें होती ही ऐसी थी कि कोई प्रभावित हुए बिना रह नही पाता था पर अभी भी रौशनी से दूरी बनी हुई थी इसी बीच रौशनी की नीलू और माँ से भी सूरज से बात करने के कारण कहा सुनी बढ़ती गयी क्यूंकि रौशनी को एक मर्द का उसके घर में होना खल रहा था जिससे वो सबसे ज्यादा चिड्ती थी।
 आखिर एक दिन कपडे धोते वक़्त नीलू से पूछ ही लिया " क्या तुम्हारी दीदी हमेशा से ही ऐसी थी या मेरे आने के बाद हुई है "
नीलू ने हँसते हुए कहा "अरे नहीं वो तो सबसे ज्यादा तेज ठहाका लगाती थी की दादी को डंडा लेकर मारने आना पड़ता था चुप करा ने के लिए "
" तो अब क्या हुआ " सूरज ने कपडे रोक कर नीलू की बात पर ध्यान दिया।
" पता नहीं जब से कॉलेज में एडमिशन हुआ तब से ऐसी ही मर्दों से चिडने लगी है " नीलू ने बाल्टी में हाथ छप छपाते हुए उदास मन से कहा।
अब सूरज को लगा की कुछ बात तो है जो रौशनी को परेशान कर रही है।
सूरज अगले दिन से ही जाँच पड़ताल में लग गया।
दोस्तों से कॉलेज में पता लगाया कुछ पता नहीं लगा फिर एक दिन शाम को उसका पीछा करने लगा तो देखा, रामदास चौराहे के पास कुछ लड़के खड़े हैं और रौशनी को घूर रहे है अब रौशनी भी तेजी से पेडल मार कर तेजी से साइकिल दौड़ा रही है और लड़के हंस हंस कर सीटी बजा रहे हैं उनमे से एक बोला "क्या झांसी की रानी है घोडा दौड़ा रही है " तो दूसरा बोला "अरे हमें भी तो बैठा लो आगे नहीं तो पीछे ही टिक जायेंगे  "
इसी बीच सूरज ने देखा की अब रौशनी आगे निकल चुकी तो लड़कों के पास पहुँच गया और बोला "क्या बदतमीजी है "
तो एक बोला " क्योँ तेरी बहन है क्या "
सूरज ने उसके एक जोरदार चाटा जड़ा और बोला " चल तुझे थाने में ही बताऊंगा की बहन के साथ तुझे कैसे बोलना चाहिए "
इतने में एक ट्राफिक हवालदार आया और सलाम कर के सूरज से बोला "आप यहाँ कैसे, साहब "
सूरज बोला "थाने में शिकायत की उस लड़की ने ,कि कुछ लड़के उसे परेशान कर रहे हैं वही देखने आया था ये साले यहाँ डेरा जमाये हैं, अब थाने में रामलीला कराऊंगा  इनसे  "
लड़कों में से पीछे से निकल कर एक हाथ जोड़ कर आया "साब माफ़ कर दो अब नहीं करेंगे "एक एक कर सभी ने सॉरी बोलना शुरु कर दिया।
तो सूरज बोला " अरे नहीं आज की रात तो थाने में तुम्हारे पिछवाड़े पर लाल रंग की पुताई करूँगा वो भी अपने प्यारे डंडे से "
अब तो सब के सब डर गए और दो ने तो पैर भी पकड लिए।
हवलदार बोला "छोड़ दो साब अगर अब ये यहाँ दिखाई दिए तो मैं खुद आपको फ़ोन कर दूंगा "
सूरज बोला " फिर भी गलती कि सजा तो मिलेगी तुम सब को मुर्गा बनना पड़ेगा "
सभी सड़क को इधर उधर देखते मुर्गा बन गए .।
सूरज ने कैमरे में एक फोटो ली और सबको भाग जाने के लिए कहा ।
सबके जाने के बाद ट्रेफिक हवलदार को पचास रुपये बडाये तो हवलदार बोला " अरे नहीं बेटा मै बिकाऊ हूँ पर मेरे भी बेटियां हैं आज का ये ड्रामा करके एक बेटी को ही तो बचाया है "
"ठीक है हवलदार जी, मेरी बात पर भरोसा कर आपने मेरा इतना साथ दिया उसका बहुत धन्यवाद पर कल से मैं खुद इस जगह दिखाई दूंगा सिर्फ कुछ दिन के लिए" कहते हुए सूरज घर की ओर चल दिया। हवलदार उसकी इस आखिरी बात को शायद समझ नही पाया पर कुुुछ पूूछा भी नही।
