कुंवर लाल सिंह, वैसे तो अपनी गली के सबसे धनिकों में से एक थे क्योंकि उनके मुताबिक "बीबी बच्चे का झमेला मात्र काँटों की गद्दी है जिस पर बैठ इंसान चाहे तो भी मुस्कुरा नही सकता बस दिखावा ही कर सकता है "| यही वजह थी कुंवर साहब ने अभी 44 सावन देखने के बाद भी गृहस्थ जीवन की लालसा नहीं की अब तो आलम ये था की बाल रंग लेने के बाद खुद को अक्सर लड़का समझने लगते थे | ऐसा नही की लोगों ने उन पर शादी के लिए दवाव नही डाला पर उन्होंने हिम्मत से अपनी पैरवी की और आखिर लोग मान गए ।
फिर भी वक़्त जब गुजरता है तो वह कुछ देते हुए बहुत कुछ साथ ले जाता है । दिन में कुँवर साहब को अपने और शरणागतों के काम से फुरसत नही मिलती थी और रात में आधी रात तक अपने शौक से , अर्थात चित्रकारी । यह शौक शुरुआत से नही था पर अकेलेपन ने बहुत कुछ सिखा दिया था जिसमे से ये एक चित्रकारी थी । अब घर मे जब अकेले पुरुष हो तो सिर्फ एक ही चीज परेशान करती है वो है चूल्हा-चौका ।तो उनकी माता जी का निधन हुआ तभी उन्होंने सोच लिया था जीभ का चटोरापन तो है नही तो कभी थोड़ा कुछ बना कर जीवन जी ही लेंगे और वैसा ही अभी तक स्वयं को ढाल लिया था ।
माँ बाप के गुजरे अभी 2 साल बमुश्किल हुए थे पर घर का गुजारा करना मुश्किल होने लगा क्योंकि कभी काम धाम तो कुछ कभी किया नही जो पूंजी बाप दादा ने छोड़ी वो कुछ हद तक खत्म होने को आ गई थी।किसी ने सही कहा है अगर खाली बैठकर राजा भी खाए तो किसी दिन उसके हाथ भी खाली हो ही जाते है ।
परेशानी बड़ी थी सो कुंवर साहब ने इसके लिए कोई जुगत ढूंढने लगे पर चुपचाप क्योंकि भई किसी को पता चल जाता तो कुंवर साहब की बस इज्जत ही बची थी वो भी चली जाती ।
एक दिन कुंवर साहब अकेले बैठे बैठे ऊंघ रहे थे कि किसी ने बाहर से आवाज लगाई कुंवर साहब क्या घर मे है।
कुंवर साहब बोले "आते है भाई बैठक में बैठिये तब तक "
थोड़ी देर में कुंवर साहब बाहर आये तो सामने बैठे व्यक्ति ने कहा" साहब इस समय आपको परेशान किया इसके लिए माफी चाहता हु "
कुँवर साहब मुस्कुराते बोले " अरे परेशानी कैसी बताइये कैसे आना हुआ"
व्यक्ति ने बिनती के लहजे में कहा" बस साहब कुछ नही मेरे घर की पिछली दीवार ढह गई सो अब खुले में रहने को मजबूर हु अगर आप .."
कुंवर साहब कुछ समझते हुए बोले" इन दिनों मैं भी कुछ मुश्किल दौर से गुजर रहा हु पैसो की थोड़ी किल्लत है वरना आपकी जरूर मदद करता"
व्यक्ति गर्दन हिलाते बोला " अरे नही बात पैसो की नही है बात ये है कि मेरा समान खुले में पड़ा है बारिश के दिन आने वाले है और अभी तो मैं घर ठीक कराने लायक पैसे नही जोड़ पाया हूं इसलिए आया था ..कुछ तीन चार महीनों के लिए शरण मिल जाती तो बड़ा उपकार होता"
कुंवर साहब ने दिल मे सोचा अब तो हम खुद ही इतने बुरे दौर से गुजर रहे है अगर इन लोगो को पता चला तो रही सही इज्जत दाव पर है।
कुंवर साहब का आदतन अब मदद करने का जी भी कर रहा था पर घर के हालात खुल जाने का डर भी था तो सोचा कि कुछ महीने की तो बात है और नौकरो के कमरे तो कब से हम देख भी नही पाए कि कितने कबूतरों ने घर बना लिया ये सोचकर कुछ दिल मे ठान लिया और मुस्कुराते हुए व्यक्ति से बोले "देखो भाई अगर तुमने हमारे बाबा साहब (पिता जी) से ये कहा होता तो अब तक तुमको धक्के देकर भगा दिया होता मगर हमारा दिल किसी की परेशानी में .."
व्यक्ति कुंवर साहब के घुटनो पर दोनों हाथ रखते बोला "माई बाप है आप हमारे आपके मोम जैसे दिल की वजह से ही तो इतने फरियादियो का मेला लगा रहता है आप के दर से कोई खाली आज तक नही गया "
कुंवर साहब ऐसी बातें सुनकर इतने फूल कर कुप्पा हो गए की बोले " तुम बहुत अच्छे इंसान लगते हो इसलिए तुम उन आम के पेड़ के नीचे वाले कमरों में रहने लगो "
व्यक्ति बोला "आपकी बहुत बहुत मेहरबानी"
कुंवर साहब बोले"कौन कौन है तुम्हारे घर मे "
व्यक्ति बोला " मेरी बीबी तो बीमारी में गुजर गई और आप की दया से मेरे दो बच्चे एक विधवा बहन और माँ है "
कुंवर साहब ने कहा " कब से रहने आओगे "
व्यक्ति बोला "आपकी इज़ाज़त हो तो कल शाम तक सारा सामान ले आऊंगा"
कुंवर साहब बोले" ठीक है चाबी ले लेना आकर"
इतना सुनकर खुशी खुशी व्यक्ति चला गया ।
उसे जाते देख किसी की मदद करने का संतोष कुंवर साहब के चेहरे पर था पर सोच रहे थे इन लोगो को घर से दूर कैसे रखूं की इन्हें मेरे हालात पता न चले कुछ सोचना होगा ।
कुंवर साहब के दिमाग मे पूरे दिन अपनी शान खोने के डर की उहापोह में लगे रहे
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