Saturday, January 5, 2013

अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता


"राधा तुम्हे ठण्ड नहीं लग रही क्या, कल कर लेना, आओ यहाँ आग के पास बैठो  " तुलीराम ने छत से आँगन में झांककर कहा
राधा ने बर्तन धोते हुए ही कहा" मै न्यू इयर का स्वागत गंदे बर्तनॊ के साथ नहीं करना चाहती, इस साल का काम इसी साल ख़त्म करुँगी"
तुलीराम इतना सुनते आग को एक टक देखने लगा , सोचने लगा  कि इस साल ने क्या क्या नहीं दिखाया उन्हें, लगता है एक सदी बीत गयी हो, हर दिन कुछ न कुछ अनहोनी की ख़बरें मिलती रही आखिर साल ख़त्म हो ही गया
इतना सोच रहे था  कि राधा हाथ पोछ्ते हुए आई और बोली "आग को क्या घूर रहे हो सर्दी इतनी है तो आग भी कहाँ तक साथ देगी"
तुलीराम की चेतना लौटी तो देखा लकड़ियों में आग बची नहीं थी इसलिए बोला " मै तो कह ही रहा था की जल्दी आ जाओ वर्ना आग  बुझ जाएगी "
"कोई बात नहीं चलो बिस्तर में घुस जाते है" राधा ने हाथो को बची आंच को हाथ दिखाते कहा
तुलीराम ने भी हामी भरी और कमरे में चले गए राधा ने आग दरवाजे में ताला लगाया और लाइट बुझाते हुए कमरे में बद गई देखा तो तुलीराम कल के लिए कपड़ो को हुक पर टांग रहा था 
"लगता है कल और ज्यादा सर्दी होगी अपने लिए एक स्वेटर और निकल लीजिये" राधा ने बिस्तर ठीक करते हुए कहा
"आज तो बाहर हवा भी चल रही है " तुलीराम ने समर्थन में कहा
"मैंने तो सोचा था की इस साल की दिवाली अपने घर में मनाएँगे, पर माँ जी के कैंसर के इलाज ने  सब ख़त्म कर दिया " राधा ने रजाई के छोर को खीचते हुए कहा
" जब माँ ही ख़त्म हो गई तो क्या बचता" तुलीराम  ने उदास होते हुए कहा
राधा को सुनते ही जैसे झटका लग गया हो, "मै तो पहले ही कह रही थी की अब ये और नहीं जियेंगी घर ले चलिए पर पिता जी पर तो कुछ असर ही नहीं था, उनका बस चलता तो ..."
तुलीराम ने बीच में ही राधा को टोका " अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता राधा  "
आखिर तुलीराम को लगा अब ये नहीं मानेगी तो चादर ओड कर फिर बहार निकल आये और छत पर ही टहलने लगे ।
तुलीराम की आँखों में अब माँ का वो उदास और बीमार चेहरा घूम रहा था । वैसे तुलीराम के सामने वो कभी रोती नहीं थी पर एक बार हस्पताल में वो जब बोतल में पानी भर कर ला रहा था, तो देखा की पिता जी  उनके आंसू पोंछ रहे थे और वो बस उनका हाथ थाम कर हिम्मत जुटा रही थी । ये देख कर तुलीराम  भी लौट आया और सीधे डॉक्टर के कमरे में चला गया और उससे पूछा " माँ की तबियत सुधर क्यूँ नहीं रही, रोज इतनी तो दबाई दी जा रही है"
डॉक्टर ने तो तभी कह दिया "केस इतना बिगड़ गया है, चाहे कुछ किया जाये ये अब नहीं बच सकती, मेरी  राय  में तो इन्हें घर ले जा कर खूब  सेवा  करो"
तुलीराम को अभी तक खुद पर गुस्सा और तरस दोनों आ रहे थे की  माँ के लिए ही ये दुःख होना था।वो तो इतनी भगवान को याद करती थी , उन्होंने किसी का क्या बुरा किया था।
देर रात जब बापस आया तो राधा सो चुकी थी, वह भी जैसे तैसे आंखे बंद कर लेट गया, आखिर  कुछ देर बाद नींद आ ही  गयी ।
इस बात को और कुछ महीने बीत गए । वक़्त ऐसा मरहम है की चाहे कोई भी घाव लग जाये  वो भर ही देता है  । तुलीराम को भी माँ की याद अब राधा ही दिलाती जब वो अक्सर माँ के इलाज का खर्च गिनाती  पर  तुलीराम कलह बढाना नहीं चाहता था तो चुप हो  जाता या बाहर निकल जाता ।
एक दिन सुबह अखवार पढ़  रहा था  राधा ने चाय का प्याला हाथ में देते हुए कहा " कब तक हम यु ही मकान का किराया देते रहेंगे,  कोई घर नहीं तो प्लाट ही ले लो छोटा सा कमरा बनाकर गुजर कर लेंगे "
तुलीराम बोंला " देख तो रहा हूँ पर केवल पचास हज़ार ही हो पाये है "
राधा ने कहा " कोई बात नहीं तुम बात चलाओ, गहनों पर कुछ पैसे निकाल लेना, कुछ ऑफिस से हो जायेगा "
"ठीक है" तुलीराम  कुछ असमंजस से बोला ।
 ऑफिस की जल्दी में तुलीराम घर से निकल रहा था तभी राधा की चीख  सुनाई दी । वह तेजी से आंगन  की ओर बढा देखा तो कपड़ो की बाल्टी किनारे लुढकी है और राधा बेहोश है, उसने जल्दी से उसे उठाया और  एक रिक्शे पर बिठा कर हॉस्पिटल ले आया  । 
अब उसे डॉक्टर का इन्तजार था, डॉक्टर ने राधा की टांग देख कर कहा  टांग टूट गयी है ,जल्दी ही *-ऑपरेशन करना होगा आप चालीस हज़ार काउंटर पर जमा करा दें । हो सकता है की रॉड  डालनी पड़े  ।"
राधा इस समय दर्द से कराह रही थी तुलीराम ने  जल्दी से एटीएम पर जाकर पैसे निकाले और जमा करा दिए । ऑपरेशन  हो गया और राधा ठीक होने लगी ।
2 महीने बाद राधा ने दीवार के सहारे चलना शुरू कर दिया था  और तब तुलीराम ने कहा " क्या बात है आज तो कमाल कर दिया राधा"
राधा ने कहा "सब तुम्हारी वजह से हो पाया वरना मुझे तो लगा मै मर ही जाउंगी "
तुलीराम ने कहा "अब तुम ही तो मेरे लिए सबकुछ हो तुम्हे कुछ कैसे हो सकता है "
तुलीराम ने छेड़ने के अंदाज में कहा "तुम्हे तो  अभी नए घर में भी जाना है "
राधा का मुह उतर गया और बोली "अब कहाँ से आएंगे पैसे जो नया घर खरीदेंगे "
तुलीराम बोले " तुम ठीक हो गयी, अब फिर पैसे इकठ्ठे हो जाएँगे "
राधा बोली " तुमने इतना खर्च क्यों किया "
तुलीराम ने राधा को सीने से लगा कर कहा "अपनों से बढ़कर पैसा नहीं होता राधा"
राधा अब खुद को तुलीराम से बहुत छोटा महसूस कर रही थी और उसके पश्चाताप के आंसू  रोके नहीं रुक रहे थे ।




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