फिर अगले दिन से लड़कों की जगह वो खुद वहां बैठने लगा और जब रौशनी आई तो सीटी मार कर बोला " कहाँ चली जानेमन " इतना सुनते ही रौशनी ने बिना उस ओर देखे पहले की तरह साइकिल दौड़ाने लगी और  पीछे से वो भी घर की पिछली गली तक आया और मुड कर बापस चला गया और थोड़ी देर बाद जब घर में घुसा तो देखा रौशनी मुहं धो रही है।
उसने कुछ कहने के लिए उसके पास जाने को कदम बडाये तो वो पीछे मुड कर कमरे में चली गई।
सूरज ने भी रोज की आदत डाल ली और रोज पीछा करने लगा।
और एक दिन रौशनी की तरफ बड़ा तो मुड़कर रौशनी कमरे में नहीं गई और सूरज पास में जाकर खड़ा हो गया और पीछे से हलके से कान में बोला "ऐसे ही अगर उन लड़कों के सामने भी डट जाओ तो वो मैदान छोड़ कर ही भाग जायेंगे "
इतना सुनते ही रौशनी का गुस्सा काफूर हो गया और अचम्भे से कुछ देर सूरज को जाते देखती रही।
सूरज की बात रात भर सीने में कौंधती रही और आखिर रौशनी नें एक फैसला लिया और मुस्कुराते हुए करवट लेकर सो गयी।
अगले दिन वह तेजी से साइकिल लेकर बढ़ती जा रही थी तो फिर वही सीटी और आवाज आई " जानेमन हमे भी तो लेती जाओ "
इतना सुनते ही साइकिल आवाज की तरफ मोड़ कर बिना देखे एक झन्नाटेदार चाटा गाल पर रसीद दिया कुुुछ बोलने ही जा रही थी, फिर देखा तो ऑंखें फटी रह गई सूरज का लाल गाल देखकर तो जैसे हलक की आवाज हलक में ही अटक गई और फिर सूरज बिना कुछ बोले घर चला आया।
शाम के धुंध के बीच सूरज डूबते सूरज को देख रहा था और नीलू बैठे बैठे लाल गाल देखकर मुस्कुरा रही थी
इतने में रौशनी आई और बोली "सूरज ये सब क्या है "
तो सूरज उठा और मिसेज शर्मा के रसोई के स्लैब पर बैठ गया जहाँ मिसेज शर्मा खाना बना रही थी
मिसेज शर्मा गाल के लाल रंग को देखकर इतनी अचंभित नहीं हुई जितना रौशनी को देखकर और वो भी सूरज से पूछ रही थी " सूरज बताओ ये सब क्या है "
सूरज मुस्कुराया और बोला " देखिये आंटी जी ये जब मुझसे बात नहीं करती तो मै क्योँ करू "
इतने में नीलू ने आकर कहा " माँ दीदी ने सूरज भैया का गाल लाल किया है " और खिल खिला कर हंस पड़ी।
 अब तो मिसेज शर्मा को भी जानना था की क्या बात है तो सूरज के चेहरे की ओर अचरज से देखने लगी।
सूरज उठा और आँगन के कोने में पड़ी बेंच पर पालती मारकर बैठ कर बोला  "एक कहानी सुनो मज़ा आयेगा" नीलू बोली ठीक है कहो साथ में बाकि सब भी बैठ गए।
सूरज ने शुरू  किया " एक राजकुमारी थी वो रोज पढने जाती थी तो रास्ते में शैतानों का गाँव पड़ता था वो उसे परेशान करते थे तो वो अपना घोडा और तेजी से दौडाते हुए निकल जाती थी शैतान अपनी शैतानी पर और खुश होते और रोज उसे परेशान करते , इस तरह कई महीने बीतते गए पर कोई हल न निकला और एक दिन एक बाबा वहां से गुजर रहे थे तो उन्होंने देखा की राजकुमारी शैतानों से नहीं अपने डर से ज्यादा डरती है तो राजकुमारी को एक मंत्र दिया और अगले दिन राजकुमारी ने सब शैतानों को मार भगाया कहानी कैसी लगी "
"पर तुम शैतानों  की जगह .."कहते कहते रौशनी शर्मा गई और इस पर नीलू अपनी हसी रोक नहीं सकी।
तब सूरज बोला " मेरा काम तो केवल मंत्र का असर देखना था तो वहां खड़ा हो गया "
  " और वो शैतान कहाँ गए बाबा जी" नीलू ने पूछा
"आओ बच्चा  दिखाता हूँ" और ये कह कर अपने कमरे में सभी को ले गया और तस्वीर जिसमे लड़के मुर्गा बने हुए थे देते हुए बोला "देखो "
उस तस्वीर को देखते ही रौशनी खिलखिलाकर हसने लगी ये देख मिसेज शर्मा के आँखों से आंसू निकलने लगे आखिर कर उन्हें उनकी पुरानी रौशनी जो मिल गयी थी ।